भारतीय राजनीति में व्यक्ति-पूजन की भर्तस्नीय उग्रता
मोदी की आलोचना करने पर ए.बी.वी.पी. के एक छात्र नेता, जो छात्र संघ के संयुक्त सचिव भी हैं, द्वारा दिल्ली वि.वि. के उत्तरी परिसर के जंतु विज्ञान के प्राध्यापक प्रो. राय पर हाथ छोड़ना व उनके मुँह पर कालिख पोतना क्या दर्शाता है ? अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् अपने ध्येय में तीन शब्दों का बड़ी प्रमुखता से उल्लेख करता है- ज्ञान, शील और एकता । पर क्या यह क्षुद्र व्यवहार ज्ञानार्जन, शील-संवर्धन, संस्कार- परिमार्जन एवं एकीकरण का परिचायक है ?
असहमति और आलोचना तो लोकतंत्र की शर्त हैं । जब इनके प्रात: -आराध्य 56 इंच का सीना रखने वाले पुरुषार्थी मोदी जी, जिन्हें इन्होंने भगवान का दर्ज़ा दे रखा है, में अपनी आलोचना सहने की कुव्वत नहीं है, तो भला इन व्यक्ति-पूजक साधकों से न्यूनतम शालीनता की अपेक्षा ही बेमानी है ।
मुझे वोल्टेयर याद आते हैं,
"I may disagree with everything that you say, but I'll defend to the last drop of my blood your right to say so."
पर, उन्माद में कहाँ याद रह पाती हैं वही बातें, जिनका ज़िक्र खुद अटल जी संसद में विरोधियों को चुप कराने के लिए करते थे । वैसे भी अटल जी को इस पीढ़ी के "शीलवान, ज्ञानवान और एकता के सूत्र में बंधे" प्रमादी विद्यार्थियों को याद करने की फुरसत कहाँ ? उस पर धृष्टता ये कि बात-बात पर मोदी-भक्त संविधान की दुहाई देने लगते हैं, मानो ब्रह्म-मुहुर्त में देश का संविधान घोलकर इन्हीं लोगों ने पिया हो । कभी इनकी नेत्री भिक्षुणी बनने की धमकी देती थीं, जैसे राष्ट्रीय अस्मिता और गौरव की एकमात्र रक्षक वही हों ।
चुनाव के नतीजे आने के पूर्व ही किसी को अपना प्रधानमंत्री पद का नेता या दावेदार चुन लेना तो सूक्ष्म रूप से संवैधानिक मान्यता व परम्परा का अपमान व किसी संभावना के उपजने की प्रक्रिया का ही हनन है । लोकतंत्र की आस्था किसी व्यक्ति-विशेष में नहीं हो सकती । और जिन लोगों की याद्दाश्त दुरुस्त है, वे नहीं भूले होंगे कि 2004 में परिणाम की घोषणा आने के दिन तक भी किसी को अन्दाज़ा नहीं था कि जनता ने "फील गुड" व "इन्डिया शाइनिंग" कराने वाली अटल सरकार की रुखसती की गाथा लिख दी है ।
इसलिए, जोश व अति आत्मविश्वास में इतरा व इठला रहे इन कुशाग्र प्रज्ञावान तथा विवेकशील प्राणियों को थोड़ा धैर्य, संयम व इंतज़ार का मज़ा लेना चाहिए ताकि भारतीय लोकतंत्र के सौंदर्य का सही निदर्शन इन्हें मिल सके । राष्ट्र-निर्माता शिक्षक समुदाय की मान-मर्यादा को धूमिल करने का दुस्साहस करने वालों ! बबुआ याद रखअ् :
Many a slip between the cup and the lip.
No comments:
Post a Comment