Monday, 25 August 2014




             बिहार विधानसभा उपचुनाव परिणाम की मनमानी मीमांसा


बिहार में हुए उपचुनाव के नतीजे की व्याख्या कुछ भले लोग जातीय समीकरण की जीत के रूप में कर रहे हैं। पता नहीं उनकी याद्दाश्त इतनी कमज़ोर क्यों हो जाती है? बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन चंद दिन पहले कह रहे थे कि राजद का सारा वोट जद यू. को नहीं मिल सकता, न ही जद यू. का शत प्रतिशत वोट राजद के पाले में जायेगा। तर्क ये कि जॉर्ज व नीतीश की समता पार्टी की बुनियाद लालू प्रसाद की कुछ नीतियों के विरोध में पड़ी थी, जो आगे चलकर जद यू. की शक्ल में सामने आया। अतः अपने अंतर्द्वन्द्वों के चलते यह गठबंधन फेल हो जायेगा।
अब जबकि राजनीति की प्रयोगशाला बिहार में इस बड़े गठबंधन ने बाजी मार ली, तो उसकी मीमांसा में कुतर्क गढ़े जा रहे हैं। भाजपा, लोजपा व उपेंद्र कुशवाहा के गठबंधन में इन भलेमानुषों को अवसरवाद व जातिवाद नहीं दीखता। कमरतोड़ महँगाई व रोज़मर्रा की चीज़ों के दाम में बेतहाशा वृद्धि, केंद्र की राजग सरकार की जनादेश के साथ अपनी मनमानी करने एवं मुख्यमंत्रियों के लगातार अपमान आदि के विरोध में जनता की यह सहज प्रतिक्रिया है। समय रहते चेत जायें, नहीं तो 2015 का परिणाम आपके अभिमान को धो कर रख देगा।
और हाँ, ये जंगलराज के आगमन की आशंका का राग अलापना छोड़ दीजिए, ये मर्सिया तराने किसी और दिन आपके काम आयेंगे। जब भी, जहाँ भी किसी वंचित, शोषित, उत्पीड़ित समाज की राजनीतिक अभिव्यक्ति पुख्ता ढंग से महसूस की जाने लगती है, लोकतंत्र को हाइजैक करने की मंशा पाले कुछ ठेकेदारों के पेट में दर्द शुरु हो जाता है, मानो लोकतंत्र को निखारने-सँवारने का दायित्व इकलौता इनका है। संघीय ढाँचे पर लगातार चोट करने वाले अब भी नहीं संभले , तो उनका मद उन्हें कहीं का न छोड़ेगा। बाकी रहा, इस गठबंधन के 2015 में और भी फलने-फूलने की बात और परिणामस्वरूप बिहार के रसातल में चले जाने की आपकी चिंता, तो आप फिक्र करना छोड़ दीजिए। बिहार के लोग राजनीतिक रूप से काफी परिपक्व हैं, सामाजिक समरसता की परिधि को भी अपरिमित करना बेहतर जानते हैं, अपना भला-बुरा उन्हें आपसे ज्यादा मालूम है।
मैं तो अक्सर कहता हूँ, भारतीय लोकतंत्र उस पुण्य-सलिला, सतत प्रवहमान गंगा की तरह है, जिसमें स्व-शुद्धीकरण की क्षमता है। तमाम सुधार की गुंजाइश के बावजूद यह अपनी गंदगी को खुद साफ कर लेगा। फिलहाल बिना किसी राग-द्वेष के, वैमनस्य के बिहार विधानसभा उपचुनाव के परिणाम को ठंडे मन से, निर्विकार भाव से स्वीकार कीजिए व लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था बनाए रखिए।

Tuesday, 19 August 2014



                                          भारतीय जनसंचार संस्थान की स्वर्णिम यात्रा

जिस संस्थान की आधारशिला तात्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री इंदिरा गाँधी ने आज से 50 साल पहले रखी थी, वो आज जनसंचार का विशाल वटवृक्ष बन चुका है। कभी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे साधकों के अध्ययन-अध्यापन-प्रशिक्षण का मक्का कहा जाने वाला भारतीय जनसंचार संस्थान पूरे एशिया में न सिर्फ़ सुविख्यात था, अपितु शीर्षस्थ भी। आज भी विकास पत्रकारिता की पढ़ाई करने दुनिया के कोने-कोने से विद्यार्थी यहाँ पहुँचते हैं। इस लब्धप्रतिष्ठ संस्थान ने देश को कई यशस्वी व ओजस्वी पत्रकार दिये हैं। इस वृहत् परिवार का अंग बनना एक गौरवशाली व सुखद अहसास है।

नज़रों में ताबे-दीद भी बाकी नहीं रही,
किससे नज़र मिलाऊँ तुझे देखने के बाद।
काबे का एहतराम भी मेरी नज़र में है,
सर किस तरफ झुकाऊँ तुझे देखने के बाद।

- सईद शाहिदी

कैबिनेट मिशन (1945) के प्रस्ताव पर गठित अंतरिम मंत्रीमंडल में सरदार वल्लभ भाई पटेल गृह के साथ-साथ सूचना व प्रसारण मंत्रालय भी संभाल रहे थे। इस देश में दो सूचना व प्रसारण मंत्री ऐसे हुए, जो बाद में चलकर प्रधानमंत्री भी बने- श्रीमती इंदिरा गाँधी एवं श्री इंद्र कुमार गुजराल। और, दो सूचना एवं प्रसारण मंत्री ऐसे हुए, जिन्होंने आगे चलकर लोकसभा में नेता, प्रतिपक्ष की सशक्त भूमिका निभाई- श्री लाल कृष्ण आडवाणी और श्रीमती सुषमा स्वराज। बावजूद इसके मीडिया-अमीरी व मीडिया-ग़रीबी के बीच बढ़ती खाई के बीच न सिर्फ़ ग़रीबी- रेखा के नीचे, बल्कि मीडिया-रेखा के नीचे भी जीने को विवश जनसामान्य के साथ न्याय करते हुए आज देश में जन प्रसारक की जो भूमिका दिखनी चाहिए थी, उसका सर्वथा अभाव नज़र आता है।


आइ.आइ.एमं.सी. सूचना प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त निकाय है। कई वर्षों से इसे सेंटर अॉफ एक्सलंस (उत्कृष्ट केंद्र) घोषित करने की बात चल रही है। पर, पिछली कुछ सरकारों के रवैये का पता इसी बात से चलता है कि सीधे संवाद व संचार से जुड़े इस अति महत्वपूर्ण मंत्रालय को कैबिनेट स्तर का मंत्री तक नसीब नहीं हुआ है। जिस तरह स्वास्थ्य मंत्रालय की देखरेख में एम्स चलता है, विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्रालय आइ.आइ.टी. को पुष्पित-पल्लवित करता है, वैसी ही ज़िम्मेदारी की स्वाभाविक अपेक्षा आइ.आइ.एम.सी., एफ.टी.आइ.आइ.,पुणे,एस.आर.एफ.टी.आइ., कोलकाता, आदि संस्थान के उन्नयन के लिए सूचना व प्रसारण मंत्रालय से की जाती है। इधर कुछ दिन पहले सरकार की तरफ से सकारात्मक संकेत मिले हैं कि अब यहाँ भी एम.ए., एम.फिल, पी.एच.डी. की पढ़ाई शुरु की जायेगी ।

 ये इसलिए भी ज़रूरी है कि आज पत्रकारिता के अकादमिक क्षेत्र में उम्दा शिक्षकों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। आइ.आइ.एम.सी. जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में बच्चे महज नौकरी पाने के लिए नहीं आते, कुछ बच्चे एकेडमिक्स में भी जाना चाहते हैं। उन बच्चों को बेसब्री से यहाँ एम.ए., एम.फिल, पी.एच.डी. का पाठ्यक्रम शुरु होने का इंतज़ार है। वस्तुतः रैंकिंग शोध कार्य की गुणवत्ता व प्रासंगिकता पर निर्भर करती है। छात्र यदि नोट्स बनाने में तल्लीन रहें, चीज़ों को समग्रता के साथ विश्लेषणात्मक दृष्टि से समझने-सीखने की ज़हमत न उठायें, पुस्तकालय में समय बिताने व पढ़ने की संस्कृति से विमुख हो जायें, तो नतीजा अनुकूल नहीं रहेगा। आज देश के चोटी के संस्थानों में आये गुणात्मक ह्रास और गिरावट को लेकर प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. यशपाल का मानना है, "जिन शिक्षा-संस्थानों में अनुसंधान और उसकी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता, वो न तो शिक्षा का भला कर पाते हैं और न समाज का। अच्छा शोध हमेशा विषय के दायरे के बाहर होता है। अगर ऐसा करने की इजाज़त न दी जाये और शिक्षक परंपरागत तरीके से काम करते रहें, तो शोध का कभी भला नहीं हो सकता। महज विशेषज्ञ बनने से काम चलने वाला नहीं"।  और ध्यातव्य है कि पत्रकारिता जीवन-क्षेत्र में हारे हुए व्यक्तियों की अंतिम शरणस्थली नहीं है। सुकून का विषय है कि देश भर के अंदर कुकुरमुत्ते की तरह पाँव पसार रहे पत्रकारिता के निजी संस्थानों की मौजूदगी, तमाम विचलन व फीस के नाम पर लगभग लूट के बीच  बच्चे  पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता के साथ आइ.आइ.एम.सी.  पहँचते हैं।


पिछले कई साल से छात्रों के लिए छात्रावास की अनुपलब्धता के पीछे ये दलीलें दी जाती रहीं कि पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से क्लिअरंस नहीं मिल पा रहा है, इसलिए छात्रावास-निर्माँण की बात आगे नहीं बढ़ पा रही है। अब तो सौभाग्यवश वन व पर्यावरण मंत्रालय तथा सूचना व प्रसारण मंत्रालय एक ही शख्स के ज़िम्मे है। फिर क्या वजह हुई इंतज़ार की ? मज़ाक में कल साथी निकेश मयूर  कह रहे थे, दरअस्ल, मामला परिसर के महज दो पेड़ों के चलते लटका हुआ है। उन्हीं दो पेड़ों के नीचे देश के दो ख्याति- प्राप्त पत्रकार को संचार-ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसलिए ऐतिहासिक महत्व के ये दो प्रेरणास्पद पेड़ न कटेंगे, न छात्रावास का निर्माण होगा। अब कोई रात में सुरक्षा-प्रहरियों को चकमा देकर उन्हें धराशायी कर दे, तो बात दीगर है। पर बुरी-डरावनी रातों में लगता नहीं कि कोई ख़ुद पर वन अधिनियम लगवाने का दुस्साहस दिखा पायेगा। वैसे, इधर कुछ छात्रों को छात्रावास की सुविधा उपलब्ध कराने का निर्णय आइ.आइ.एम.सी. प्रशासन ने लिया है, जो नाकाफ़ी है। प्रभो जावड़ेकर महाराज एफ.टी.आइ.आइ. हो आये आप, हमारे संस्थान के दिन कब बहुरेंगे ?

खैर, अपने इस प्रिय आँगन में आकर बेहद सुकून मिलता है। इरादे मज़बूत होते हैं, हौसलों को बल मिलता है और शुरु हो जाती है सपनों में नित नये-नये रंग भरने की पुनर्यात्रा।

दिल तुम्हारा है या हमारा है
हमसे ये फैसला नहीं होता।
-जिगर



आइ.आइ.एम.सी. के पास अगर सबसे ख़ूबसूरत कोई चीज़ है, तो वो है मीडिया-अध्ययन के लिहाज़ से देश भर में समृद्धतम इसका पुस्तकालय। यदि संयमित होकर यहाँ समय गुज़ारा जाये, तो इससे बेहतर कोई अनुभूति नहीं हो सकती। पत्रकारिता के इस मक्का के सृजनशील अध्याय   सिने मंच  ने अपनी सात महीने की यात्रा बड़ी खूबसूरती से पूरी की । मौजूदा सत्र की अपनी आखिरी प्रस्तुति के रूप में पिछले दिनों इस मंच ने "गाँधी माय फादर" बनाने वाले फिरोज़ अब्बास ख़ान निर्देशित सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य के ज़रिये कई सवालों व सरोकारों को कई बार स्पष्टता से तो कई बार सूक्ष्मता से उकेरती फिल्म  "देख तमाशा देख" की स्क्रीनिंग की । 


                               इस सिने मंच को बुनियादी तौर पर खड़ा करने में निष्काम कर्मयोगी, व्यवहारकुशल, प्रिय साथी अभिषेक चंचल जी, अपनी रचनात्मकता व सौम्यता के लिए चर्चित सेज़ल ललवानी, सृजनशील मोही नारायण, जौक़े-दीदार रखने वाले भाई अली अनवर, बहुमुखी प्रतिभा की धनी सौम्या शंकर, दीपक पटेल, ओमप्रकाश धीरज, मलयानिल, ज्योति राय आदि का अप्रतिम योगदान रहा है । एक आत्मीय संरक्षक की भाँति बच्चों के बीच लोकप्रिय, फीचर कम्यूनिकेशन के हमारे श्रद्धेय प्राध्यापक डॉ. आनन्द प्रधान निरंतर सिने मंच की क्रमिक प्रगति का न सिर्फ़ जायजा लेते रहे, अपितु प. बंगाल में पिछले दिनों संपन्न हुए एक फिल्म फेस्टिवल में सिने मंच की मौजूदगी दर्ज़ कराकर इसे राष्ट्रीय पहचान भी दिलाई ।

                                इस मंच ने जहाँ स्पिक मैके का कार्यक्रम आयोजित कराया, जिसमें पश्चिमी संगीत का आनंद हमने लिया, वहीं विशुद्ध भारतीय संगीत -सागर में निमज्जित होने का मौका भी दिया । कार्लाइल के शब्दों में, "संगीत आत्मा पर लगी हुई काई को साफ कर देता है"। शेक्सपीयर अपने चर्चित नाटक ट्वेल्फ्थ नाइट  में लिखते हैं : 

संगीत यदि है प्रेमाहार, तो बजने दो, बस बजने दो
इतना निमज्जित करो मुझे कि तृप्त हो जाये ये मन।
संगीत-क्षुधा हो रुग्ण औ' फिर शान्त।                             

 निर्भया पर सी.एन.एन. आइ.बी.एन. द्वारा बनाई गई डॉक्यमेंट्री का प्रदर्शन भी हमने देखा । साथ ही,  कई अहम मुद्दों पर हमने सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में एक दृष्टि के साथ ईमानदार, प्रखर व सुचिंतित चर्चा भी की ।

                              इस मंच ने मेरे जैसे सिनेमा के महज उभरते हुए दर्शक को कई बारीकियाँ सिखाईं, समग्र समझ विकसित करने में मदद की । मैंने बड़े चाव से हर डॉक्यमेंट्री देखी  । एकाध मौके को छोड़कर सिने मंच द्वारा प्रदर्शित शायद ही कोई ऐसी फिल्म हो, जिसे देखने का लोभ संवरण मुझसे हुआ हो । संवाद-सत्र को साथियों ने अपने अनछुए प्रश्नों व गंभीर, मारक तथा अर्थपूर्ण टिप्पणियों से काफी दिलचस्प और निहितार्थ पूरा करने वाला बनाया ।

                               आने वाले दिनों में यह सिने मंच प्रज्ञावान प्राध्यापक डॉ. आनंद प्रधान के कुशल नेतृत्व में आगामी सत्र के विद्यार्थियों के सांस्कृतिक बोध, कला-बोध, रंग-बोध, युग-बोध एवं उनकी सृजनशीलता, रचनाधर्मिता तथा अध्यवसाय के सहारे नित नयी बुलंदियों को छुए, प्रशिक्षुओं-अध्येताओं की अभिरूचि को निखारे और अपनी विशिष्ट पहचान व प्रासंगिकता बचाये व बनाये रखे - यही मेरी आत्मिक अभिलाषा है ।

 इस स्वर्णिम अवसर पर द सन्डे अब्जर्वर , इंडिअन पोस्ट, दी इंडिपेंडंट, द पाइअनिअर(दिल्ली संस्करण) और आउटलुक  जैसे पत्र-पत्रिकाओं को संवार-निखार कर धारदार बनाने वाले जाने-माने पत्रकार विनोद मेहता ने "क्या प्रिंट मीडिया मृतप्राय है ?" विषयक ओजपूर्ण व्याख्यान दिया। बहुमुखी व बहुआयामी प्रतिभा के धनी मौजूदा सत्र के साधकों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम में एक-से-बढ़कर एक प्रस्तुति दी। मन खु़श हो गया। निस्संदेह ये उत्साहित बच्चे हमारे बैच के साथियों से कहीं ज़्यादा जीवन्त दिखे, बस थोड़ा-सा संयम व सलीका सीख ले, जो मुझे विश्वास है, यह कैम्पस उन्हें ख़ुद-ब-ख़ुद सिखा देगा।

एक बार पुनः आइआइ.एम.सी. को 50 वर्ष की अपनी शानदार व गरिमामयी यात्रा पूरी करने पर स्वर्णजयन्ती की अशेष आत्मिक बधाई व शुभकामनाएँ !

मेरा तसव्वुर, मेरे इरादे करेंगे फितरत पे हुक्मरानी
जहाँ फरिश्तों के पर हों लग़्ज़ां, मैं उस बुलंदी पे जा रहा हूँ।
-इक़बाल



          

Friday, 15 August 2014




                                                स्वाधीनता-दिवस का आह्वान

स्वाधीनता-दिवस की ढेर सारी बधाई !

"Man's fate may make him slave, but his nature remains unchanged."

हमारा वतन चतुर्दिक विकास की ओर तीव्रतम गति से अग्रसर हो, पर सामाजिक समरसता व सांप्रदायिक सौहार्द्र की क़ुर्बानी की क़ीमत पर कतई नहीं। इस जश्न के पाक मौके पर, आनंद के अतिरेक में कोई कमी किये बगैर थोड़ा-सा आत्म-विमर्श तो बनता है।

अपने पुरखों के धैर्य, शौर्य, त्याग और अात्मोत्सर्ग को सास्था नमन करते हुए उनकी हमारी नस्लों से उम्मीदों को नये सिरे से संपूर्ण आलोक में देखने की ज़रूरत आन पड़ी है। अब तक की यात्रा में हमने क्या पाया, क्या गँवाया...एक दृष्टि इस पर भी। क्या हम गाँधी के "आखिरी इंसान" से साक्षात्कार करने में अब भी कोसों पीछे नहीं हैं ? चलिए इसी बहाने अटल जी की इस कविता को थोड़ा समग्रता में देखते हैं, जो उन्होंने 15 अगस्त, 47 को व्यथित मन से लिखी थी :

पंद्रह अगस्त का दिन कहता --
आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाकी हैं,
रावी की शपथ न पूरी है।।
जिनकी लाशों पर पग धर कर
आज़ादी भारत में आई।
वे अब तक हैं खानाबदोश
ग़म की काली बदली छाई।।
कलकत्ते के फुटपाथों पर
जो आँधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पंद्रह अगस्त के
बारे में क्या कहते हैं।।
हिंदू के नाते उनका दु:ख
सुनते यदि तुम्हें लाज आती।
तो सीमा के उस पार चलो
सभ्यता जहाँ कुचली जाती।।
इंसान जहाँ बेचा जाता,
ईमान ख़रीदा जाता है।
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,
डालर मन में मुस्काता है।।
भूखों को गोली नंगों को
हथियार पिन्हाए जाते हैं।
सूखे कंठों से जेहादी
नारे लगवाए जाते हैं।।
लाहौर, कराची, ढाका पर
मातम की है काली छाया।
पख्तूनों पर, गिलगित पर है
ग़मगीन गुलामी का साया।।
बस इसीलिए तो कहता हूँ
आज़ादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं?
थोड़े दिन की मजबूरी है।।
दिन दूर नहीं खंडित भारत को
पुन: अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक
आज़ादी पर्व मनाएँगे।।
उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से
कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएँ,
जो खोया उसका ध्यान करें।।

अब गिलगित से गारो तक की अखंडता की चिंता तो नहीं करनी, पर जो देश हमारे हिस्से है, हमारे ज़िम्मे है, उसकी हित-चिन्ता तो हम कर ही सकते हैं। मानव संसाधन के विवेकशील विकास में, देश का वो बड़ा तबका, जो न सिर्फ़ ग़रीबी- रेखा के नीचे जीवन बसर करता है, बल्कि सही सूचनाओं के अभाव में मीडिया-रेखा के नीचे देश-दुनिया की हलचल से बेख़बर रहने को भी मजबूर है; उनको उनके लिए बनी लोक-कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ी सूचना-शक्ति से लैस करने में एवं भारत के सभी प्रदेशों की समुचित-समानुपातिक रिपोर्टिंग में हमारी कितनी आभा है- इसका सतत मूल्यांकन करने का वक़्त आ गया है। लोकतांत्रिक परंपराओं व मूल्यों को बचाने के प्रति हमारी जवाबदेही हमारे आचरण से झलकनी चाहिए ताकि मातृ-उर का पय बदनाम न होने पाये। गंगा-जमुनी तहज़ीब का सौरभ सदा-सर्वदा हमारे मन-प्राण को भिगोता रहे व दुनिया के मानचित्र पर हमारी गरिमामयी मौजूदगी अपरिवर्तित रहे !

एक बार पुनः सभी मित्रों को स्वतंत्रता-दिवस की अशेष बधाई !

Thursday, 14 August 2014


                             दिल्ली की पल-पल बदलती सियासत


दिल्ली की वर्तमान राजनीतिक अनिश्चितता, सरकार बनाने को लेकर तेज़ी से बदलते घटनाक्रम, केंद्र में मिली ज़बर्दस्त सफलता के बाद भाजपा की बढ़ती सक्रियता और नैतिकता व व्यावहारिकता के घुल-मिल जाने की कभी न बदलने वाली राजनीतिक नियति की पुनरावृत्ति की आशंका के बीच दिल्ली की आम जनता इस धुंधली तस्वीर की गर्द हटते देखना चाहती है । अब जबकि राज्यपाल ने तीनों प्रमुख दलों के नेता को बारी-बारी बुलाकर सरकार बनाने की संभावना व मंशा पर चर्चा की, तो तीनों ने मना कर दिया है। आखिर जिस काम को पाँच माह पहले निबटा कर राजनीतिक असमंजस को दूर किया जा सकता था, उसमें इतनी देर क्यों हुई ? इस उत्पन्न परिस्थिति को समझने के लिए ज़रा नेपथ्य की आवाज़ सुनते हैं ।

                    ऐसा नहीं कि सत्ता में रहकर बदलाव लाना संभव नहीं । नेल्सन मंडेला और लूला डिसिल्वा की मिसाल सामने है, जिन्होंने सत्ता में रहकर आम जनता की लड़ाई जारी रखी । दिल्ली की राजनीति में अण्णा आंदोलन के गर्भ से उपजी आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल से भी कुछ इसी तरह की भूमिका की अपेक्षा थी । अक्टूबर, 2013 में सी.आर. पार्क में उनसे एक बातचीत में मैंने सवाल किया था कि जे.पी. आंदोलन के बाद पहली बार लोग देशव्यापी स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में अण्णा आंदोलन के साथ खड़े थे । उस आंदोलन की ऊर्जा से आपकी पार्टी अभिसिंचित है । पर क्या यह जंग भी संपूर्ण क्रांति के प्राप्य की ढाई साल के अंदर विफलता की मानिंद आपसी मतभेद व अंदरूनी कलह की भेंट चढ़ जायेगी ? उन्होंने बड़ा सधा जवाब दिया, हम 1977 की ग़लतियों से सबक लेते हुए आगे बढ़ रहे हैं। जनता को मायूस नहीं होना पड़ेगा। सत्ता व मंत्री पद के लिए कोई मनमुटाव नहीं होगा जी। काश, ऐसा हो पाता ! बिन्नी, आगे चलकर शाजिया, आदि कई उदाहरण हैं, जिनकी वजह से पार्टी की किरकिरी हुई। गत वर्ष दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में पाँच साल के लिए अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित और ज़िम्मेदार हाथ में सौंपने की जागरूकता और उत्सुकता ने लगभग 66 % मतदाताओं को मताधिकार-केंद्र तक खींच लाया । पर कांग्रेस, भाजपा व आम आदमी पार्टी के बीच हुए त्रिकोणीय संघर्ष में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और त्रिशंकु विधानसभा में 31 सीटों वाली भाजपा ने नैतिक स्टैंड लेते हुए सरकार बनाने से साफ मना कर दिया ।

                    दिल्ली की सवा करोड़ जनता ने भ्रष्टाचार, बेरेजगारी, महँगाई, लूट, अपहरण, बलात्कार, लचर शासन आदि गंभीर चुनौतियों से मुक्ति के लिए वोट किया था । उन्हें सरकार चाहिए थी । 43 से घटकर 8 सीटों पर सिमट जाने वाली कांग्रेस शून्य से शुरुआत कर 28 सीटें लाने वाली आपको बिना शर्त समर्थन देने को राजी थी । आप ने जनमत कराकर सरकार बनाने का फैसला किया । रामलीला मैदान में शपथग्रहण समारोह में उमड़ी भीड़ सरकार से लोगों की अपार उम्मीदें बयां कर रही थी । पर मात्र 49 दिन में बिजली बिल कम करने, पानी के दाम घटाने जैसे कुछ उल्लेखनीय काम कर संख्या-बल की बाध्यता के चलते जनलोकपाल बिल पेश न कर पाने की विवशता को विफलता मानकर अरविंद ने 14 फरवरी को इस्तीफा दे दिया । राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है और विधानसभा निलंबित है ।

                     कुछ ने केजरीवाल को राजनीतिक शुचिता  का नया प्रतीक माना, तो कुछ ने उन्हें घोर अराजकतावादी की संज्ञा दी । ध्यातव्य है कि गाँधी को भी दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक अराजकतावादी कहा जाता है । आज के दिनांक में उनके अमोघ शस्त्रास्त्रों का प्रयोग जब कोई आम इंसान करने लगे, तो उसे संविधानभंजक तक करार दे दिया जाता है । सवाल यह है कि आप संवैधानिक दायरे में रहकर उस संविधान को अंदर से और कितना फैलाते हैं, विस्तार देते हैं  या फिर संविधान को सिकोड़ने में लग जाते हैं ?

                                         इसमें कोई दो राय नहीं है कि दिल्ली में आप ने सीमित संसाधन में दो स्थापित राष्ट्रीय दलों के समक्ष चुनौती प्रस्तुत करने, दिल्ली के साथ देश भर में सियासी पाकीज़गी का पैगाम देने, वर्षों से चली आ रही वोट और बेटी अपनी ही जाति को देने की गलत परंपरा और अवधारणा के खंडन समेत कई पहलुओं पर तन्मयता से काम किया । आखिर दिल्ली जैसे महानगरीय जनमानस वाले राज्य में आम इंसान कौन है, जिसको फोकस कर आप ने लगभग क्रांति की राह पर चलकर चुनाव लड़ा- यह सवाल सैद्धांतिक रूप से ज़ेहन में कौंधता है । मध्य वर्ग ही वह वर्ग है, जिसके असंतोष व आक्रोश को आप ने बड़ी सफाई से उभारा। बकौल प्रो. आनंद कुमार, झुग्गी-झोपड़ी वाले, जिन्हें रातों- रात शराब व चंद रूपये देकर खरीद लिया जाता था, ने इस बार आम आदमी पार्टी  के प्रति निष्ठा व्यक्त किया है। मध्यवर्ग, निम्नवर्ग और उच्चवर्ग के सुशिक्षित, विवेकशील मताधिकारियों ने निश्चित रुप से परिवर्तन को ध्यान में रखकर वोट दिया और राजनीतिक भविष्यवेत्ताओं की आँखे खोलकर रख दी हैं

                    जहाँ इतनी बड़ी मुहिम के साथ चुनाव लड़ा गया हो, वहाँ पैसे का प्रबंधन आसान नहीं होता और ईमानदारी से मुकाबले में दिक्कतें तो आती हैं । ऐसे में प्रो. कुमार स्पष्ट करते हैं कि सबसे बड़ी निधि जनता होती है । वो यदि आपके साथ है, तो दुश्वार राहें भी हमवार हो जाती हैं । चंदे से ज्योंहि 20 करोड़ रुपये इकट्ठे हुए, हमने स्वतः चंदा लेना बंद कर दिया और कहीं किसी मोड़ पर घबराये नहीं । जनता को यदि लक्ष्य की पवित्रता में यकीन हो, तो सारी मुश्किलें दूर हो जाती हैं । पार्टी का मकसद व्यवस्था-परिवर्तन था, जो हर स्तर पर इस अभियान के दौरान साफ था । इसलिए बदलाव के सारथी को हर लिहाज से ज़िम्मेदार दिखना चाहिए । इस चुनाव में 27 करोड़ रुपये ज़ब्त किये गये, जो चुनाव आयोग द्वारा प्रति उम्मीदवार 16 लाख खर्च किये जाने की सीमा के लिहाज से 166 प्रत्याशियों को फंड करने के लिए काफी था ।

                     पूरे देश में लोकतंत्र की जड़ें मज़बूत करने की कवायद के बीच आप- समर्थकों के समाजवाद के केंद्र में आम आदमी घूमता हुआ दिखता है, जिसके राष्ट्रवाद में उन्माद की बू नज़र नहीं आती । जहाँ तक राजनीति का जातीय समीकरण से प्रभावित होने की बात है, तो आम आदमी को जाति के जंजाल से मुक्ति दिलाना, उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उनके सपने में रंग भरना आप का ध्येय रहा है । सदियों के कोढ़ की खाज को मिटाना सहज नहीं है । पर आम लोगों ने तय किया कि उनकी बस एक ही जाति है और वो है- मानव धर्म की । संस्थागत भ्रष्टाचार से हैरान-परेशान जनता जब इंदिरा गाँधी की ग़लत नीतियों के खिलाफ अपना शक्ति-प्रदर्शन कर सकती है, तो शीला दीक्षित के कमज़ोर नेतृत्व, त्रुटिपूर्ण निर्णय और राजनीतिक अक्षमता को कब तक बर्दाश्त करती ?

                                         पर, वो कौन- सी वाजिब वजहें रहीं, जिनके चलते आप के पूरे देश के अंदर प्रसार की महत्वाकांक्षा को लोकसभा चुनाव में गहरा धक्का लगा ? क्या यह उसकी ज़ल्दबाजी थी ? प्रतीकात्मक रूप से संदेश देने की राजनीति के पैरोकार रहे केजरीवाल और उनके थिंकटैंक के अहम सदस्य योगेंद्र यादव, प्रो. आनंद कुमार, राजमोहन गाँधी, मेधा पाटेकर, अत्युत्साही, किंतु अपरिपक्व कुमार विश्वास समेत सारे दिग्गज पराजित हुए । योगेंद्र कह रहे थे, हम दिल्ली में 2-3 सीटों के लिए तो निश्चित रूप से आशान्वित थे । पर परिणाम हमारे प्रतिकूल रहा । पंजाब में ज़रूर 4 सीटें हासिल हुईं । पर अपनी सारी ऊर्जा को बनारस और अमेठी में केंद्रित करने से भी बाकी सीटों पर ध्यान नहीं दे पाये। एक तो आप उम्मीदवारों का लगातार गैर-ज़िम्मेदाराना बयान आता रहा, मसलन शाजिया इल्मी का मुस्लिम मतदाताओं से आह्वान कि हमें ज़्यादा धर्मनिरपेक्ष होने की ज़रूरत नहीं है”, प्रो. आनंद कुमार के प्रचार के दौरान आप के विधायक- उम्मीदवार रहे कपिल मिश्रा का ज़ोर देकर कहना कि मैं ब्राह्मण-पुत्र हूँ”, कवि कुमार विश्वास का अमेठी में खुद को ब्राह्मण बताना जहाँ एक ओर पिछड़े-दलित मतदाताओं को उकसाने-भड़काने-मुँह चिढ़ाने जैसा था, वहीं पार्टी के मानवता ही जातिके उसूल को तोड़ने जैसा भी था ।

                            जिस वाकये ने आप को सबसे ज़्यादा क्षति पहुँचायी, वो है केजरीवाल का एक विवादास्पद इंटरव्यू । गौरतलब है कि केजरीवाल का आज तक के पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ साक्षात्कार के बाद हुई रणनीतिक बातचीत व उसके कुछ खास प्रसंगों को प्रसारण के दौरान हाइलाइट करने पर विशेष ज़ोर का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण हो सकता है, पर सियासी व पत्रकारीय व्याख्या भी होनी चाहिए और ऐसा हुआ भी । फलतः मताधिकारियों की प्रतिक्रिया आपको देश भर में मिली महज चार सीटों व दिल्ली में सिफर के रूप में हुई । मार्च में एक अनौपचारिक बातचीत में टहलते हुए प्रो. वर्तिका नंदा ने कहा, आज की तारीख में आम आदमी पार्टी मोस्ट इरिटेटिंग पार्टी लगती है ।

                 आप की फिसलन व ढलान की यात्रा का एक और अहम कारण 49 दिन तक शिक्षा मंत्री रहे मनीष सिसोदिया का वो प्रस्ताव भी रहा, जिसमें नये विश्वविद्यालय व कॉलेज खोलने की बजाय उन्होंने दिल्ली वि.वि. के 12 राज्य पोषित कॉलेजों में दिल्ली के बच्चों को 90 फीसदी आरक्षण की वकालत की । लिहाजा दिल्ली वि.वि. के शिक्षकों व छात्रों का एक बड़ा तबका, जो आप को सत्ता दिलाने में सहभागी रहा, की नाराज़गी तो पार्टी को झेलनी ही थी । इसने आप की राष्ट्रीय फलक पर उपस्थिति की चाहत को चरमरा कर रख दिया। जब अपने ही देश में क्षेत्र के आधार पर नामांकन में आरक्षण की वकालत होने लगे, तो उच्च शिक्षा की स्थिति में सुधार की गुंजाइश को चोट पहुँचती है । दिल्ली वि.वि. की रौनक तो देश के कोने-कोने से आये बच्चों की बहुआयामी प्रतिभा पर निर्भर करती है । क्षेत्रवाद को यह देश कभी कबूल नहीं कर सकता ।

                   तो कुल मिलाकर क्षेत्रीय क्षत्रपों की महत्वाकांक्षा, गठबंधन राजनीति की बाध्यता और तीसरे मोर्चे की एकजुटता के धूमिल आसार के अवसर को सर्वश्रेष्ठ तरीके से भुनाते हुए बीजेपी ने महागठबंधन बनाया और 84 के बाद पहली बार किसी दल को अपने बूते स्पष्ट बहुमत मिला । भाजपा को 282 व राजग को 336 सीटें प्राप्त हुईं । कांग्रेस को अब तक के सबसे लचर प्रदर्शन में सिर्फ 44 सीटें मिलीं और आज वो विपक्ष के नेता पद की भी मोहताज है । सदन में तो विपक्ष नाम मात्र की है, सड़क पर ही जनता को विरोध व माँग के स्वर तेज़ करने होंगे । दिल्ली की बात करें तो पहले जहाँ सातों सीटों पर कांग्रेस का कब्जा था, वो सभी सीटें भाजपा के हिस्से आ गयीं और आप का खाता तक न खुला । इस आम चुनाव में पिछले तीन दशकों में सबसे ज़्यादा 64.77 फीसदी वोटिंग दिल्ली में हुई । 1.27 करोड़ मताधिकारियों में 3.37 लाख पहली बार वोटर बने थे । भाजपा का वोट प्रतिशत विधानसभा में मिले 33.07 फीसदी से बढ़कर 46.4 फीसदी हो गया । आप को सीटें भले न मिली हों, पर जनता का विश्वास उस पर न सिर्फ बरकरार रहा, बल्कि पहले से भी बढ़ा और दिसंबर में मिले 29.49 फीसदी वोट से कहीं ज़्यादा 33 प्रतिशत वोट लोस चुनाव में हासिल हुए। हालाँकि राजनीति में दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है, न ही वोट प्रतिशत का सीटों से कोई सीधा-सीधा तादात्म्य संबंध होता है। बावजूद इसके, ये आँकड़े क्या इशारा करते हैं ? इसके निहितार्थ को समझना, इसकी विवेचना करना बहुत ज़रूरी है। जनता का मूड भाँपते हुए और कांग्रेस-नीत संप्रग के शासनकाल की राजनीतिक-प्रशासनिक विसंगतियों तथा महँगाई की मार से छुटकारा का वादा कर मतदाताओं को लुभाने में कामयाब रही भाजपा, अपने अतीत के कारनामों से चाहकर भी पीछा न छुड़ा सकने वाली कांग्रेस और समय व अवसर की नब्ज़ पकड़ने में नाकाम रही आप में से कोई भी पार्टी अभी चुनाव की मुद्रा में खुलकर नजर नहीं आ रही है।  

                   बनारस की जंग में शिकस्त के बाद केजरीवाल दिल्ली की जनता से माफी मांग चुके हैं कि सरकार छोड़ना उनकी सबसे बड़ी भूल थी। और सच भी है कि सत्ता में रहकर लड़ाई बेहतर, सकारात्मक और ज़ोरदार तरीके से लड़ी जा सकती थी। हालाँकि अब वो अपना पूरा ध्यान दिल्ली पर केंद्रित करना चाह रहे हैं व आस-पास होने वाले अन्य राज्यों के चुनाव में पार्टी की ऊर्जा को बिखरने से रोकेंगे। इसी बीच दिल्ली में सरकार बनाने की उनकी कोशिश पर भाजपा ने उनकी काफी आलोचना की और उन्हें कदम वापस खींचने पड़े। अब यक्ष प्रश्न यह है कि ये दोनों दल चुनाव में जाने से कतराते क्यों है और जनादेश के साथ बार बार छेड़छाड़ करने के लोभ से बाज क्यों नही आते ?

                         दिसंबर में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी डॉ. हर्षवर्धन ने साफगोई से खरीद-फरोख़्त की किसी भी कोशिश के खिलाफ अपना बयान दिया कि जनादेश स्पष्ट रूप से हमें विपक्ष में बैठने का संदेश दे रहा है और हम शिअद के साथ गठबंधन की 32 सीटों के सहारे सरकार नहीं बना सकते। इस नैतिक बल का ही प्रभाव था कि जनता ने बीजेपी को दिल खोलकर लोकसभा चुनाव में वोट दिया और समीपवर्ती राज्यों में भी इसका स्वच्छ संदेश गया।

                         पर अब जबकि केंद्र में प्रचंड बहुमत के रथ पर सवार बीजेपी को चुनावी कुरुक्षेत्र में डटकर मुकाबला करना चाहिए, तो वो इसकी बजाय परिस्थिति पर पैनी नज़र रखने की बात कहते हुए व्यावहारिक राजनीति  का तकाजा समझा रही है। किरण बेदी के नाम का पार्टी के अंदर घोर विरोध होने के बाद प्रदेश के अनुभवी नेता जगदीश मुखी का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए आगे आ रहा है। कुछ माह पहले दिल्ली भाजपा के प्रभारी प्रभात झा शान से विशुद्ध राजनैतिक भाषा में बयान दे रहे थे कि राजनीति अतीत से नहीं चलती, वर्तमान के आलोक में नीति निर्धारित की जाती है। निर्णय ताज़ा परिस्थितियों से निर्देशित होता है। हेनरी एडम्स ने ठीक ही कहा है-"प्रैक्टिकल पॉलिटिक्स कंसिस्ट्स इन इगनॉरिंग फैक्ट्स"। राजनीति में कौन अतीत में दिये गये  अपने ही लोकप्रिय, प्रभावी और अलंकारिक नारों की परवाह करता है ? कई बीजेपी नेता कांग्रेस के विधायकों का अपने सम्पर्क में होने की बात कर रहे थे। वहीं केजरीवाल ने आरोप लगाया कि हमारे विधायक को खरीदने के लिए 20 करोड़ का आफर बीजेपी ने किया। बीजेपी नेता इसे झूठ की खेती बता रहे हैं। प्रधानमंत्री ब्राजील में ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने गये थे और इधर यह सब घटित हो रहा था। प्रभात झा ने पीएम के लौटने पर ही रणनीतिक स्थिति साफ होने की बात कही थी।

                            आखिर ये सब क्यों हो रहा है? लॉर्ड एक्टन ने कभी कहा था- "पावर टेंड्स टू करप्ट एंड एबसअ्ल्यूट पावर करप्ट्स एबसअ्ल्यूटली"।  बस इसी स्थिति से बचने के लिए क्षेत्रीय दलों का अभ्युदय यथोचित लगता है। एक ठोस सरकार के लिए राजनीतिक दुर्बलता कहीं न कहीं नकारात्मक माहौल बनाती है, जब जनता के प्रति जवाबदेही से बचने के लिए उसके पास गठबंधन की लाचारी का घीसा- पीसा जवाब होता है। ऐसे जवाबों से जनता को दो-चार ना होना पड़े, इसीलिए भारतीय जनता ने बीजेपी को उदार जनादेश दिया है, ना कि अनैतिक रूप से दिल्ली में सरकार बनाने के लिए। मैंने जो संग तराशा, वो ख़ुदा हो बैठा। जो अपना इतिहास भूलता है, उसका भूगोल बदल और बिगड़ जाता है। अतीत साक्षी है कि यूपी में कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाने के लिए भाजपा ने कितने समझौते किए और सौ मंत्री बनाये गये। नतीज़तन वर्षों से उसे  वहाँ की जनता ने सत्ता से दूर रखा है। दिल्ली में चुनाव आसन्न है। ऐसे में भाजपा का गोल-मटोल, दंभ और दुस्साहस भरा स्टैण्ड उसे तात्क्षणिक सफलता भले दिला दे, पर सियासत का दूरगामी धर्मयुद्ध वह हार जायेगी।

                   फिलवक्त दिल्ली की मौजूदा सियासी हलचल और हालत देखकर मुझे मीर की वो पंक्तियाँ याद आती हैं जो उन्होंने लखनऊ के मुशायरे में आहत होकर कहा था-

                  क्या बूदो-बाश पूछो हो ए पूरब के साकिनों / मुझको ग़रीब जानकर हस-हस पुकार के ।
                  दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतखाब / रहते थे मुंतखब ही जहाँ रोज़गार के ।
                  उसको फलक ने लूटकर बर्बाद कर दिया / हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के ।

                 
                                     
सच तो ये है कि महँगाई को थामने में  नाकाम रही राजग सरकार के पास दिल्ली की जनता को आश्वस्त करने के लिए ठोस जवाब नहीं है, इसलिए उसके विधायक केन्द्रीय नेतृत्व पर दवाब बना रहे हैं कि दोबार चुनाव हुआ तो नतीजे विपरीत भी आ सकते हैं। देश में पहली बार ऐसा हुआ कि रेल यात्री किराया सीधे 14 प्रतिशत बढ़ा दिया गया और उसका ठीकरा पिछली सरकार की अनुशंसा के सर फोड़ दिया गया। यदि ऐसा ही था तो जनता को चुनाव में बताना चाहिए था कि हम भी आ गये तो महँगाई बेलगाम ही रहेगी। ये दोहरा मापदंड नहीं चलने वाला।


                          केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दिल्ली का बजट पेश करते हुए कई घोषणाएँ चुनाव को मद्देनज़र रखते हुए की हैं। पर कांग्रेस के दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने सवाल किया कि अन्नश्री योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे की महिलाओं को प्रति माह मिलने वाले  600 रुपये के भत्ते को क्यों वापस लिया गया ? सरकार ने 260 करोड़ की सब्सिडी दी है, जबकि पहले यह पावर टैरिफ में 30 प्रतिशत की कटौती की बात कर रही थी । आर.एल.स्टीवेंसन ने ठीक ही कहा है - "हिस्ट्री इज़ पास्ट पॉलिटिक्स, एंड पॉलिटिक्स प्रेज़न्ट हिस्ट्री"। भाजपा जहाँ बजट के लोककल्याणकारी बिंदुओं को लेकर जनता के बीच जा रही है, वहीं आप और कांग्रेस जनता से किये गये वादे के साथ सूक्ष्मता से हुए खिलवाड़ को भुनाना चाहेंगी । अब तो भाजपा के साथ गठबंधन धर्म की मजबूरी भी नहीं है, फिर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए उसकी सरकार ने अब तक कौन-सा भगीरथ प्रयास किया, इसका हिसाब भी जनता लेगी । कांग्रेस के सामने अपनी मौजूदा 8 सीटें बरकरार रखने की चुनौती है।

                          अब तो चुनाव ही एकमात्र अंतिम और आदर्श रास्ता है।  साढ़े चार लाख वोट लाकर बीजेपी के मनोज तिवारी से पराजित  जेएनयू के समाजविज्ञान के प्रध्यापक व आप प्रत्याशी डॉ. आनंद कुमार ने हमसे बातचीत में कहा- यदि हमारा मस्तिष्क ऐरोगेन्स सिंड्रोम व अपरिवर्तनीयता का शिकार हो गया तो हमारा विकास अवरूद्ध हो जायेगा। यदि हम सापेक्ष उत्कृष्टता व सफलता के प्रति शुष्क, तटस्थ और बेख़बर हो जायें, तो जो आवेग हमने अर्जित किया है, वो खो देंगे। आने वाले दिन चुनौतियों से भरे होंगे। अपने अतीत के कार्यों व भविष्य की ज़रूरतों के प्रति संतुलित रवैये की ज़रुरत है।

                       भारतीय लोकतंत्र आयु के लिहाज से महज 66 साल का हुआ है। इसलिए सुधार की तमाम गुंजाइश के बावजूद यह उस गंगाजल की तरह है जिसमें स्व-शुद्धीकरण की क्षमता है। जहां नापसंदगी जताने हेतु नोटा का सुलभ विकल्प कहीं-न-कहीं आने वाले दिनों में राजनीतिक दलों पर बेदाग उम्मीदवार को चुनाव में उतारने हेतु दबाव बढ़ायेगा, वहीं उन वोटरों को भी घर से निकलने पर बाध्य करेगा, जो उम्मीदवारों की सूची देखकर नाक-भौं सिकोड़ते थे। इस लोकसभा के चुनाव-परिणाम ने स्पष्ट किया कि कोरी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ही ज्यादा दिनों तक सत्ता में नही रहा जा सकता। सेक्युलरिज्म की विस्तृत परिधि में धर्मानुकूल आचरण भी आता है, जिसके सम्यक्-समग्र आयाम में मानवतावादी दृष्टिकोण होता है, जिसकी आभा आखिरी इंसान तक पहुँचती है। वैसे ही, राष्ट्रवाद के नाम पर ही उग्रता की राजनीति कर भोली भाली जनता को कब तक ठगा जा सकता है?

                              आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव बताएगा कि जनता को विकासोन्मुख समाजवादी एजेंडा रास आता है या लोकलुभावन चुनावी वादे, घोषणाएँ और नारे ? देखना है कि यह चुनाव भी शराब व मत के चिर-परिचित गंदे संबंध को तोड़ पाता है या नहीं ? हालाँकि जनता के अंदर इतनी चेतना अब दिखने लगी है कि काफी कुरेदने पर भी वो अपने पत्ते अंत तक नहीं खोलती और अपने मनपसंद उम्मीदवार को वोट देकर निश्चिंत भाव से अपने घर लौट आती है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि इस चुनाव में मताधिकारी साहसिक व विवेकपूर्ण निर्णय लेते हुए राजनीतिक शुचिता को और भी आगे ले जाएँगे और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र तमाम गंदगी से निज़ात पाकर अपने दामन को बेदाग रखते हुए परिपक्वता की राह पर तीव्रतम गति से अग्रसर होगा । चुनावी नतीजे चाहे जैसे भी आयें, पर मुकाबला बेहद दिलचस्प होगा।

-    जयन्त जिज्ञासु, 
(सम्प्रति सेंट स्टीवनस कॉलेज, दिल्ली में की कॉन्सेप्ट्स व क्रिटिकल थॉट् पाठ्यक्रम में अध्ययनरत, भारतीय जनसंचार संस्थान, दिल्ली से रेडिओ व टेलिविजन पत्रकारिता में स्नातकोत्तर उपाधि-पत्र, राज्य संपोषित उच्च विद्यालय अलौली, खगड़िया एवं तेज नारायण बनैली महाविद्यालय, भागलपुर की उपज।

                             

Tuesday, 5 August 2014






          सीसैट मामले में सरकार की दोहरी राजनीति और दोगली नीति


आज संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सीसैट मामले में जिस तरह भारतीय भाषाओं के प्रति न सिर्फ उदासीन रुख, बल्कि उपेक्षा-भाव बरता जा रहा है, हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों को एक ख़ास किस्म के षड्यंत्र के तहत अनुवाद के रद्दी स्तर में उलझाकर किनारे करने की साज़िश हो रही है, वो विचित्र व घोर दुर्भाग्यपूर्ण मौजूदा सच है। हमें ज़ल्द-से-ज़ल्द इस स्थिति को सुलझाना होगा। अंग्रेजी हमारी बौद्धिकता या निर्णय-क्षमता को आँकने का मापदण्ड नहीं हो सकती।  संघ लोक सेवा के लिए हिन्दी माध्यम से चयनित होने वाले छात्रों की संख्या 35 फीसदी तक पहुँच गयी थी, जो अंग्रेजीदाँ नीति-नियंताओं को खटकने लगी थी। सीसैट की दोषपूर्ण व परोक्षतः पक्षपातपूर्ण प्रणाली के चलते आज यह संख्या घटकर काफी कम हो चुकी है। संघ लोक सेवा आयोग की प्रतिष्ठित परीक्षा का प्रश्न-पत्र तैयार करने के दौरान अद्भुत अनुवादकों के हाथों जब 'स्टील प्लांट' अनूदित होकर 'इस्पात संयंत्र' की बजाय 'लोहे का पेड़' हो जाता है, तो इसे आप परीक्षार्थियों के साथ भद्दा मज़ाक नहीं, तो और क्या कहेंगे ? मुझे बरबस दिनकर की ये पंक्ति याद आ रही है :

लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम का गाता चल,
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर, आँसू के कण बरसाता चल।
सूरज है जग का बुझा-बुझा, चन्द्रमा मलिन-सा लगता है,
सब की कोशिश बेकार हुई, आलोक न इनका जगता है,
इन मलिन ग्रहों के प्राणों में कोई नवीन आभा भर दे,
जादूगर! अपने दर्पण पर घिसकर इनको ताज़ा कर दे।
दीपक के जलते प्राण, दिवाली तभी सुहावन होती है,
रोशनी जगत् को देने को अपनी अस्थियाँ जलाता चल।

सं.लो.से.आ. (यू.पी.एस.सी.) की परीक्षा ही ऐसी परीक्षा है, जो बहुत हद तक चयन-प्रक्रिया में पैरवी-तंत्र की दाल गलने नहीं देती और ग़रीब किसान का बेटा भी साक्षात्कार में सफलता सुनिश्चित करने के लिए ज़मीन बेचने की नहीं सोचता । अब यदि लोक-सेवा का भी द्वार बड़े सूक्ष्म-सुनियोजित तरीके से ऐसे वर्ग के लिए बंद कर दिया जाये, सदियों से जिसके पेट पर ही नहीं, दिमाग़ पर भी लात मारी गयी हो, तो यह कहीं-न-कहीं देश के सहिष्णु लोगों को गृहयुद्ध के लिए उकसाने जैसा है ।

मूल दिक्कत समझ (कॉम्प्रिहेंशन) के प्रश्नों के घटिया अनुवाद को लेकर है, जिस पर संबंधित मंत्री ने एक शब्द नहीं कहा । और, कुछ महाज्ञानी लोग अपने अंग्रेजी-ज्ञान का भोंडा प्रदर्शन करते हुए मसि-क्रीड़ा कर रहे हैं कि जिन्हें दसवीं के स्तर की अंग्रेजी नहीं आती, जो सड़क पर गैरज़िम्मेदारी से लड़ रहे हैं, वो लोकसेवक बन भी गये, तो कैसा प्रशासन चलाएँगे ? माफ कीजिएगा जनाब, यही परिवर्तन के पुरोधा लोग कार्यपालिका को सुदृढ़ व पारदर्शी बनायेंगे, आपके जैसे व्यवस्था व सूचना पर कुंडली मारकर बैठे यथास्थितिवादी लोगों ने तो अंग्रेजी में दार्शनिक भाषण दे-देकर जितना कबाड़ा करना था, कर दिया । अंग्रेजी का आतंक दिखाते हो, दादा ? अंग्रेजी की धौंस से अब गँवई लोग नहीं डरते । अंग्रेजी कोई ज्ञान का सूचकांक नहीं, भाषा मात्र है । और हाँ, हिन्दी बोलना-लिखना मेरी मजबूरी नहीं, मेरा शौक़ है और इस शौक को मैंने बड़े नाज से पाला है । कभी संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में बैठने का फितुर सवार हुआ, तो निस्संदेह अंग्रेजी माध्यम में परीक्षा दूँगा । पर इसका मतलब ये नहीं कि उन साथियों की वाजिब माँग का पुरज़ोर समर्थन न किया जाये, जो अपनी-अपनी भारतीय भाषा में सोचते हैं, पढ़ते हैं, उसे बड़ी श्रद्धा व गर्व से बरतते हैं ।

मुझे ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि थोड़ी-बहुत अंग्रेजी मैंने भी पढ़ी है । अंतर सिर्फ इतना कि आप वदरिंग हाइट्स को 5 घंटे में ख़त्म कर दोगे, मैं उसे 15 घंटे चाव से पढ़ूँगा, समझ में नहीं आयेगा कोई शब्द-संयोजन या वाक्य-विन्यास, तो शब्दकोश का सहारा लूँगा । आपका उच्चारण, ऐक्संट, डिक्शन सब बेशक बढ़िया है और हम पूरी गुणग्राह्यता व नम्रता के साथ आपको दाद भी देते हैं व आपसे सीखने की कोशिश भी करते हैं । आप विशेषाधिकार प्राप्त लोग हैं, पैदा होने के कुछ समय बाद किंड्गाट्न में आप डाल दिये गये, हम चबूतरे पर बरगद के नीचे बोरा-पट्टी-पेंसिल लेकर जाते थे । 1999 में बिहार में छठी जमात में जब दाखिला हुआ, तब हमें ऐल्फाबेट सिखाया गया और हम रटते थे- दिस इज़ एइ बॉल, दैट इज़ एइ डॉल। दीज़ अ ब्यूटीफुल गल्स, दोज़ अ हैंसम ब्वॉइज़। तो, आप बचपन से ही बड़ी सहजता से अंग्रेजी में सोच लेते हैं और ये बहुत प्रशंसनीय बात है । और, हम आज भी पहले मन ही मन हिन्दी में सोचते हैं, फिर उसका अंग्रेजी में अनुवाद करते हैं, तब जाकर कहीं बोल पाते हैं, वो भी ‘इज’ ही उच्चरित हो पाता है, ‘इज़’ स्वर बाहर निकले, इसके लिए अभी भी अभ्यास करना पड़ता है । अव्वल तो ये कि अंग्रेजी (प्रतिष्ठा) की पढ़ाई के दौरान भी द रेप आफ द लॉक और द स्कॉलर जिप्सी का हिन्दी अनुवाद भी साथ रखते थे, ताकि समझने में आसानी हो । लेकिन मेरे दोस्त, अहसासे-कमतरी का शिकार न कल था, न आज हूँ । एक जिद है, जुनून है कि नहीं, हम भी । आप जहाँ, वहाँ हम भी । और इसी प्रतिबद्धता ने खगड़िया से खींचकर भागलपुर, फिर भागलपुर से खींचकर दिल्ली ले आया ।

चलिए, फिर मनभेद कैसा, गिला कैसा, शिकायत कैसी ? देश आपका भी है, देश हमारा भी । स्वाधीनता व स्वशासन की लड़ाई हमारे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले पुरखों ने भी लड़ी है और स्वदेशी सोच के भारतीय भाषाओं के प्रति लगाव रखने वाले स्वाभिमानी बाप-दादों ने भी । आइए, सरकार से एक बार फिर अनुवाद के स्तर को संवेदनशीलता व उत्तरदायित्व के साथ ठीक करने की नम्र अपील के साथ दिनकर को याद करते हुए अभिमान व संकीर्णता (प्राइड व प्रेज्युडिश) का दौर खत्म करते हैं :

सिसकियों और चीत्कारों से, जितना भी हो आकाश भरा,
कंकालों का हो ढेर, खप्परों से चाहे हो पटी धरा ।
आशा के स्वर का भार, पवन को लेकिन, लेना ही होगा,
जीवित सपनों के लिए मार्ग मुर्दों को देना ही होगा।
रंगों के सातों घट उड़ेल, यह अँधियारी रंग जायेगी,
ऊषा को सत्य बनाने को जावक नभ पर छितराता चल।

आदर्शों से आदर्श भिड़े, प्रज्ञा प्रज्ञा पर टूट रही।
प्रतिमा प्रतिमा से लड़ती है, धरती की किस्मत फूट रही।
आवर्तों का है विषम जाल, निरुपाय बुद्धि चकराती है,
विज्ञान-यान पर चढी हुई सभ्यता डूबने जाती है।
जब-जब मस्तिष्क जयी होता, संसार ज्ञान से चलता है,
शीतलता की है राह हृदय, तू यह संवाद सुनाता चल।



क्या उन्हें देख विस्मित होना, जो हैं अलमस्त बहारों में,
फूलों को जो हैं गूँथ रहे सोने-चाँदी के तारों में ?
मानवता का तू विप्र, गन्ध-छाया का आदि पुजारी है,
वेदना-पुत्र ! तू तो केवल जलने भर का अधिकारी है।
ले बड़ी खुशी से उठा, सरोवर में जो हसता चाँद मिले,
दर्पण में रचकर फूल, मगर उस का भी मोल चुकाता चल।

लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम का गाता चल,
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर, आँसू के कण बरसाता चल।