Thursday, 2 July 2015

                                                                 
                                                           परवरिश का संकट

 हैम गिनॉट कहते हैं, "Children are like wet cement. Whatever falls on them makes an impression". अर्थात्, "बच्चे भीगे सीमेंट की तरह होते हैं। उन पर जो कुछ भी गिरता है, अपना असर छोड़ जाता है।"
बच्चों की अच्छी परवरिश भी एक कला है, जो सबको नहीं आती। वाक़ई, इस देश में पैरेन्टिंग की निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा दी जानी चाहिए। पहले बच्चे को बिगड़ने देंगे, फिर जब हाथ से सबकुछ निकल जाने का अहसास जगेगा, तो माथा पर हाथ रख कर भाग्य को कोसेंगे। बच्चों के बदले में लगभग ख़ुद परीक्षा देंगे, चोरी कराकर 75 % अंक प्राप्त करवायेंगे, बच्चों के मन से मेहनत पर से भरोसा उठवायेंगे, ईमानदारी के प्रति उदासीनता पैदा करायेंगे, फीयर साइकोसिस में रखेंगे। फिर, ये भी चाहेंगे कि रातोंरात बच्चे का कायाकल्प हो जाये, बच्चा चमत्कार कर दे। अपनी अधूरी इच्छा को पूरी करने हेतु जबरन बच्चे से साइंस पढ़वायेंगे, फिर उम्मीद करेंगे कि उनके बच्चे में पाइथागोरस, न्यूटन, डार्विन व रदरफोर्ड की रूह एक साथ प्रवेश करें। पर, क्या कीजै साहब, ऐसा होता नहीं। प्रो. वसीम बरेलवी कितना सही कहते हैं :

हमीं इनसे उम्मीदें आसमाँ छूने की करते हैं
हमीं बच्चों को अपने फ़ैसले करने नहीं देते ।

एक वक़्त के बाद यही बच्चे माँ-बाप की अवहेलना शुरू कर देते हैं। बगैर उनके मानस व उनकी अभिरूचि को समझे आप दिवास्वप्न पाल बैठेंगे, तो यही होगा। और, अंत में कुंठित होकर बच्चा शराबी होगा, जुआरी होगा, चरित्रहीन होगा और हो सकता है कि दुनिया का कोई ऐब उससे न छूटे। बच्चे पाँच बार फेल होंगे, होने दीजिए। पर, जब अनैतिक तरीक़े से आप उन्हें पास करवाते हैं, तो वे बच्चे आप जैसे चोर-बेईमान अभिभावक की इज़्ज़त क्यों करें ? कुछ पिता इस मत के भी होते हैं कि बच्चे को मार-पीटकर, ठोक-ठठाकर, डरा-धमकाकर ही इंसान बनाया जा सकता है। इससे घातक कोई तरीक़ा हो नहीं सकता। किसी ने ठीक ही कहा है :

ख़ौफ़ के साये में बच्चा बेज़बाँ हो जायेगा या बदज़ुबाँ हो जायेगा। 

बच्चे प्यार से समझते, संवरते व सुलझते हैं। वे अभिभावक के नैतिक बल व उनकी तपस्या से निखरते हैं। जिस दिन उन्हें लग गया कि मेरे माता-पिता के अंदरूनी व बाहरी शख़्सियत में तालमेल नहीं है; उनके मन में द्वन्द्व, संशय व विकार घर बनाने लगेंगे। फिर आप लाख कोशिश कर लीजिए, बच्चे आपके हाथ नहीं आने वाले। इसलिए, अपने बच्चों की हितचिंता करते हुए, उनके भविष्य-निर्माण के क्रम में कहीं आप ही उनका सर्वाधिक अहित न कर बैठें।

ख़ुशनसीब हैं वे बच्चे, जो अपने अभिभावक के लिए ये कह पाते हैं कि I've chosen my parents wisely. और, यही अभिभावकत्व की सफलता का सूचकांक है। बच्चों के लिए समय निकालना पड़ता है, वरना सामाजिक सरोकारों के प्रति आपकी प्रतिबद्धता भी कुपोषण का शिकार समाज ही बनायेगी।
तस्वीर : सौजन्य से, गूगल

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