सिने मंच : भारतीय जनसंचार संस्थान का स्वर्णिम सृजनशील अध्याय
"पत्रकारिता का मक्का" कहे जाने वाले भारतीय जनसंचार संस्थान, नयी दिल्ली के सिने मंच ने अपनी सात महीने की यात्रा बड़ी खूबसूरती से पूरी की । मौजूदा सत्र की अपनी आखिरी प्रस्तुति के रूप में पिछले दिनों इस मंच ने "गाँधी माय फादर" बनाने वाले फिरोज़ अब्बास ख़ान निर्देशित सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य के ज़रिये कई सवालों व सरोकारों को कई बार स्पष्टता से तो कई बार सूक्ष्मता से उकेरती फिल्म "देख तमाशा देख" की स्क्रीनिंग की ।
इस सिने मंच को बुनियादी तौर पर खड़ा करने में निष्काम कर्मयोगी, व्यवहारकुशल, प्रिय साथी अभिषेक चंचल जी, अपनी रचनात्मकता व सौम्यता के लिए चर्चित सेज़ल ललवानी, सृजनशील मोही नारायण, जौक़े-दीदार रखने वाले भाई अली अनवर, बहुमुखी प्रतिभा की धनी सौम्या शंकर, दीपक पटेल, ओमप्रकाश धीरज, मलयानिल, ज्योति राय आदि का अप्रतिम योगदान रहा है । एक आत्मीय संरक्षक की भाँति बच्चों के बीच लोकप्रिय, फीचर कम्यूनिकेशन के हमारे श्रद्धेय प्राध्यापक डॉ. आनन्द प्रधान निरंतर सिने मंच की क्रमिक प्रगति का न सिर्फ़ जायजा लेते रहे, अपितु प. बंगाल में पिछले दिनों संपन्न हुए एक फिल्म फेस्टिवल में सिने मंच की मौजूदगी दर्ज़ कराकर इसे राष्ट्रीय पहचान भी दिलाई ।
इस मंच ने जहाँ स्पिक मैके का कार्यक्रम आयोजित कराया, जिसमें पश्चिमी संगीत का आनंद हमने लिया, वहीं विशुद्ध भारतीय संगीत -सागर में निमज्जित होने का मौका भी दिया ।
“If music be the food of love, play on,
― William Shakespeare, Twelfth Night
[संगीत यदि है प्रेमाहार, तो बजने दो, बस बजने दो
निर्भया पर सी.एन.एन. आइ.बी.एन. द्वारा बनाई गई डॉक्यमेंट्री का प्रदर्शन भी हमने देखा । साथ ही, कई अहम मुद्दों पर हमने सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में एक दृष्टि के साथ ईमानदार, प्रखर व सुचिंतित चर्चा भी की ।
“If music be the food of love, play on,
Give me excess of it; that surfeiting,
The appetite may sicken, and so die.”
― William Shakespeare, Twelfth Night [संगीत यदि है प्रेमाहार, तो बजने दो, बस बजने दो
इतना निमज्जित करो मुझे कि तृप्त हो जाये ये मन।
संगीत-क्षुधा हो रुग्ण औ' फिर शान्त। ]
निर्भया पर सी.एन.एन. आइ.बी.एन. द्वारा बनाई गई डॉक्यमेंट्री का प्रदर्शन भी हमने देखा । साथ ही, कई अहम मुद्दों पर हमने सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में एक दृष्टि के साथ ईमानदार, प्रखर व सुचिंतित चर्चा भी की ।
इस मंच ने मेरे जैसे सिनेमा के महज उभरते हुए दर्शक को कई बारीकियाँ सिखाईं, समग्र समझ विकसित करने में मदद की । मैंने बड़े चाव से हर डॉक्यमेंट्री देखी । एकाध मौके को छोड़कर सिने मंच द्वारा प्रदर्शित शायद ही कोई ऐसी फिल्म हो, जिसे देखने का लोभ संवरण मुझसे हुआ हो । संवाद-सत्र को साथियों ने अपने अनछुए प्रश्नों व गंभीर, मारक तथा अर्थपूर्ण टिप्पणियों से काफी दिलचस्प और निहितार्थ पूरा करने वाला बनाया ।
आने वाले दिनों में यह सिने मंच प्रज्ञावान प्राध्यापक डॉ. आनंद प्रधान के कुशल नेतृत्व में आगामी सत्र के विद्यार्थियों के सांस्कृतिक बोध, कला-बोध, रंग-बोध, युग-बोध एवं उनकी सृजनशीलता, रचनाधर्मिता तथा अध्यवसाय के सहारे नित नयी बुलंदियों को छुए, प्रशिक्षुओं-अध्येताओं की अभिरूचि को निखारे और अपनी विशिष्ट पहचान व प्रासंगिकता बचाये व बनाये रखे - यही मेरी आत्मिक अभिलाषा है ।
मेरा तसव्वुर, मेरे इरादे करेंगे फितरत पे हुक्मरानी
जहाँ फरिश्तों के पर हों लग्ज़ां, मैं उस बुलंदी पे जा रहा हूँ ।
- इक़बाल
क्या लिखे हैं मित्र।वाह
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