AN EVENING IN IIMC
आइआइएमसी अलमनाइ कनेक्शन के दिन हिन्दी पत्रकारिता की पढ़ाई कर चुके एक मित्र का परिचय विज्ञापन व जनसम्पर्क विभाग की चर्चित छात्रा रहीं एक दोस्त से कराता हूँ। सब सहज भाव से हो रहा है। थोड़ी देर बाद चुपके से हिन्दी वाले लेनिनग्रादी भाय कान में बोलते हैं,"अच्छा, जयन्त ये कश्मीरी कन्या है क्या" ? मेरा तो हसते-हसते बुरा हाल। उत्सुकता व जिज्ञासा की भी हद होती है। सचमुच पत्रकारिता आचार्य श्री प्रधान के शब्दों में "अटकलकारिता" हो गयी है। मने अच्छी-भली पंजाबी बाला को कश्मीरी हूर बना दिया।
फिर, हिन्दी पत्रकारिता के ही एक मित्र का परिचय हिन्दी पट्टी के ही दूसरे मित्र कुछ इस अंदाज़ में कराते हैं : इनसे मिलिए, ये फटे हुए पत्रकार हैं। इतने में वो सकुचाते हुए पास आकर बैठने की कोशिश में लड़खड़ा कर गिर पड़ते हैं। तो दुबारा उनका परिचय कराया जाता है कि ये गिरे हुए पत्रकार हैं। फिर, तुरत लोग उन्हें देखते हैं कि ये क्या बोल गये भाय...।
वैसे, मैंने हिन्दी वालों के साथ-साथ काउ बेल्ट के रेडिओ व टेलिविजन पत्रकारिता के वैसे छात्रों का दर्दे-दिल भी सामने रखने की कोशिश की, जिनके लिए एड & पीआर की कन्याओं की मित्र-सूची में ज़गह पाना किसी उपलब्धि से रत्ती भर कम नहीं हुआ करती थी और एक ने तो आह्लादित होकर बाक़ायदा पूर्वांचल पर समोसे-चाय पर भी कुछ दिलजले को आमंत्रित किया। कई महीने तक फ्रेंड रिक्वेस्ट को विचाराधीन रखती थीं ये भली लड़कियाँ। और, जब स्वीकृति की उम्मीद की आखिरी किरण भी बुझने लगती थी, तो कुछ बेचारे हार-हिया के फ्रस्ट्रेइटिड मुद्रा में आकर रिक्वेस्ट कैन्सल कर दिया करते थे। मुझे कोई हड़बड़ी नहीं रहती थी, इसलिए पूरी बेशर्मी से निर्लज्जता की चादर ओढ़े निश्चिंत सोया पड़ा रहता था। फेसबुक का क्या है ? कभी-न-कभी तो नज़रे-इनायत हो ही जायेगी - ये सोचकर फेसबुक की दुनिया का मैं नौसिखिया निर्लिप्त भाव से इन जादूगरनी को एक-एक कर रिक्वेस्ट भेजता रहा। मैत्री-निवेदन क़ुबूल होने पर शुक्रगुज़ारी की रस्म-अदायगी नहीं भूलता था। मुझे लगता था, ये तो सलीक़ा है, पर कुछ बालिकाएँ इस न्यूनतम अपेक्षित शालीनता को भी अन्यथा लेने लगती थीं। और, मासूमियत से पूछती थीं, थैंक्स फॉ वॉट ?
खैर, इस आभासी दुनिया की गुफ्तगू धीरे-धीरे कुछ मामलों में क़ुर्बत का रूप लेने लगी। और, पता भी न चला कि इस लिंग-निरपेक्षता के तहज़ीबो-तमद्दुन में कुछ भलेमानुष कब मेरी ताक़त के साथ-साथ कमज़ोरी भी बनने लगे। पर, अनथक यात्रा है, हारने का कोई विकल्प मौजूद नहीं है मेरे पास। उजालों के सफ़र पर पूरी शिद्दत से ये राही बस चलता चला जा रहा है, बिना कुछ आगे-पीछे सोचे, दाएँ-बाएँ मुड़े।
अगली कड़ी में कुछ दिलहारे (दिल हारे हुए) दोस्तों के बारे में कुछ और दिलचस्प खुलासे होंगे। इंतज़ार कीजिए।
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