Friday, 31 July 2015


                                                चेतना व संवेदना के साहित्यकार प्रेमचन्द



आज मानवीय व मानवेतर संवेदना व चेतना के अप्रतिम चितेरे , 'कलम के सिपाही' व हिन्दी-उर्दू उपन्यास के कुशल कालजयी  शिल्पी मुंशी प्रेमचंद की जयन्ती है। एक ऐसे दौर में जब सियासत व संस्थान शनैः-शनैः अपनी स्वायत्तता खोते जा रहे हैं, प्रेमचंद की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। पर, सवाल ये है कि जिसने पूस की रात देखी ही नहीं, वो हलकू का दर्द भला क्या जाने ?


एक ऐसे निष्ठावान साहित्यकार, जिन्हें 'कलम का मजदूर' भी कहा गया, की वास्तविक पूँजी मानवता के उन्नयन हेतु साहित्यिक हथियार का सदुपयोग करते हुए सामाजिक व राजनीतिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता थी, जिसका वे मृत्यु-शय्या तक निर्वहन करते रहे। "पंच परमेश्वर" से लेकर "कफन" तक एक सरल रेखा खींची जा सकती है, कहीं कोई वक्रता नहीं आयी। जहाँ एक ओर वे कहते हैं, "अपने उत्तरदायित्व का बोध बहुधा हमारे संकुचित विचारों का सुधारक होता है", वहीं दूसरी ओऱ पाखंड पर करारा प्रहार करते हुए कहते हैं, "ये कैसा रिवाज़ है कि जिसे जीते-जी तन ढकने के लिए चिथड़े नहीं नसीब होते, उसे मरने पर नया कफन चाहिए"। "शतरंज के खिलाड़ी" में नवाबी विलासिता पर चोट करते हुए लिखते हैं, "ये वो अहिंसा नहीं थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होकर पुष्प की वर्षा करते हैं, बल्कि ये वो अहिंसा थी, जिस पर कायर से कायर लोग भी आंसू बहाते हैं"। प्रेमचंद का युगबोध व सार्वभौमिकतायुक्त विपुल रचना-संसार हमारी चेतना को झकझोरता है, संवेदना को झिंझोरता है।

जब मैं स्नातक में छोटे-से शहर के बड़े कॉलिज टीएनबी कॉलिज, भागलपुर में पढ़ता था, तो प्रेमचंद जयन्ती पर कॉलिज में सबको कुछ-न-कुछ बोलना होता था। सौ अंक का "राष्ट्रभाषा हिन्दी" नामक पत्र हमें पढ़ाया जाता था। 2009 के प्रेमचंद जयन्ती कार्यक्रम में वनस्पति विज्ञान के एक साथी ने उठकर बोलना शुरू किया, "प्रेमचंद भारतमाता की सच्ची संतान थे। यदि हम उनकी कहानियों को नहीं पढ़ते हैं, तो ये न केवल हमारी संस्कारहीनता है, बल्कि प्रेमचंद जैसे महान सपूत की आत्मा को ठेस पहुँचाने जैसा है। हम कहाँ जा रहे हैं ? अपने वीर साहित्यकार को भूलते जा रहे हैं, जिन्होंने देश को आज़ाद कराने के लिए अद्भुत व अभूतपूर्व अंदाज़ मे लिखने के साथ-साथ पाँच बार जेल की सज़ा भोगी। प्रेमचंद ने न जाने कितनी कहानियाँ रच दीं, अनगिनत उपन्यास लिखे..."।

जब वो भलेमानुष व दुर्लभ नमूने कुछ ज़्यादा ही उग्र होकर प्रेमचंद पर अलौकिक जानकारी के साथ विशुद्ध अटकलबाजी पर उतर आये और राष्ट्रवादी तेवर में अपने ज्ञान का भोंडा प्रदर्शन करना शुरु कर दिया, तो हमारे श्रद्धेय प्राध्यापक प्रो. आलोक चौबे ने बीच में रोका, "भाई, प्रेमचंद की आत्मा की परवाह करना आप कृपया छोड़ दें, उन पर आपकी अद्भुत मीमांसा की कोई बाध्यता नहीं है। नहीं बोलना हो, तो बस शालीन श्रोता बनके बैठिये, पर प्रेमचंद के नाम पर इस कदर अफवाह न फैलायें। उनकी रचनाओं का एक हिसाब-किताब है।" तो, प्रत्युत्तर में ज्ञानी जी अपनी तीक्ष्ण प्रत्युत्पन्नमति का सहारा लेकर बोले, " सर, अब ये पुनीत मौका एक साल के बाद ही आयेगा, मुझे "पूस की रात" पर अपने शब्दों में कुछ प्रकाश डालने दीजिए। उस कहानी में मुझे सबसे ज़्यादा कुत्ते के साथ हलकू का सोना भाया। ऐसा चित्रण सिर्फ और सिर्फ श्री प्रेमचंद जी कर सकते थे । हिन्दी साहित्य में ऐसा मार्मिक वर्णन किसी और रचयिता के बूते से बाहर की बात है। प्रेमचंद जैसे कवि बार-बार पैदा नहीं होते।" इस पर सर ने कहा, "क्या आपने आज तक प्रेमचंद की कोई कविता पढ़ी है"?

बीजगणित (अलज़ेब्रा) की किताब बेचकर यदि प्रेमचंद ने तिलिस्म की किताब खरीद ली, तो क्या ग़लत किया ? जो इंसान ज़िन्दगी की भाषा समझता है, वो गणित की भाषा समझता भी नहीं, और न ही उसकी कोई ज़रूरत है।

हमें अपनी नयी नस्ल की बेचैनी व छटपटाहट को समझते हुए अपने नायकों की समृद्ध साहित्यिक व बौद्धिक विरासत से उन्हें अवगत कराने की आवश्यकता है, ताकि उन्हें भटकाव से रोका जा सके। प्रेमचंद कहते हैं, "चरित्र के भ्रष्ट होने का ख़तरा खुली आबो-हवा में उतना नहीं होता, जितना कि बंद कमरे में"। इसलिए, हम अपने बच्चों को वाजिब व ज़रूरी आज़ादी भी दें व उनकी परवरिश पर भरोसा रखें, नहीं तो सामाजिक सरोकारों के प्रति हमारी सजगता व प्रतिबद्धता भी कुपोषण का शिकार समाज ही निर्मित करेंगी।

Thursday, 9 July 2015

I'm fortunate enough that I can say that I chose my parents wisely. I respect the diversity and plurality of ideas, appreciate logical approach and always dare to disagree with superficial and shallow arguments. But, I never use abusive language in any discourse. But, it's also the fact that sometimes I'm badly misunderstood. This means that I'm not a good communicator.
"That is not what I meant at all.
That is not it, at all. (Eliot)

With all humility I want to say that some of my friends miserably lack the organic symbiosis between what they say and how they say. For the expression of disagreement, they cross all the limits. My ideal is Voltaire in the context of freedom of speech and expression. He aptly says, "I may disagree with everything that you say, but I'll defend to the last drop of my blood, your right to say so." Despite the inherent partial attitude and systemic irregularities and discrepancies, I endeavour to change the mindset of people who are in the habit of reinforcing the pre-existing system and maintaining status quo.
"I'm not here to fix blame for the past. I'm here to fix the course for the future."
- John F. Kennedy

But the problem with some of my friends (I don't know whether they are worthy of being called friend or not) is that they want to be famous overnight without perseverance and magnanimity.
बड़ी आसानी से मशहूर किया है ख़ुद को
मैंने अपने से बड़े शख़्स को गाली दी है।
- अशर
अपनी एड़ी पर ही चलो खड़े हो जाओ
मुझसे कुछ देर को होते हो बड़े, हो जाओ।
- प्रो. बरेलवी

It's advisable in the classical text :
परोक्षे कार्यहन्तारं, प्रत्यक्षे प्रियवादिनं।
वर्जयेतादृशं मित्रं, विषकुम्भं पयोमुखं।।
And, gradually I'm learning this art.

Thursday, 2 July 2015

                                                                 
                                                           परवरिश का संकट

 हैम गिनॉट कहते हैं, "Children are like wet cement. Whatever falls on them makes an impression". अर्थात्, "बच्चे भीगे सीमेंट की तरह होते हैं। उन पर जो कुछ भी गिरता है, अपना असर छोड़ जाता है।"
बच्चों की अच्छी परवरिश भी एक कला है, जो सबको नहीं आती। वाक़ई, इस देश में पैरेन्टिंग की निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा दी जानी चाहिए। पहले बच्चे को बिगड़ने देंगे, फिर जब हाथ से सबकुछ निकल जाने का अहसास जगेगा, तो माथा पर हाथ रख कर भाग्य को कोसेंगे। बच्चों के बदले में लगभग ख़ुद परीक्षा देंगे, चोरी कराकर 75 % अंक प्राप्त करवायेंगे, बच्चों के मन से मेहनत पर से भरोसा उठवायेंगे, ईमानदारी के प्रति उदासीनता पैदा करायेंगे, फीयर साइकोसिस में रखेंगे। फिर, ये भी चाहेंगे कि रातोंरात बच्चे का कायाकल्प हो जाये, बच्चा चमत्कार कर दे। अपनी अधूरी इच्छा को पूरी करने हेतु जबरन बच्चे से साइंस पढ़वायेंगे, फिर उम्मीद करेंगे कि उनके बच्चे में पाइथागोरस, न्यूटन, डार्विन व रदरफोर्ड की रूह एक साथ प्रवेश करें। पर, क्या कीजै साहब, ऐसा होता नहीं। प्रो. वसीम बरेलवी कितना सही कहते हैं :

हमीं इनसे उम्मीदें आसमाँ छूने की करते हैं
हमीं बच्चों को अपने फ़ैसले करने नहीं देते ।

एक वक़्त के बाद यही बच्चे माँ-बाप की अवहेलना शुरू कर देते हैं। बगैर उनके मानस व उनकी अभिरूचि को समझे आप दिवास्वप्न पाल बैठेंगे, तो यही होगा। और, अंत में कुंठित होकर बच्चा शराबी होगा, जुआरी होगा, चरित्रहीन होगा और हो सकता है कि दुनिया का कोई ऐब उससे न छूटे। बच्चे पाँच बार फेल होंगे, होने दीजिए। पर, जब अनैतिक तरीक़े से आप उन्हें पास करवाते हैं, तो वे बच्चे आप जैसे चोर-बेईमान अभिभावक की इज़्ज़त क्यों करें ? कुछ पिता इस मत के भी होते हैं कि बच्चे को मार-पीटकर, ठोक-ठठाकर, डरा-धमकाकर ही इंसान बनाया जा सकता है। इससे घातक कोई तरीक़ा हो नहीं सकता। किसी ने ठीक ही कहा है :

ख़ौफ़ के साये में बच्चा बेज़बाँ हो जायेगा या बदज़ुबाँ हो जायेगा। 

बच्चे प्यार से समझते, संवरते व सुलझते हैं। वे अभिभावक के नैतिक बल व उनकी तपस्या से निखरते हैं। जिस दिन उन्हें लग गया कि मेरे माता-पिता के अंदरूनी व बाहरी शख़्सियत में तालमेल नहीं है; उनके मन में द्वन्द्व, संशय व विकार घर बनाने लगेंगे। फिर आप लाख कोशिश कर लीजिए, बच्चे आपके हाथ नहीं आने वाले। इसलिए, अपने बच्चों की हितचिंता करते हुए, उनके भविष्य-निर्माण के क्रम में कहीं आप ही उनका सर्वाधिक अहित न कर बैठें।

ख़ुशनसीब हैं वे बच्चे, जो अपने अभिभावक के लिए ये कह पाते हैं कि I've chosen my parents wisely. और, यही अभिभावकत्व की सफलता का सूचकांक है। बच्चों के लिए समय निकालना पड़ता है, वरना सामाजिक सरोकारों के प्रति आपकी प्रतिबद्धता भी कुपोषण का शिकार समाज ही बनायेगी।
तस्वीर : सौजन्य से, गूगल