QISSA IIMC KA
आइआइएमसी के कुछ बेहद ख़ूबसूरत व दिलचस्प वाक़ियात हैं, जो भुलाये नहीं भूलते। कक्षाएँ शुरू ही हुई थीं। अभी बमुश्किल चार-पाँच दिन हुए होंगे कि एक रोज़ शाम में गेट पर किसी का इंतज़ार करतीं रंजना मजूमदार ने शाइस्तगी से कहा, "जिज्ञासु, गाँजा पीओगे ?" अब मैं तो हसते-हसते लोटपोट, ऑफर भी किया, तो गाँजा... आइआइएमसी जेएनयू कैम्पस में ज़रूर है, पर जेएनयू का असर भला जुम्मा-जुम्मा 8 दिन में मुझ पर क्या होता। मैरिड हॉस्टल की सीमा पार करने के बाद बौद्धिकता की आबोहवा में इल्मो-तालीम का सुरूर चढ़ता तो ज़रूर है, पर पूर्वांचल के अड्डे पर चाय पे चर्चा के बाद लौटते हुए फिर जैसे ही आइआइएमसी की सीमा में कोई दाखिल हो, सारी खुमारी उतरती जान पड़ती है।
दूसरा अवसर है तब का, जब आचार्यश्रेष्ठ श्री चारी साहब के गूढ़ दार्शनिक व्याख्यान का दौर शुरू हो चुका था। हम मौके-बेमौके यत्र-तत्र-सर्वत्र उनका करतल ध्वनि से स्वागत करने लगे थे और उनकी पंचलाइन की प्रतीक्षा में रहते थे। मसलन, उपस्थिति कम होने पर आयशा ग़नी को उनकी अतिशय स्नेह भरी तात्क्षणिक झिड़की पर कहकहों का वो वाक़िया भला कौन भूल सकता है - "Aisha, your attendance is too short. Come to my room, nothing will help you, otherwise."
एक और रोचक व हसीन बातचीत की कुछ स्पष्ट रेखाएँ ज़ेहन में उभर रही हैं। हम आरटीवीअन्स कैन्टीन के बाहर धूप में बैठकर चाय पी रहे थे। हमारे अज़ीज़ दोस्त विमल चौहान को अंग्रेजी बोलने का बड़ा शौक़ रहा है। उन्होंने किसी प्रो. के बारे में टिप्पणी की कि कितना घटिया 'प्रोनंशिएसन' है उनका। इस पर आयशा ग़नी ने चुटकी ली कि विमल, पहले तू अपना प्रनन्सिएशन तो ठीक कर ले, फिर अपने उस्ताद के 'प्रोनंशिएसन' की खिल्ली उड़ाना। अब विमल भाई भी कहाँ चुप रहने वाले थे, यूपी के पुरातन भाषाई स्वाभिमान को आघात लगा था, तुरत बोले, "अबे, मैं तो सर की बात कर रहा था। मेरी छोड़, मेरी अंग्रेजी इतनी ही अच्छी होती, तो गुरलीन (जेएमसी से अंग्रेजी साहित्य में ग्रैजुएइट) के साथ नहीं घूम रहा होता, जो तुम्हारे पीछे भागता।" भाई की प्रत्युत्पन्नमति के क्या कहने ! निरुत्तर कर दिया आखिर... हम सब ठहाकों के साथ चल पड़े समय पर चारी जी को सुनने, पता नहीं कौन-सी पते की बात कब मिस कर जायें...
ऐसी ढेर सारी मनोहारी चिरकुट कथाएँ हैं, जो आज बरबस याद आ गयीं ।
यादों का कारवाँ यूँ ही चलता रहे ! भ्रम टूटने न पाये, ख़्वाब पलता रहे !
यादों का कारवाँ यूँ ही चलता रहे ! भ्रम टूटने न पाये, ख़्वाब पलता रहे !
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