दिल्ली की पल-पल बदलती सियासत
दिल्ली की वर्तमान राजनीतिक अनिश्चितता, सरकार बनाने को लेकर तेज़ी से
बदलते घटनाक्रम, केंद्र में मिली ज़बर्दस्त सफलता के बाद भाजपा की बढ़ती सक्रियता और नैतिकता व व्यावहारिकता के घुल-मिल जाने की कभी न बदलने वाली राजनीतिक नियति की
पुनरावृत्ति की आशंका के बीच दिल्ली की आम जनता इस धुंधली तस्वीर की गर्द हटते
देखना चाहती है । अब जबकि राज्यपाल ने तीनों प्रमुख दलों के नेता को बारी-बारी बुलाकर सरकार बनाने की संभावना व मंशा पर चर्चा की, तो तीनों ने मना कर दिया है। आखिर जिस काम को पाँच माह पहले निबटा कर राजनीतिक असमंजस को दूर किया जा सकता था, उसमें इतनी देर क्यों हुई ? इस उत्पन्न परिस्थिति को समझने के लिए ज़रा नेपथ्य की आवाज़
सुनते हैं ।
ऐसा नहीं
कि सत्ता में रहकर बदलाव लाना संभव नहीं । नेल्सन मंडेला और लूला डिसिल्वा की
मिसाल सामने है, जिन्होंने सत्ता में रहकर आम जनता की लड़ाई जारी रखी । दिल्ली की
राजनीति में अण्णा आंदोलन के गर्भ से उपजी आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द
केजरीवाल से भी कुछ इसी तरह की भूमिका की अपेक्षा थी । अक्टूबर, 2013 में सी.आर.
पार्क में उनसे एक बातचीत में मैंने सवाल किया था कि जे.पी. आंदोलन के बाद पहली
बार लोग देशव्यापी स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में अण्णा आंदोलन के साथ
खड़े थे । उस आंदोलन की ऊर्जा से आपकी पार्टी अभिसिंचित है । पर क्या यह जंग भी
संपूर्ण क्रांति के प्राप्य की ढाई साल के अंदर विफलता की मानिंद आपसी मतभेद व अंदरूनी कलह की
भेंट चढ़ जायेगी ? उन्होंने बड़ा सधा जवाब दिया, “हम 1977 की ग़लतियों से सबक लेते हुए आगे
बढ़ रहे हैं। जनता को मायूस नहीं होना पड़ेगा। सत्ता व मंत्री पद के लिए कोई
मनमुटाव नहीं होगा जी”। काश, ऐसा हो पाता ! बिन्नी, आगे चलकर शाजिया, आदि कई उदाहरण हैं,
जिनकी वजह से पार्टी की किरकिरी हुई। गत वर्ष दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में
पाँच साल के लिए अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित और ज़िम्मेदार हाथ में सौंपने की
जागरूकता और उत्सुकता ने लगभग 66 % मतदाताओं को मताधिकार-केंद्र तक खींच लाया । पर
कांग्रेस, भाजपा व आम आदमी पार्टी के बीच हुए त्रिकोणीय संघर्ष में किसी भी दल को
स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और त्रिशंकु विधानसभा में 31 सीटों वाली भाजपा ने नैतिक
स्टैंड लेते हुए सरकार बनाने से साफ मना कर दिया ।
दिल्ली की
सवा करोड़ जनता ने भ्रष्टाचार, बेरेजगारी, महँगाई, लूट, अपहरण, बलात्कार, लचर शासन
आदि गंभीर चुनौतियों से मुक्ति के लिए वोट किया था । उन्हें सरकार चाहिए थी । 43
से घटकर 8 सीटों पर सिमट जाने वाली कांग्रेस शून्य से शुरुआत कर 28 सीटें लाने
वाली ‘आप’
को बिना शर्त समर्थन
देने को राजी थी । ‘आप’ ने जनमत कराकर सरकार बनाने का फैसला किया । रामलीला मैदान में
शपथग्रहण समारोह में उमड़ी भीड़ सरकार से लोगों की अपार उम्मीदें बयां कर रही थी ।
पर मात्र 49 दिन में बिजली बिल कम करने, पानी के दाम घटाने जैसे कुछ उल्लेखनीय काम
कर संख्या-बल की बाध्यता के चलते जनलोकपाल बिल पेश न कर पाने की विवशता को विफलता
मानकर अरविंद ने 14 फरवरी को इस्तीफा दे दिया । राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है और
विधानसभा निलंबित है ।
कुछ ने
केजरीवाल को राजनीतिक शुचिता का नया
प्रतीक माना, तो कुछ ने उन्हें घोर अराजकतावादी की संज्ञा दी । ध्यातव्य है कि
गाँधी को भी दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक अराजकतावादी कहा जाता है । आज के दिनांक
में उनके अमोघ शस्त्रास्त्रों का प्रयोग जब कोई आम इंसान करने लगे, तो उसे
संविधानभंजक तक करार दे दिया जाता है । सवाल यह है कि आप संवैधानिक दायरे में रहकर
उस संविधान को अंदर से और कितना फैलाते हैं, विस्तार देते हैं या फिर संविधान को सिकोड़ने में लग जाते हैं ?
इसमें कोई दो राय
नहीं है कि दिल्ली में आप ने सीमित संसाधन में दो स्थापित राष्ट्रीय दलों के समक्ष
चुनौती प्रस्तुत करने, दिल्ली के साथ देश भर में सियासी पाकीज़गी का पैगाम देने,
वर्षों से चली आ रही ‘वोट और बेटी अपनी ही जाति को देने की गलत परंपरा और अवधारणा’ के खंडन समेत कई
पहलुओं पर तन्मयता से काम किया । आखिर दिल्ली जैसे महानगरीय जनमानस वाले राज्य में
‘आम
इंसान’ कौन
है, जिसको फोकस कर आप ने लगभग क्रांति की राह पर चलकर चुनाव लड़ा- यह सवाल
सैद्धांतिक रूप से ज़ेहन में कौंधता है । मध्य वर्ग ही वह वर्ग है, जिसके असंतोष व
आक्रोश को आप ने बड़ी सफाई से उभारा। बकौल प्रो. आनंद कुमार, “झुग्गी-झोपड़ी वाले,
जिन्हें रातों- रात शराब व चंद रूपये देकर खरीद लिया जाता था, ने इस बार आम आदमी
पार्टी के प्रति निष्ठा व्यक्त किया है।
मध्यवर्ग, निम्नवर्ग और उच्चवर्ग के सुशिक्षित, विवेकशील मताधिकारियों ने निश्चित
रुप से परिवर्तन को ध्यान में रखकर वोट दिया और राजनीतिक भविष्यवेत्ताओं की आँखे खोलकर
रख दी हैं” ।
जहाँ इतनी
बड़ी मुहिम के साथ चुनाव लड़ा गया हो, वहाँ पैसे का प्रबंधन आसान नहीं होता और
ईमानदारी से मुकाबले में दिक्कतें तो आती हैं । ऐसे में प्रो. कुमार स्पष्ट करते
हैं कि सबसे बड़ी निधि जनता होती है । वो यदि आपके साथ है, तो दुश्वार राहें भी
हमवार हो जाती हैं । चंदे से ज्योंहि 20 करोड़ रुपये इकट्ठे हुए, हमने स्वतः चंदा
लेना बंद कर दिया और कहीं किसी मोड़ पर घबराये नहीं । जनता को यदि लक्ष्य की
पवित्रता में यकीन हो, तो सारी मुश्किलें दूर हो जाती हैं । पार्टी का मकसद व्यवस्था-परिवर्तन
था, जो हर स्तर पर इस अभियान के दौरान साफ था । इसलिए बदलाव के सारथी को हर लिहाज
से ज़िम्मेदार दिखना चाहिए । इस चुनाव में 27 करोड़ रुपये ज़ब्त किये गये, जो
चुनाव आयोग द्वारा प्रति उम्मीदवार 16 लाख खर्च किये जाने की सीमा के लिहाज से 166
प्रत्याशियों को फंड करने के लिए काफी था ।
पूरे देश
में लोकतंत्र की जड़ें मज़बूत करने की कवायद के बीच आप- समर्थकों के समाजवाद के
केंद्र में आम आदमी घूमता हुआ दिखता है, जिसके राष्ट्रवाद में उन्माद की बू नज़र
नहीं आती । जहाँ तक राजनीति का जातीय समीकरण से प्रभावित होने की बात है, तो आम
आदमी को जाति के जंजाल से मुक्ति दिलाना, उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए
उनके सपने में रंग भरना आप का ध्येय रहा है । सदियों के कोढ़ की खाज
को मिटाना सहज नहीं है । पर आम लोगों ने तय किया कि उनकी बस एक ही जाति है और वो
है- मानव धर्म की । संस्थागत भ्रष्टाचार से हैरान-परेशान जनता जब इंदिरा गाँधी की
ग़लत नीतियों के खिलाफ अपना शक्ति-प्रदर्शन कर सकती है, तो शीला दीक्षित के कमज़ोर
नेतृत्व, त्रुटिपूर्ण निर्णय और राजनीतिक अक्षमता को कब तक बर्दाश्त करती ?
पर, वो कौन- सी वाजिब वजहें रहीं, जिनके
चलते आप के पूरे देश के अंदर प्रसार की महत्वाकांक्षा को लोकसभा चुनाव में गहरा
धक्का लगा ? क्या यह उसकी ज़ल्दबाजी थी ? प्रतीकात्मक रूप से संदेश देने की राजनीति के
पैरोकार रहे केजरीवाल और उनके थिंकटैंक के अहम सदस्य योगेंद्र यादव, प्रो. आनंद
कुमार, राजमोहन गाँधी, मेधा पाटेकर, अत्युत्साही, किंतु अपरिपक्व कुमार विश्वास
समेत सारे दिग्गज पराजित हुए । योगेंद्र कह रहे थे, “हम दिल्ली में 2-3 सीटों के लिए तो
निश्चित रूप से आशान्वित थे । पर परिणाम हमारे प्रतिकूल रहा । पंजाब में ज़रूर 4
सीटें हासिल हुईं । पर अपनी सारी ऊर्जा को बनारस और अमेठी में केंद्रित करने से भी
बाकी सीटों पर ध्यान नहीं दे पाये”। एक तो आप उम्मीदवारों का लगातार
गैर-ज़िम्मेदाराना बयान आता रहा, मसलन शाजिया इल्मी का मुस्लिम मतदाताओं से आह्वान
कि “हमें
ज़्यादा धर्मनिरपेक्ष होने की ज़रूरत नहीं है”, प्रो. आनंद कुमार के प्रचार के दौरान आप
के विधायक- उम्मीदवार रहे कपिल मिश्रा का ज़ोर देकर कहना कि “मैं ब्राह्मण-पुत्र
हूँ”, कवि
कुमार विश्वास का अमेठी में खुद को ब्राह्मण बताना जहाँ एक ओर पिछड़े-दलित
मतदाताओं को उकसाने-भड़काने-मुँह चिढ़ाने जैसा था, वहीं पार्टी के ‘मानवता ही जाति’
के उसूल को तोड़ने
जैसा भी था ।
जिस
वाकये ने आप को सबसे ज़्यादा क्षति पहुँचायी, वो है केजरीवाल का एक विवादास्पद
इंटरव्यू । गौरतलब है कि केजरीवाल का आज तक के पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ
साक्षात्कार के बाद हुई रणनीतिक बातचीत व उसके कुछ खास प्रसंगों को प्रसारण के
दौरान हाइलाइट करने पर विशेष ज़ोर का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण हो सकता है, पर सियासी
व पत्रकारीय व्याख्या भी होनी चाहिए और ऐसा हुआ भी । फलतः मताधिकारियों की
प्रतिक्रिया ‘आप’ को देश भर में मिली महज चार सीटों व दिल्ली में सिफर के रूप में हुई ।
मार्च में एक अनौपचारिक बातचीत में टहलते हुए प्रो. वर्तिका नंदा ने कहा, आज की
तारीख में आम आदमी पार्टी मोस्ट इरिटेटिंग पार्टी लगती है ।
आप की फिसलन व ढलान की यात्रा का एक और अहम कारण 49 दिन तक शिक्षा मंत्री रहे मनीष सिसोदिया का वो प्रस्ताव भी रहा, जिसमें
नये विश्वविद्यालय व कॉलेज खोलने की बजाय उन्होंने दिल्ली वि.वि. के 12 राज्य
पोषित कॉलेजों में दिल्ली के बच्चों को 90 फीसदी आरक्षण की वकालत की । लिहाजा
दिल्ली वि.वि. के शिक्षकों व छात्रों का एक बड़ा तबका, जो आप को सत्ता दिलाने में
सहभागी रहा, की नाराज़गी तो पार्टी को झेलनी ही थी । इसने आप की राष्ट्रीय फलक पर
उपस्थिति की चाहत को चरमरा कर रख दिया। जब अपने ही देश में क्षेत्र के आधार पर
नामांकन में आरक्षण की वकालत होने लगे, तो उच्च शिक्षा की स्थिति में सुधार की
गुंजाइश को चोट पहुँचती है । दिल्ली वि.वि. की रौनक तो देश के कोने-कोने से आये
बच्चों की बहुआयामी प्रतिभा पर निर्भर करती है । क्षेत्रवाद को यह देश कभी कबूल
नहीं कर सकता ।
तो कुल मिलाकर क्षेत्रीय क्षत्रपों की
महत्वाकांक्षा, गठबंधन राजनीति की बाध्यता और तीसरे मोर्चे की एकजुटता के धूमिल
आसार के अवसर को सर्वश्रेष्ठ तरीके से भुनाते हुए बीजेपी ने महागठबंधन बनाया और 84
के बाद पहली बार किसी दल को अपने बूते स्पष्ट बहुमत मिला । भाजपा को 282 व राजग को
336 सीटें प्राप्त हुईं । कांग्रेस को अब तक के सबसे लचर प्रदर्शन में सिर्फ 44
सीटें मिलीं और आज वो विपक्ष के नेता पद की भी मोहताज है । सदन में तो विपक्ष नाम
मात्र की है, सड़क पर ही जनता को विरोध व माँग के स्वर तेज़ करने होंगे । दिल्ली की
बात करें तो पहले जहाँ सातों सीटों पर कांग्रेस का कब्जा था, वो सभी सीटें भाजपा
के हिस्से आ गयीं और आप का खाता तक न खुला । इस आम चुनाव में पिछले तीन दशकों में
सबसे ज़्यादा 64.77 फीसदी वोटिंग दिल्ली में हुई । 1.27 करोड़ मताधिकारियों में
3.37 लाख पहली बार वोटर बने थे । भाजपा का वोट प्रतिशत विधानसभा में मिले 33.07
फीसदी से बढ़कर 46.4 फीसदी हो गया । आप को सीटें भले न मिली हों, पर जनता का
विश्वास उस पर न सिर्फ बरकरार रहा, बल्कि पहले से भी बढ़ा और दिसंबर में मिले
29.49 फीसदी वोट से कहीं ज़्यादा 33 प्रतिशत वोट लोस चुनाव में हासिल हुए। हालाँकि
राजनीति में दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है, न ही वोट प्रतिशत का सीटों
से कोई सीधा-सीधा तादात्म्य संबंध होता है। बावजूद इसके, ये आँकड़े क्या इशारा करते
हैं ? इसके
निहितार्थ को समझना, इसकी विवेचना करना बहुत ज़रूरी है। जनता का मूड भाँपते हुए और
कांग्रेस-नीत संप्रग के शासनकाल की राजनीतिक-प्रशासनिक विसंगतियों तथा महँगाई की
मार से छुटकारा का वादा कर मतदाताओं को लुभाने में कामयाब रही भाजपा, अपने अतीत के
कारनामों से चाहकर भी पीछा न छुड़ा सकने वाली कांग्रेस और समय व अवसर की नब्ज़
पकड़ने में नाकाम रही आप में से कोई भी पार्टी अभी चुनाव की मुद्रा में खुलकर नजर नहीं आ
रही है।
बनारस की
जंग में शिकस्त के बाद केजरीवाल दिल्ली की जनता से माफी मांग चुके हैं कि सरकार
छोड़ना उनकी सबसे बड़ी भूल थी। और सच भी है कि सत्ता में रहकर लड़ाई बेहतर,
सकारात्मक और ज़ोरदार तरीके से लड़ी जा सकती थी। हालाँकि अब वो अपना पूरा ध्यान
दिल्ली पर केंद्रित करना चाह रहे हैं व आस-पास होने वाले अन्य राज्यों के चुनाव
में पार्टी की ऊर्जा को बिखरने से रोकेंगे। इसी बीच दिल्ली में सरकार बनाने की
उनकी कोशिश पर भाजपा ने उनकी काफी आलोचना की और उन्हें कदम वापस खींचने पड़े। अब
यक्ष प्रश्न यह है कि ये दोनों दल चुनाव में जाने से कतराते क्यों है और जनादेश के
साथ बार बार छेड़छाड़ करने के लोभ से बाज क्यों नही आते ?
दिसंबर
में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी डॉ. हर्षवर्धन ने साफगोई से
खरीद-फरोख़्त की किसी भी कोशिश के खिलाफ अपना बयान दिया कि जनादेश स्पष्ट रूप से
हमें विपक्ष में बैठने का संदेश दे रहा है और हम शिअद के साथ गठबंधन की 32 सीटों
के सहारे सरकार नहीं बना सकते। इस नैतिक बल का ही प्रभाव था कि जनता ने बीजेपी को
दिल खोलकर लोकसभा चुनाव में वोट दिया और समीपवर्ती राज्यों में भी इसका स्वच्छ
संदेश गया।
पर
अब जबकि केंद्र में प्रचंड बहुमत के रथ पर सवार बीजेपी को चुनावी कुरुक्षेत्र में
डटकर मुकाबला करना चाहिए, तो वो इसकी बजाय परिस्थिति पर पैनी नज़र रखने की बात
कहते हुए व्यावहारिक राजनीति का तकाजा समझा
रही है। किरण बेदी के नाम का पार्टी के अंदर घोर विरोध होने के बाद प्रदेश के
अनुभवी नेता जगदीश मुखी का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए आगे आ रहा है। कुछ माह पहले दिल्ली भाजपा
के प्रभारी प्रभात झा शान से विशुद्ध राजनैतिक भाषा में बयान दे रहे थे कि राजनीति
अतीत से नहीं चलती, वर्तमान के आलोक में नीति निर्धारित की जाती है। निर्णय ताज़ा
परिस्थितियों से निर्देशित होता है। हेनरी एडम्स ने ठीक ही कहा है-"प्रैक्टिकल पॉलिटिक्स कंसिस्ट्स इन इगनॉरिंग फैक्ट्स"। राजनीति में कौन अतीत में दिये गये अपने ही लोकप्रिय, प्रभावी और अलंकारिक नारों
की परवाह करता है ? कई बीजेपी नेता कांग्रेस के विधायकों का अपने सम्पर्क में होने की
बात कर रहे थे। वहीं केजरीवाल ने आरोप लगाया कि हमारे विधायक को खरीदने के लिए 20
करोड़ का आफर बीजेपी ने किया। बीजेपी नेता इसे झूठ की खेती बता रहे हैं।
प्रधानमंत्री ब्राजील में ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने गये थे और इधर यह सब
घटित हो रहा था। प्रभात झा ने पीएम के लौटने पर ही रणनीतिक स्थिति साफ होने की बात
कही थी।
आखिर ये सब क्यों हो रहा है? लॉर्ड एक्टन ने कभी कहा था- "पावर टेंड्स टू करप्ट एंड एबसअ्ल्यूट पावर करप्ट्स एबसअ्ल्यूटली"। बस इसी स्थिति से बचने के लिए क्षेत्रीय
दलों का अभ्युदय यथोचित लगता है। एक ठोस सरकार के लिए राजनीतिक दुर्बलता कहीं न
कहीं नकारात्मक माहौल बनाती है, जब जनता के प्रति जवाबदेही से बचने के लिए उसके
पास गठबंधन की लाचारी का घीसा- पीसा जवाब होता है। ऐसे जवाबों से जनता को दो-चार
ना होना पड़े, इसीलिए भारतीय जनता ने बीजेपी को उदार जनादेश दिया है, ना कि अनैतिक
रूप से दिल्ली में सरकार बनाने के लिए। “मैंने जो संग तराशा, वो ख़ुदा हो बैठा” । जो अपना इतिहास
भूलता है, उसका भूगोल बदल और बिगड़ जाता है। अतीत साक्षी है कि यूपी में कल्याण
सिंह को मुख्यमंत्री बनाने के लिए भाजपा ने कितने समझौते किए और सौ मंत्री बनाये
गये। नतीज़तन वर्षों से उसे वहाँ की जनता
ने सत्ता से दूर रखा है। दिल्ली में चुनाव आसन्न
है। ऐसे में भाजपा का गोल-मटोल, दंभ और दुस्साहस भरा स्टैण्ड उसे तात्क्षणिक सफलता
भले दिला दे, पर सियासत का दूरगामी धर्मयुद्ध वह हार जायेगी।
फिलवक्त
दिल्ली की मौजूदा सियासी हलचल और हालत देखकर मुझे मीर की वो पंक्तियाँ याद आती हैं
जो उन्होंने लखनऊ के मुशायरे में आहत होकर कहा था-
क्या
बूदो-बाश पूछो हो ए पूरब के साकिनों / मुझको ग़रीब जानकर हस-हस पुकार के ।
दिल्ली जो
एक शहर था आलम में इंतखाब / रहते थे मुंतखब ही जहाँ रोज़गार के ।
उसको फलक ने
लूटकर बर्बाद कर दिया / हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के ।
सच तो ये
है कि महँगाई को थामने में नाकाम रही राजग
सरकार के पास दिल्ली की जनता को आश्वस्त करने के लिए ठोस जवाब नहीं है, इसलिए उसके
विधायक केन्द्रीय नेतृत्व पर दवाब बना रहे हैं कि दोबार चुनाव हुआ तो नतीजे विपरीत
भी आ सकते हैं। देश में पहली बार ऐसा हुआ कि रेल यात्री किराया सीधे 14 प्रतिशत बढ़ा
दिया गया और उसका ठीकरा पिछली सरकार की अनुशंसा के सर फोड़ दिया गया। यदि ऐसा ही
था तो जनता को चुनाव में बताना चाहिए था कि हम भी आ गये तो महँगाई बेलगाम ही
रहेगी। ये दोहरा मापदंड नहीं चलने वाला।
केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दिल्ली का बजट पेश करते हुए कई
घोषणाएँ चुनाव को मद्देनज़र रखते हुए की हैं। पर कांग्रेस के दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने
सवाल किया कि अन्नश्री योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे की महिलाओं को प्रति माह मिलने
वाले 600 रुपये के भत्ते को क्यों वापस
लिया गया ? सरकार
ने 260 करोड़ की सब्सिडी दी है, जबकि पहले यह पावर टैरिफ में 30 प्रतिशत की कटौती
की बात कर रही थी । आर.एल.स्टीवेंसन ने ठीक ही कहा है - "हिस्ट्री इज़ पास्ट पॉलिटिक्स, एंड पॉलिटिक्स प्रेज़न्ट हिस्ट्री"। भाजपा जहाँ बजट के लोककल्याणकारी बिंदुओं को लेकर
जनता के बीच जा रही है, वहीं आप और कांग्रेस जनता से किये गये वादे के साथ
सूक्ष्मता से हुए खिलवाड़ को भुनाना चाहेंगी । अब तो भाजपा के साथ गठबंधन धर्म की
मजबूरी भी नहीं है, फिर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए उसकी सरकार
ने अब तक कौन-सा भगीरथ प्रयास किया, इसका हिसाब भी जनता लेगी । कांग्रेस के सामने
अपनी मौजूदा 8 सीटें बरकरार रखने की चुनौती है।
अब तो चुनाव ही एकमात्र अंतिम और
आदर्श रास्ता है। साढ़े चार लाख वोट लाकर बीजेपी के मनोज तिवारी से पराजित जेएनयू के समाजविज्ञान के प्रध्यापक व आप प्रत्याशी
डॉ. आनंद कुमार ने हमसे बातचीत में कहा- यदि हमारा मस्तिष्क ऐरोगेन्स सिंड्रोम व
अपरिवर्तनीयता का शिकार हो गया तो हमारा विकास अवरूद्ध हो जायेगा। यदि हम सापेक्ष
उत्कृष्टता व सफलता के प्रति शुष्क, तटस्थ और बेख़बर हो जायें, तो जो आवेग हमने
अर्जित किया है, वो खो देंगे। आने वाले दिन चुनौतियों से भरे होंगे। अपने अतीत के
कार्यों व भविष्य की ज़रूरतों के प्रति संतुलित रवैये की ज़रुरत है।
भारतीय
लोकतंत्र आयु के लिहाज से महज 66 साल का हुआ है। इसलिए सुधार की तमाम गुंजाइश के
बावजूद यह उस गंगाजल की तरह है जिसमें स्व-शुद्धीकरण की क्षमता है। जहां नापसंदगी
जताने हेतु नोटा का सुलभ विकल्प कहीं-न-कहीं आने वाले दिनों में राजनीतिक दलों पर
बेदाग उम्मीदवार को चुनाव में उतारने हेतु दबाव बढ़ायेगा, वहीं उन वोटरों को भी घर
से निकलने पर बाध्य करेगा, जो उम्मीदवारों की सूची देखकर नाक-भौं सिकोड़ते थे। इस लोकसभा
के चुनाव-परिणाम ने स्पष्ट किया कि कोरी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ही ज्यादा दिनों
तक सत्ता में नही रहा जा सकता। सेक्युलरिज्म की विस्तृत परिधि में धर्मानुकूल आचरण
भी आता है, जिसके सम्यक्-समग्र आयाम में मानवतावादी दृष्टिकोण होता है, जिसकी आभा ‘आखिरी इंसान’ तक पहुँचती है।
वैसे ही, राष्ट्रवाद के नाम पर ही उग्रता की राजनीति कर भोली भाली जनता को कब तक
ठगा जा सकता है?
आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव बताएगा कि जनता को विकासोन्मुख समाजवादी
एजेंडा रास आता है या लोकलुभावन चुनावी वादे, घोषणाएँ और नारे ? देखना है कि यह
चुनाव भी शराब व मत के चिर-परिचित गंदे संबंध को तोड़ पाता है या नहीं ? हालाँकि जनता के
अंदर इतनी चेतना अब दिखने लगी है कि काफी कुरेदने पर भी वो अपने पत्ते अंत तक नहीं
खोलती और अपने मनपसंद उम्मीदवार को वोट देकर निश्चिंत भाव से अपने घर लौट आती है।
हमें उम्मीद करनी चाहिए कि इस चुनाव में मताधिकारी साहसिक व विवेकपूर्ण निर्णय
लेते हुए राजनीतिक शुचिता को और भी आगे ले जाएँगे और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र
तमाम गंदगी से निज़ात पाकर अपने दामन को बेदाग रखते हुए परिपक्वता की राह पर
तीव्रतम गति से अग्रसर होगा । चुनावी नतीजे चाहे जैसे भी आयें, पर मुकाबला बेहद
दिलचस्प होगा।
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जयन्त जिज्ञासु,
(सम्प्रति सेंट स्टीवन’स कॉलेज, दिल्ली में की
कॉन्सेप्ट्स व क्रिटिकल थॉट् पाठ्यक्रम में अध्ययनरत, भारतीय जनसंचार संस्थान,
दिल्ली से रेडिओ व टेलिविजन पत्रकारिता में स्नातकोत्तर उपाधि-पत्र, राज्य संपोषित
उच्च विद्यालय अलौली, खगड़िया एवं तेज नारायण बनैली महाविद्यालय, भागलपुर की उपज।
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