भारतीय जनसंचार संस्थान की स्वर्णिम यात्रा
जिस संस्थान की आधारशिला तात्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री इंदिरा गाँधी ने आज से 50 साल पहले रखी थी, वो आज जनसंचार का विशाल वटवृक्ष बन चुका है। कभी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे साधकों के अध्ययन-अध्यापन-प्रशिक्षण का मक्का कहा जाने वाला भारतीय जनसंचार संस्थान पूरे एशिया में न सिर्फ़ सुविख्यात था, अपितु शीर्षस्थ भी। आज भी विकास पत्रकारिता की पढ़ाई करने दुनिया के कोने-कोने से विद्यार्थी यहाँ पहुँचते हैं। इस लब्धप्रतिष्ठ संस्थान ने देश को कई यशस्वी व ओजस्वी पत्रकार दिये हैं। इस वृहत् परिवार का अंग बनना एक गौरवशाली व सुखद अहसास है।
नज़रों में ताबे-दीद भी बाकी नहीं रही,
किससे नज़र मिलाऊँ तुझे देखने के बाद।
काबे का एहतराम भी मेरी नज़र में है,
सर किस तरफ झुकाऊँ तुझे देखने के बाद।
- सईद शाहिदी
कैबिनेट मिशन (1945) के प्रस्ताव पर गठित अंतरिम मंत्रीमंडल में सरदार वल्लभ भाई पटेल गृह के साथ-साथ सूचना व प्रसारण मंत्रालय भी संभाल रहे थे। इस देश में दो सूचना व प्रसारण मंत्री ऐसे हुए, जो बाद में चलकर प्रधानमंत्री भी बने- श्रीमती इंदिरा गाँधी एवं श्री इंद्र कुमार गुजराल। और, दो सूचना एवं प्रसारण मंत्री ऐसे हुए, जिन्होंने आगे चलकर लोकसभा में नेता, प्रतिपक्ष की सशक्त भूमिका निभाई- श्री लाल कृष्ण आडवाणी और श्रीमती सुषमा स्वराज। बावजूद इसके मीडिया-अमीरी व मीडिया-ग़रीबी के बीच बढ़ती खाई के बीच न सिर्फ़ ग़रीबी- रेखा के नीचे, बल्कि मीडिया-रेखा के नीचे भी जीने को विवश जनसामान्य के साथ न्याय करते हुए आज देश में जन प्रसारक की जो भूमिका दिखनी चाहिए थी, उसका सर्वथा अभाव नज़र आता है।
आइ.आइ.एमं.सी. सूचना प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त निकाय है। कई वर्षों से इसे सेंटर अॉफ एक्सलंस (उत्कृष्ट केंद्र) घोषित करने की बात चल रही है। पर, पिछली कुछ सरकारों के रवैये का पता इसी बात से चलता है कि सीधे संवाद व संचार से जुड़े इस अति महत्वपूर्ण मंत्रालय को कैबिनेट स्तर का मंत्री तक नसीब नहीं हुआ है। जिस तरह स्वास्थ्य मंत्रालय की देखरेख में एम्स चलता है, विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्रालय आइ.आइ.टी. को पुष्पित-पल्लवित करता है, वैसी ही ज़िम्मेदारी की स्वाभाविक अपेक्षा आइ.आइ.एम.सी., एफ.टी.आइ.आइ.,पुणे,एस.आर.एफ.टी.
ये इसलिए भी ज़रूरी है कि आज पत्रकारिता के अकादमिक क्षेत्र में उम्दा शिक्षकों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। आइ.आइ.एम.सी. जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में बच्चे महज नौकरी पाने के लिए नहीं आते, कुछ बच्चे एकेडमिक्स में भी जाना चाहते हैं। उन बच्चों को बेसब्री से यहाँ एम.ए., एम.फिल, पी.एच.डी. का पाठ्यक्रम शुरु होने का इंतज़ार है। वस्तुतः रैंकिंग शोध कार्य की गुणवत्ता व प्रासंगिकता पर निर्भर करती है। छात्र यदि नोट्स बनाने में तल्लीन रहें, चीज़ों को समग्रता के साथ विश्लेषणात्मक दृष्टि से समझने-सीखने की ज़हमत न उठायें, पुस्तकालय में समय बिताने व पढ़ने की संस्कृति से विमुख हो जायें, तो नतीजा अनुकूल नहीं रहेगा। आज देश के चोटी के संस्थानों में आये गुणात्मक ह्रास और गिरावट को लेकर प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. यशपाल का मानना है, "जिन शिक्षा-संस्थानों में अनुसंधान और उसकी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता, वो न तो शिक्षा का भला कर पाते हैं और न समाज का। अच्छा शोध हमेशा विषय के दायरे के बाहर होता है। अगर ऐसा करने की इजाज़त न दी जाये और शिक्षक परंपरागत तरीके से काम करते रहें, तो शोध का कभी भला नहीं हो सकता। महज विशेषज्ञ बनने से काम चलने वाला नहीं"। और ध्यातव्य है कि पत्रकारिता जीवन-क्षेत्र में हारे हुए व्यक्तियों की अंतिम शरणस्थली नहीं है। सुकून का विषय है कि देश भर के अंदर कुकुरमुत्ते की तरह पाँव पसार रहे पत्रकारिता के निजी संस्थानों की मौजूदगी, तमाम विचलन व फीस के नाम पर लगभग लूट के बीच बच्चे पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता के साथ आइ.आइ.एम.सी. पहँचते हैं।
पिछले कई साल से छात्रों के लिए छात्रावास की अनुपलब्धता के पीछे ये दलीलें दी जाती रहीं कि पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से क्लिअरंस नहीं मिल पा रहा है, इसलिए छात्रावास-निर्माँण की बात आगे नहीं बढ़ पा रही है। अब तो सौभाग्यवश वन व पर्यावरण मंत्रालय तथा सूचना व प्रसारण मंत्रालय एक ही शख्स के ज़िम्मे है। फिर क्या वजह हुई इंतज़ार की ? मज़ाक में कल साथी निकेश मयूर कह रहे थे, दरअस्ल, मामला परिसर के महज दो पेड़ों के चलते लटका हुआ है। उन्हीं दो पेड़ों के नीचे देश के दो ख्याति- प्राप्त पत्रकार को संचार-ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसलिए ऐतिहासिक महत्व के ये दो प्रेरणास्पद पेड़ न कटेंगे, न छात्रावास का निर्माण होगा। अब कोई रात में सुरक्षा-प्रहरियों को चकमा देकर उन्हें धराशायी कर दे, तो बात दीगर है। पर बुरी-डरावनी रातों में लगता नहीं कि कोई ख़ुद पर वन अधिनियम लगवाने का दुस्साहस दिखा पायेगा। वैसे, इधर कुछ छात्रों को छात्रावास की सुविधा उपलब्ध कराने का निर्णय आइ.आइ.एम.सी. प्रशासन ने लिया है, जो नाकाफ़ी है। प्रभो जावड़ेकर महाराज एफ.टी.आइ.आइ. हो आये आप, हमारे संस्थान के दिन कब बहुरेंगे ?
खैर, अपने इस प्रिय आँगन में आकर बेहद सुकून मिलता है। इरादे मज़बूत होते हैं, हौसलों को बल मिलता है और शुरु हो जाती है सपनों में नित नये-नये रंग भरने की पुनर्यात्रा।
दिल तुम्हारा है या हमारा है
हमसे ये फैसला नहीं होता।
-जिगर
आइ.आइ.एम.सी. के पास अगर सबसे ख़ूबसूरत कोई चीज़ है, तो वो है मीडिया-अध्ययन के लिहाज़ से देश भर में समृद्धतम इसका पुस्तकालय। यदि संयमित होकर यहाँ समय गुज़ारा जाये, तो इससे बेहतर कोई अनुभूति नहीं हो सकती। पत्रकारिता के इस मक्का के सृजनशील अध्याय सिने मंच ने अपनी सात महीने की यात्रा बड़ी खूबसूरती से पूरी की । मौजूदा सत्र की अपनी आखिरी प्रस्तुति के रूप में पिछले दिनों इस मंच ने "गाँधी माय फादर" बनाने वाले फिरोज़ अब्बास ख़ान निर्देशित सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य के ज़रिये कई सवालों व सरोकारों को कई बार स्पष्टता से तो कई बार सूक्ष्मता से उकेरती फिल्म "देख तमाशा देख" की स्क्रीनिंग की ।
इस सिने मंच को बुनियादी तौर पर खड़ा करने में निष्काम कर्मयोगी, व्यवहारकुशल, प्रिय साथी अभिषेक चंचल जी, अपनी रचनात्मकता व सौम्यता के लिए चर्चित सेज़ल ललवानी, सृजनशील मोही नारायण, जौक़े-दीदार रखने वाले भाई अली अनवर, बहुमुखी प्रतिभा की धनी सौम्या शंकर, दीपक पटेल, ओमप्रकाश धीरज, मलयानिल, ज्योति राय आदि का अप्रतिम योगदान रहा है । एक आत्मीय संरक्षक की भाँति बच्चों के बीच लोकप्रिय, फीचर कम्यूनिकेशन के हमारे श्रद्धेय प्राध्यापक डॉ. आनन्द प्रधान निरंतर सिने मंच की क्रमिक प्रगति का न सिर्फ़ जायजा लेते रहे, अपितु प. बंगाल में पिछले दिनों संपन्न हुए एक फिल्म फेस्टिवल में सिने मंच की मौजूदगी दर्ज़ कराकर इसे राष्ट्रीय पहचान भी दिलाई ।
इस मंच ने जहाँ स्पिक मैके का कार्यक्रम आयोजित कराया, जिसमें पश्चिमी संगीत का आनंद हमने लिया, वहीं विशुद्ध भारतीय संगीत -सागर में निमज्जित होने का मौका भी दिया । कार्लाइल के शब्दों में, "संगीत आत्मा पर लगी हुई काई को साफ कर देता है"। शेक्सपीयर अपने चर्चित नाटक ट्वेल्फ्थ नाइट में लिखते हैं :
संगीत यदि है प्रेमाहार, तो बजने दो, बस बजने दो
इतना निमज्जित करो मुझे कि तृप्त हो जाये ये मन।
संगीत-क्षुधा हो रुग्ण औ' फिर शान्त।
निर्भया पर सी.एन.एन. आइ.बी.एन. द्वारा बनाई गई डॉक्यमेंट्री का प्रदर्शन भी हमने देखा । साथ ही, कई अहम मुद्दों पर हमने सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में एक दृष्टि के साथ ईमानदार, प्रखर व सुचिंतित चर्चा भी की ।
इस मंच ने मेरे जैसे सिनेमा के महज उभरते हुए दर्शक को कई बारीकियाँ सिखाईं, समग्र समझ विकसित करने में मदद की । मैंने बड़े चाव से हर डॉक्यमेंट्री देखी । एकाध मौके को छोड़कर सिने मंच द्वारा प्रदर्शित शायद ही कोई ऐसी फिल्म हो, जिसे देखने का लोभ संवरण मुझसे हुआ हो । संवाद-सत्र को साथियों ने अपने अनछुए प्रश्नों व गंभीर, मारक तथा अर्थपूर्ण टिप्पणियों से काफी दिलचस्प और निहितार्थ पूरा करने वाला बनाया ।
आने वाले दिनों में यह सिने मंच प्रज्ञावान प्राध्यापक डॉ. आनंद प्रधान के कुशल नेतृत्व में आगामी सत्र के विद्यार्थियों के सांस्कृतिक बोध, कला-बोध, रंग-बोध, युग-बोध एवं उनकी सृजनशीलता, रचनाधर्मिता तथा अध्यवसाय के सहारे नित नयी बुलंदियों को छुए, प्रशिक्षुओं-अध्येताओं की अभिरूचि को निखारे और अपनी विशिष्ट पहचान व प्रासंगिकता बचाये व बनाये रखे - यही मेरी आत्मिक अभिलाषा है ।
एक बार पुनः आइआइ.एम.सी. को 50 वर्ष की अपनी शानदार व गरिमामयी यात्रा पूरी करने पर स्वर्णजयन्ती की अशेष आत्मिक बधाई व शुभकामनाएँ !
मेरा तसव्वुर, मेरे इरादे करेंगे फितरत पे हुक्मरानी
जहाँ फरिश्तों के पर हों लग़्ज़ां, मैं उस बुलंदी पे जा रहा हूँ।
-इक़बाल
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