Thursday, 12 March 2015


कई साथियों के लगातार आग्रह और पिताजी की लोकमाध्यम के विवेकपूर्ण व यथोचित प्रयोग की हिदायत के साथ फेसबुक पर वापसी की उदार अनुमति के बाद आज आपसे एक बार फिर रूबरू हूँ।
शुरूआत सस्ती सियासी हलचल से दूर, गुलज़ार की ख़ूबसूरत व मन-प्राण को छूने वाली एक प्यारी व प्रासंगिक रचना "किताबें" के साथ :
किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से 
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं,
अब अक्सर
गुज़र जाती हैं 'कम्प्यूटर' के परदों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें...
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है।
जो क़दरें वो सुनाती थीं
कि जिनके 'सैल' कभी मरते नहीं थे
वो क़दरें अब नज़र आतीं नहीं घर में
जो रिश्ते वो सुनाती थीं
वो सारे उधरे-उधरे हैं ।
कोई सफ़्हा पलटता हूँ, तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंडे लगते हैं वो सब अल्फाज़
जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते ।
बहुत सी इसतलाहें हैं
जो मिट्टी के सिकूरों की तरह बिखरी पड़ी हैं
गिलासों ने उन्हें मतरूक कर डाला।
ज़बां पर ज़ायका आता था जो सफ़हे पलटने का
अब अंगुली 'क्लिक' करने से बस इक
झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था,कट गया है
कभी सीने पे रख के लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे,
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बना कर
नीम सज़दे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से।
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइन्दा भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के मासूमियत के साथ
किताबें मांगने,गिरने,उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा ?
वो शायद अब नहीं होंगे !

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