चेतना व संवेदना के साहित्यकार प्रेमचन्द
आज मानवीय व मानवेतर संवेदना व चेतना के अप्रतिम चितेरे , 'कलम के सिपाही' व हिन्दी-उर्दू उपन्यास के कुशल कालजयी शिल्पी मुंशी प्रेमचंद की जयन्ती है। एक ऐसे दौर में जब सियासत व संस्थान शनैः-शनैः अपनी स्वायत्तता खोते जा रहे हैं, प्रेमचंद की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। पर, सवाल ये है कि जिसने पूस की रात देखी ही नहीं, वो हलकू का दर्द भला क्या जाने ?
एक ऐसे निष्ठावान साहित्यकार, जिन्हें 'कलम का मजदूर' भी कहा गया, की वास्तविक पूँजी मानवता के उन्नयन हेतु साहित्यिक हथियार का सदुपयोग करते हुए सामाजिक व राजनीतिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता थी, जिसका वे मृत्यु-शय्या तक निर्वहन करते रहे। "पंच परमेश्वर" से लेकर "कफन" तक एक सरल रेखा खींची जा सकती है, कहीं कोई वक्रता नहीं आयी। जहाँ एक ओर वे कहते हैं, "अपने उत्तरदायित्व का बोध बहुधा हमारे संकुचित विचारों का सुधारक होता है", वहीं दूसरी ओऱ पाखंड पर करारा प्रहार करते हुए कहते हैं, "ये कैसा रिवाज़ है कि जिसे जीते-जी तन ढकने के लिए चिथड़े नहीं नसीब होते, उसे मरने पर नया कफन चाहिए"। "शतरंज के खिलाड़ी" में नवाबी विलासिता पर चोट करते हुए लिखते हैं, "ये वो अहिंसा नहीं थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होकर पुष्प की वर्षा करते हैं, बल्कि ये वो अहिंसा थी, जिस पर कायर से कायर लोग भी आंसू बहाते हैं"। प्रेमचंद का युगबोध व सार्वभौमिकतायुक्त विपुल रचना-संसार हमारी चेतना को झकझोरता है, संवेदना को झिंझोरता है।
जब मैं स्नातक में छोटे-से शहर के बड़े कॉलिज टीएनबी कॉलिज, भागलपुर में पढ़ता था, तो प्रेमचंद जयन्ती पर कॉलिज में सबको कुछ-न-कुछ बोलना होता था। सौ अंक का "राष्ट्रभाषा हिन्दी" नामक पत्र हमें पढ़ाया जाता था। 2009 के प्रेमचंद जयन्ती कार्यक्रम में वनस्पति विज्ञान के एक साथी ने उठकर बोलना शुरू किया, "प्रेमचंद भारतमाता की सच्ची संतान थे। यदि हम उनकी कहानियों को नहीं पढ़ते हैं, तो ये न केवल हमारी संस्कारहीनता है, बल्कि प्रेमचंद जैसे महान सपूत की आत्मा को ठेस पहुँचाने जैसा है। हम कहाँ जा रहे हैं ? अपने वीर साहित्यकार को भूलते जा रहे हैं, जिन्होंने देश को आज़ाद कराने के लिए अद्भुत व अभूतपूर्व अंदाज़ मे लिखने के साथ-साथ पाँच बार जेल की सज़ा भोगी। प्रेमचंद ने न जाने कितनी कहानियाँ रच दीं, अनगिनत उपन्यास लिखे..."।
जब वो भलेमानुष व दुर्लभ नमूने कुछ ज़्यादा ही उग्र होकर प्रेमचंद पर अलौकिक जानकारी के साथ विशुद्ध अटकलबाजी पर उतर आये और राष्ट्रवादी तेवर में अपने ज्ञान का भोंडा प्रदर्शन करना शुरु कर दिया, तो हमारे श्रद्धेय प्राध्यापक प्रो. आलोक चौबे ने बीच में रोका, "भाई, प्रेमचंद की आत्मा की परवाह करना आप कृपया छोड़ दें, उन पर आपकी अद्भुत मीमांसा की कोई बाध्यता नहीं है। नहीं बोलना हो, तो बस शालीन श्रोता बनके बैठिये, पर प्रेमचंद के नाम पर इस कदर अफवाह न फैलायें। उनकी रचनाओं का एक हिसाब-किताब है।" तो, प्रत्युत्तर में ज्ञानी जी अपनी तीक्ष्ण प्रत्युत्पन्नमति का सहारा लेकर बोले, " सर, अब ये पुनीत मौका एक साल के बाद ही आयेगा, मुझे "पूस की रात" पर अपने शब्दों में कुछ प्रकाश डालने दीजिए। उस कहानी में मुझे सबसे ज़्यादा कुत्ते के साथ हलकू का सोना भाया। ऐसा चित्रण सिर्फ और सिर्फ श्री प्रेमचंद जी कर सकते थे । हिन्दी साहित्य में ऐसा मार्मिक वर्णन किसी और रचयिता के बूते से बाहर की बात है। प्रेमचंद जैसे कवि बार-बार पैदा नहीं होते।" इस पर सर ने कहा, "क्या आपने आज तक प्रेमचंद की कोई कविता पढ़ी है"?
बीजगणित (अलज़ेब्रा) की किताब बेचकर यदि प्रेमचंद ने तिलिस्म की किताब खरीद ली, तो क्या ग़लत किया ? जो इंसान ज़िन्दगी की भाषा समझता है, वो गणित की भाषा समझता भी नहीं, और न ही उसकी कोई ज़रूरत है।
हमें अपनी नयी नस्ल की बेचैनी व छटपटाहट को समझते हुए अपने नायकों की समृद्ध साहित्यिक व बौद्धिक विरासत से उन्हें अवगत कराने की आवश्यकता है, ताकि उन्हें भटकाव से रोका जा सके। प्रेमचंद कहते हैं, "चरित्र के भ्रष्ट होने का ख़तरा खुली आबो-हवा में उतना नहीं होता, जितना कि बंद कमरे में"। इसलिए, हम अपने बच्चों को वाजिब व ज़रूरी आज़ादी भी दें व उनकी परवरिश पर भरोसा रखें, नहीं तो सामाजिक सरोकारों के प्रति हमारी सजगता व प्रतिबद्धता भी कुपोषण का शिकार समाज ही निर्मित करेंगी।
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