Thursday, 27 August 2015



दोस्तो, आपने नोस्टैल्जअ पर अलग-अलग भाषाओं की बहुत-सी कविताएँ पढ़ी होंगी। ज़रा इसे एक नज़र देखिए, आप यक़ीनन डूब जाएँगे, खो जाएँगे :

ये माज़ी जो मेरी तन्हाइयों के साथ रहता है
ये एक नादान बच्चे की तरह तन्हाई को मेरी
इशारा करता है ठोड़ी पकड़कर और कहता है-
वो देखो गाँव के सीने पे सर रखे हुए सरसों
तुम्हारी कमसीनी खेली है जिसकी गोद में बरसों
नुकूशे-पाशे अब तक हर गली की माँग रौशन है
अभी तक गोद फैलाये हुए डेरे का घर है
जामुन की कमज़ोर शाखों ने तुम्हारी
उंगलियों का हर निशां महफूज़ रखा है
लबों पे झील के बस है इक शिकवा
जबसे तुम गये हो कोई भी हम तक नहीं पहुँचा।

ये माज़ी जो मेरी तन्हाइयों के साथ रहता है...
वो देखो गाँव के खलिहानों में सोया हुआ झाड़ू
नशीली रात की रानी वो लौ देती हुई ख़ुशबू
दीयों का धीमी-धीमी रोशनी देना, धुआँ देना
शकस्ता झोपड़ों का ज़िन्दगी को लोड़ियाँ देना
खनकती है रसोईघर में अल्हड़ चूड़ियाँ अबतक
भरा के कुड़ियाँ लाती हैं सर पर बोरियाँ अबतक
तलैया के किनारे कच्ची ईंटों से बना मंदिर
सुलगते कंडों से उड़ती धूल की मलगुजी चादर
हरे खेतों की मेड़ों पर सुलगते जिस्म के साये
लरजते होंठ घबरायी हुई साँसों के अफसाने
लचकती आम की शाखों पे बल खाये हुए झूले
किसी का भागना ये कहके, कोई है हमें छू ले

ये माज़ी जो मेरी तन्हाइयों के साथ रहता है...
ये कहता है कि मैं गुज़री हुई बातों में खो जाऊँ
तुम्हारी ज़ुल्फ से महकी हुई रातों में खो जाऊँ
इसे मैं कैसे समझाऊँ कि ये माज़ी की तस्वीरें
अब एक ऐसी अमानत है जिसे मैं रख नहीं सकता
अगर रखूँ तो नाकारा, निकम्मा कहके ये दुनिया
मुझे ठोकर लगा दे और ख़ुद आगे को बढ़ जाये
मेरी पसमांदगी पर हर नज़र उठे, तरस खाये
मुझे मुर्दा अजायबघर की ऐसी मूर्ति समझे
जो सबको इसलिए प्यारी है कि काफी पुरानी है।

- डॉ. वसीम बरेलवी

Friday, 31 July 2015


                                                चेतना व संवेदना के साहित्यकार प्रेमचन्द



आज मानवीय व मानवेतर संवेदना व चेतना के अप्रतिम चितेरे , 'कलम के सिपाही' व हिन्दी-उर्दू उपन्यास के कुशल कालजयी  शिल्पी मुंशी प्रेमचंद की जयन्ती है। एक ऐसे दौर में जब सियासत व संस्थान शनैः-शनैः अपनी स्वायत्तता खोते जा रहे हैं, प्रेमचंद की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। पर, सवाल ये है कि जिसने पूस की रात देखी ही नहीं, वो हलकू का दर्द भला क्या जाने ?


एक ऐसे निष्ठावान साहित्यकार, जिन्हें 'कलम का मजदूर' भी कहा गया, की वास्तविक पूँजी मानवता के उन्नयन हेतु साहित्यिक हथियार का सदुपयोग करते हुए सामाजिक व राजनीतिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता थी, जिसका वे मृत्यु-शय्या तक निर्वहन करते रहे। "पंच परमेश्वर" से लेकर "कफन" तक एक सरल रेखा खींची जा सकती है, कहीं कोई वक्रता नहीं आयी। जहाँ एक ओर वे कहते हैं, "अपने उत्तरदायित्व का बोध बहुधा हमारे संकुचित विचारों का सुधारक होता है", वहीं दूसरी ओऱ पाखंड पर करारा प्रहार करते हुए कहते हैं, "ये कैसा रिवाज़ है कि जिसे जीते-जी तन ढकने के लिए चिथड़े नहीं नसीब होते, उसे मरने पर नया कफन चाहिए"। "शतरंज के खिलाड़ी" में नवाबी विलासिता पर चोट करते हुए लिखते हैं, "ये वो अहिंसा नहीं थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होकर पुष्प की वर्षा करते हैं, बल्कि ये वो अहिंसा थी, जिस पर कायर से कायर लोग भी आंसू बहाते हैं"। प्रेमचंद का युगबोध व सार्वभौमिकतायुक्त विपुल रचना-संसार हमारी चेतना को झकझोरता है, संवेदना को झिंझोरता है।

जब मैं स्नातक में छोटे-से शहर के बड़े कॉलिज टीएनबी कॉलिज, भागलपुर में पढ़ता था, तो प्रेमचंद जयन्ती पर कॉलिज में सबको कुछ-न-कुछ बोलना होता था। सौ अंक का "राष्ट्रभाषा हिन्दी" नामक पत्र हमें पढ़ाया जाता था। 2009 के प्रेमचंद जयन्ती कार्यक्रम में वनस्पति विज्ञान के एक साथी ने उठकर बोलना शुरू किया, "प्रेमचंद भारतमाता की सच्ची संतान थे। यदि हम उनकी कहानियों को नहीं पढ़ते हैं, तो ये न केवल हमारी संस्कारहीनता है, बल्कि प्रेमचंद जैसे महान सपूत की आत्मा को ठेस पहुँचाने जैसा है। हम कहाँ जा रहे हैं ? अपने वीर साहित्यकार को भूलते जा रहे हैं, जिन्होंने देश को आज़ाद कराने के लिए अद्भुत व अभूतपूर्व अंदाज़ मे लिखने के साथ-साथ पाँच बार जेल की सज़ा भोगी। प्रेमचंद ने न जाने कितनी कहानियाँ रच दीं, अनगिनत उपन्यास लिखे..."।

जब वो भलेमानुष व दुर्लभ नमूने कुछ ज़्यादा ही उग्र होकर प्रेमचंद पर अलौकिक जानकारी के साथ विशुद्ध अटकलबाजी पर उतर आये और राष्ट्रवादी तेवर में अपने ज्ञान का भोंडा प्रदर्शन करना शुरु कर दिया, तो हमारे श्रद्धेय प्राध्यापक प्रो. आलोक चौबे ने बीच में रोका, "भाई, प्रेमचंद की आत्मा की परवाह करना आप कृपया छोड़ दें, उन पर आपकी अद्भुत मीमांसा की कोई बाध्यता नहीं है। नहीं बोलना हो, तो बस शालीन श्रोता बनके बैठिये, पर प्रेमचंद के नाम पर इस कदर अफवाह न फैलायें। उनकी रचनाओं का एक हिसाब-किताब है।" तो, प्रत्युत्तर में ज्ञानी जी अपनी तीक्ष्ण प्रत्युत्पन्नमति का सहारा लेकर बोले, " सर, अब ये पुनीत मौका एक साल के बाद ही आयेगा, मुझे "पूस की रात" पर अपने शब्दों में कुछ प्रकाश डालने दीजिए। उस कहानी में मुझे सबसे ज़्यादा कुत्ते के साथ हलकू का सोना भाया। ऐसा चित्रण सिर्फ और सिर्फ श्री प्रेमचंद जी कर सकते थे । हिन्दी साहित्य में ऐसा मार्मिक वर्णन किसी और रचयिता के बूते से बाहर की बात है। प्रेमचंद जैसे कवि बार-बार पैदा नहीं होते।" इस पर सर ने कहा, "क्या आपने आज तक प्रेमचंद की कोई कविता पढ़ी है"?

बीजगणित (अलज़ेब्रा) की किताब बेचकर यदि प्रेमचंद ने तिलिस्म की किताब खरीद ली, तो क्या ग़लत किया ? जो इंसान ज़िन्दगी की भाषा समझता है, वो गणित की भाषा समझता भी नहीं, और न ही उसकी कोई ज़रूरत है।

हमें अपनी नयी नस्ल की बेचैनी व छटपटाहट को समझते हुए अपने नायकों की समृद्ध साहित्यिक व बौद्धिक विरासत से उन्हें अवगत कराने की आवश्यकता है, ताकि उन्हें भटकाव से रोका जा सके। प्रेमचंद कहते हैं, "चरित्र के भ्रष्ट होने का ख़तरा खुली आबो-हवा में उतना नहीं होता, जितना कि बंद कमरे में"। इसलिए, हम अपने बच्चों को वाजिब व ज़रूरी आज़ादी भी दें व उनकी परवरिश पर भरोसा रखें, नहीं तो सामाजिक सरोकारों के प्रति हमारी सजगता व प्रतिबद्धता भी कुपोषण का शिकार समाज ही निर्मित करेंगी।

Thursday, 9 July 2015

I'm fortunate enough that I can say that I chose my parents wisely. I respect the diversity and plurality of ideas, appreciate logical approach and always dare to disagree with superficial and shallow arguments. But, I never use abusive language in any discourse. But, it's also the fact that sometimes I'm badly misunderstood. This means that I'm not a good communicator.
"That is not what I meant at all.
That is not it, at all. (Eliot)

With all humility I want to say that some of my friends miserably lack the organic symbiosis between what they say and how they say. For the expression of disagreement, they cross all the limits. My ideal is Voltaire in the context of freedom of speech and expression. He aptly says, "I may disagree with everything that you say, but I'll defend to the last drop of my blood, your right to say so." Despite the inherent partial attitude and systemic irregularities and discrepancies, I endeavour to change the mindset of people who are in the habit of reinforcing the pre-existing system and maintaining status quo.
"I'm not here to fix blame for the past. I'm here to fix the course for the future."
- John F. Kennedy

But the problem with some of my friends (I don't know whether they are worthy of being called friend or not) is that they want to be famous overnight without perseverance and magnanimity.
बड़ी आसानी से मशहूर किया है ख़ुद को
मैंने अपने से बड़े शख़्स को गाली दी है।
- अशर
अपनी एड़ी पर ही चलो खड़े हो जाओ
मुझसे कुछ देर को होते हो बड़े, हो जाओ।
- प्रो. बरेलवी

It's advisable in the classical text :
परोक्षे कार्यहन्तारं, प्रत्यक्षे प्रियवादिनं।
वर्जयेतादृशं मित्रं, विषकुम्भं पयोमुखं।।
And, gradually I'm learning this art.

Thursday, 2 July 2015

                                                                 
                                                           परवरिश का संकट

 हैम गिनॉट कहते हैं, "Children are like wet cement. Whatever falls on them makes an impression". अर्थात्, "बच्चे भीगे सीमेंट की तरह होते हैं। उन पर जो कुछ भी गिरता है, अपना असर छोड़ जाता है।"
बच्चों की अच्छी परवरिश भी एक कला है, जो सबको नहीं आती। वाक़ई, इस देश में पैरेन्टिंग की निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा दी जानी चाहिए। पहले बच्चे को बिगड़ने देंगे, फिर जब हाथ से सबकुछ निकल जाने का अहसास जगेगा, तो माथा पर हाथ रख कर भाग्य को कोसेंगे। बच्चों के बदले में लगभग ख़ुद परीक्षा देंगे, चोरी कराकर 75 % अंक प्राप्त करवायेंगे, बच्चों के मन से मेहनत पर से भरोसा उठवायेंगे, ईमानदारी के प्रति उदासीनता पैदा करायेंगे, फीयर साइकोसिस में रखेंगे। फिर, ये भी चाहेंगे कि रातोंरात बच्चे का कायाकल्प हो जाये, बच्चा चमत्कार कर दे। अपनी अधूरी इच्छा को पूरी करने हेतु जबरन बच्चे से साइंस पढ़वायेंगे, फिर उम्मीद करेंगे कि उनके बच्चे में पाइथागोरस, न्यूटन, डार्विन व रदरफोर्ड की रूह एक साथ प्रवेश करें। पर, क्या कीजै साहब, ऐसा होता नहीं। प्रो. वसीम बरेलवी कितना सही कहते हैं :

हमीं इनसे उम्मीदें आसमाँ छूने की करते हैं
हमीं बच्चों को अपने फ़ैसले करने नहीं देते ।

एक वक़्त के बाद यही बच्चे माँ-बाप की अवहेलना शुरू कर देते हैं। बगैर उनके मानस व उनकी अभिरूचि को समझे आप दिवास्वप्न पाल बैठेंगे, तो यही होगा। और, अंत में कुंठित होकर बच्चा शराबी होगा, जुआरी होगा, चरित्रहीन होगा और हो सकता है कि दुनिया का कोई ऐब उससे न छूटे। बच्चे पाँच बार फेल होंगे, होने दीजिए। पर, जब अनैतिक तरीक़े से आप उन्हें पास करवाते हैं, तो वे बच्चे आप जैसे चोर-बेईमान अभिभावक की इज़्ज़त क्यों करें ? कुछ पिता इस मत के भी होते हैं कि बच्चे को मार-पीटकर, ठोक-ठठाकर, डरा-धमकाकर ही इंसान बनाया जा सकता है। इससे घातक कोई तरीक़ा हो नहीं सकता। किसी ने ठीक ही कहा है :

ख़ौफ़ के साये में बच्चा बेज़बाँ हो जायेगा या बदज़ुबाँ हो जायेगा। 

बच्चे प्यार से समझते, संवरते व सुलझते हैं। वे अभिभावक के नैतिक बल व उनकी तपस्या से निखरते हैं। जिस दिन उन्हें लग गया कि मेरे माता-पिता के अंदरूनी व बाहरी शख़्सियत में तालमेल नहीं है; उनके मन में द्वन्द्व, संशय व विकार घर बनाने लगेंगे। फिर आप लाख कोशिश कर लीजिए, बच्चे आपके हाथ नहीं आने वाले। इसलिए, अपने बच्चों की हितचिंता करते हुए, उनके भविष्य-निर्माण के क्रम में कहीं आप ही उनका सर्वाधिक अहित न कर बैठें।

ख़ुशनसीब हैं वे बच्चे, जो अपने अभिभावक के लिए ये कह पाते हैं कि I've chosen my parents wisely. और, यही अभिभावकत्व की सफलता का सूचकांक है। बच्चों के लिए समय निकालना पड़ता है, वरना सामाजिक सरोकारों के प्रति आपकी प्रतिबद्धता भी कुपोषण का शिकार समाज ही बनायेगी।
तस्वीर : सौजन्य से, गूगल

Thursday, 25 June 2015


                                                            जमहूरियत की नासाज रूह


हमारी पीढ़ी ने औपचारिक आपातकाल के दंश को नहीं झेला है। पर, 40 साल पहले 1975 ई. में  आज के दिन ही अविवेकी पुत्र के मशविरे पर  इंदिरा गाँधी ने दुनिया की सबसे बड़ी जमहूरियत को  अपनी जागीर समझने का दुस्साहस किया था। पर, लोकतंत्र उस गंगाजल की तरह है, जिसमें स्व-शुद्धीकरण की क्षमता है। निःस्वार्थ व निष्कलुष तपस्वी लोकनायक जयप्रकाश की सम्पूर्ण क्रांति की साधना व व्यवस्था-परिवर्तन के उनके आह्वान पर आम चुनाव में इंदिरा जी को जनता ने करारा जवाब दिया।

मौजूदा नस्ल को हर वक़्त सचेत रहने की ज़रूरत है कि लोकतंत्र को कभी भी फॉर ग्रांटिड नहीं लिया जा सकता। हर दिन यह अपने नागरिकों से सतर्कता व प्रतिबद्धता की अपेक्षा रखती है। मैं बड़े अदबो-एहतराम के साथ रजनी कोठारी साहब से इत्तफाक नहीं रखता कि जमहूरियत अपनी हिफाज़त ख़ुद कर लेगी। जनतंत्र उत्सर्ग की माँग करता है। हर सियासतदां में थोड़े-थोड़े अंश में 'इंदिराई' मौजूद है। मौका मिला नहीं कि वे व्यवस्था को दबोच लेना चाहते हैं, नोंच-खसोट लेने की मंशा पाल बैठते हैं।

किसी लोकतंत्र की आयु के लिहाज़ से 67 साल कोई दीर्घ अवधि नहीं होती। हिन्दुस्तानी जमहूरियत अभी किशोरावस्था से निकली  ही है। पर, इतनी कम उम्र में इसने इतने सारे रोग पाल लिए हैं कि बड़ी चिंता होती है। कुपोषण के शिकार अपने इस बड़े, कमोबेश सफल एवं गाँधी, अम्बेडकर, जयप्रकाश, लोहिया, फूले, नम्बूदरीपाद, पेरियार, आदि राजनीतिक साधुओं की आजीवन पूँजी व चिरटिकाऊ होने की शुभेच्छाओं से अनुप्राणित इस बाहर से बुलन्द जिस्म वाले जनतंत्र की नासाज रूह की तीमारदारी करनी होगी।

आज ही, पिछड़ों, शोषितों, उत्पीड़ितों, लांछितों व वंचितों के उन्नायक विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्मदिन है। उन्होंने अपनी जातीय सीमा को खारिज़ करते हुए, बुद्ध की परम्परा का निर्वहन करते हुए इस देश के अंदर लगातार बढ़ती जा रही विषमता की खाई को पाटने हेतु मंडल कमीशन की रपट को लागू करने का साहसिक, ऐतिहासिक व सराहनीय क़दम उठाकर यह साबित किया कि इच्छाशक्ति हो व नीयत में कोई खोट न हो, तो मिली-जुली सरकार भी क़ुर्बानी की क़ीमत पर बड़े फैसले ले सकती है। । दुनिया की किसी भी कल्याणकारी योजना से इतने कम समय में इससे बड़ी तादाद व जमात में लोगों के जीवन-स्तर में शायद ही असरदार व काबिले-ज़िक्र तब्दीली आयी हो। अमेरिका में भी दबे-कुचले समुदाय के लोगों की ज़िन्दगी संवारने व उन्हें मुख्यधारा में लाने हेतु अफरमेटिव एक्शन का प्रावधान है और वहाँ इसके प्रतिरोध में कभी कुतर्क नहीं गढ़े जाते। मुझे अमेरिकी कवयित्री एला व्हीलर विलकॉक्स याद आती हैं :

In India's land one listens aghast
To the people who scream and bawl;
For each caste yells at a lower caste,
And the Britisher yells at them all.
("In India's Dreamy Land")

 अर्थात ,
भारतवर्ष में लोग  बात सुनते
 उन्हीं की जो चीखते व चिल्लाते ;
क्योंकि हर जाति दुर्बलतर  जाति पर धौंस जमाती,
और, ब्रिटिशजन उन सब को हिकारत भरी नज़र से देखते.
(आर्यावर्त की स्वप्निल ज़मीं  पर )

वी.पी. सिंह ने जिस मंत्रालय के ज़िम्मे कमीशन की सिफारिश को अंतिम रूप देने का काम सौंपा था, उसकी लेटलतीफी देखते हुए उन्होंने उसे रामविलास पासवान के श्रम व कल्याण मंत्रालय में डाल दिया। उस समय यह मंत्रालय काफी बड़ा हुआ करता था और अल्पसंख्यक मामले, आदिवासी मामले, सामाजिक न्याय व अधिकारिता, श्रम, कल्याण सहित आज के छह मंत्रालयों को मिलाकर एक ही मंत्रालय होता था। श्री पासवान की स्वीकारोक्ति है कि तत्कालीन सचिव, जो दक्षिण भारतीय ब्राह्मण थे; ने इतने मनोयोग से प्रमुदित होकर काम किया कि दो महीने के अंदर मंडल कमीशन की सिफारिशों को अंतिम रूप दे दिया गया। आरक्षण आरक्षण की ज़रूरत समाप्त करने के लिए लागू हुआ था। पर, क्या कीजै कि बड़ी सूक्ष्मता से इस देश में आरक्षण को डायल्युट किया जा रहा है और मानसिकता वही है कि हम तुम्हें सिस्टम में नहीं आने देंगे। पिछडों के उभार के प्रति ये असहिष्णुता दूरदर्शिता के लिहाज़ से ठीक नहीं है। जेएनयू जैसी ज़गह में आप पीएच.डी तो कर लेंगे, पर अध्यापन हेतु साक्षात्कार के बाद "नोट फाउंड सुटेबल" करार दे दिये जाएँगे। पर, ये भी कम नहीं है कि अब आप अपनी जीवटता, लगन और अपने जुझारूपन व अध्यवसाय से पढ़ ले पा रहे हैं। ये सदियों के विचित्र समाज की कम बड़ी उपलब्धि नही है। इसलिए, बगैर किसी वैमनस्यता के सहज व शालीन भाव से फैज़ के शब्दों में, "बोल के लब आज़ाद हैं तेरे / बोल के ज़बां अब तक तेरी है"।
दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।


Thursday, 4 June 2015



            मुमुर्षा में बदलती जिजीविषा


आदमी जन्म लेता है, माँ की गोद से लुढ़ककर चलना सीखता है, फिसलते-फिसलते ज़वान हो जाता है, संभलते-संभलते बूढ़ा, फिर तो लुढ़ककर अलविदा। पर, कुछ लोग इस नैसर्गिक जीवन-चक्र को तोड़कर आत्मघाती निर्णय ले बैठते हैंज़िन्दगी तो जूझने का नाम है, न। किसी भी रिश्ते से कहीं महत्वपूर्ण है आपका होना। आप हैं, तभी रिश्ते-नाते, मैत्री, क़ुर्बत, फ़ासले सब हैं। किसी भी संबंध के चिरायुत्व का रहस्य परस्पर सम्मान व विश्वास है। यदि आपकी रूठने की प्रकृति है, तो अपने अंदर मानने की प्रवृत्ति भी विकसित कीजिए। वरना, ज़िन्दगी बोझिल हो जायेगी। महानगरीय जीवन तो ऐसे ही स्वयं में त्रासदी है। तोल्सतोय ने ठीक ही कहा, "शहर में कोई ख़ुद को मृत समझकर बहुत दिनों तक जीवित रह सकता है"।

जीवन के प्रति अटूट श्रद्धा ही नहीं, अपितु आस्था होनी चाहिए, तभी इंसान विषम परिस्थिति में ख़ुद को टूटने से बचा सकता है। एक ऐसे दौर में जबकि संबंधों का घनत्व लगातार घट रहा है और पहचान की स्वायत्तता के लिए ज़द्दोजहद बढ़ रही है; वैसे में वरीय साथी अंशु सचदेवा जैसी जीवन्त व ज़िन्दादिल इंसान का यूँ अचानक साथ छोड़कर जाना स्तब्ध तो करता ही है, साथ ही बोझिल मन से सोचने पर मजबूर करता है कि संवेदनशील-भावुक मन के लिए बेहद ज़रूरी है कि संवादहीनता की स्थिति से बाहर आया जाय, अंदर-ही-अंदर डेरा डाल रहे अकेलेपन के घेरे को तोड़ा जाये व अपनों से संवाद के तार जोड़े जायँ।

अल्पायु में अपनी इहलीला दुःखद ढंग से समाप्त करने से पहले इस निश्छल साथी ने शिक्षण-विधि में कई बुनियादी सुधार की सार्थक पहल की। आइआइएमसी से पढ़ाई करने के बाद गाँधी फेलोशिप प्राप्त कर सुदूर देहात के स्कूलों में बच्चों की प्रतिभा को तलाशने-निखारने-संवारने के अनुपम कार्य में जुटी थीं। उनकी अदम्य जीवटता, जीवन्तता व जिजीविषा भरी प्रकृति बच्चों में नवऊर्जा भरती थी। वो अपने ईमानदार व असरदार लेखन से लगातार जनसत्ता के सम्पादकीय पृष्ठ पर ज़गह पा रही थीं एवं अपनी बातों को प्रभावी ढंग से नीति-नियंताओं तक पहुँचा रही थीं।


कब तक होनहार प्रतिभाएँ पुष्पित-पल्लवित होने के पहले ही यूँ दम तोड़ती रहेंगी ? भारतीय जनसंचार संस्थान में मेरे आने के बाद ये दूसरी तोड़ने वाली घटना है। पिछले साल ही सागर मिश्रा जी की ख़ुदकुशी की ख़बर से हम अभी ठीक से उबरे भी नहीं थे।  26 साल की अल्पायु, जब इंसान अपनी ज़िंदगी शुरू करता है, सागर पत्नी व परिवार को अकेला छोड़ इस जहाँ को अलविदा कह गये। कारण चाहे जो भी हो, पर पत्रकार की जीवटता व जिजीविषा को गहरा आघात लगा है । एक संभावनाशील व उदीयमान पत्रकार अपना संपूर्ण सौरभ बिखेरने से पहले ही हमारे बीच से चला गया ।


 बदलते समसामयिक सामाजिक संदर्भ में युवा पीढ़ी की बेचैनी व छटपटाहट को समझने की ज़रूरत है। आखिर, वे क्यों अपना सब्र खो रहे हैं ? जवाब आसान नहीं है। अपने मशहूर, मार्मिक व प्रेरणास्पद उपन्यास द ओल्ड मैन एंड द सी में आदमी को तबाह किया जा सकता है, मात नहीं दी जा सकती”, जैसे कालजयी उद्घोष करने वाले नोबेल पुरस्कार विजेता अर्नेस्ट हेमिंगवे जैसी शख़्सियत भी परिस्थितिजन्य कारणों से आत्महत्या कर बैठते हैं। हालात के आगे मजबूर होने को हम अपनी नियति क्यों मान बैठते हैं ? भावुकता विचलित करती है, विगलित करती है; समाधान नहीं देती।  

बहुत आवश्यक है कि पत्रकार का न्यूनतम वेतन तय हो । कई बार कमज़ोर आर्थिक पक्ष भी हमें झिंझोरता है, घुटन व गहन अवसाद के गहरे गर्त में डाल देता है । प्रेम- विवाह व पारिवारिक स्वीकार्यता के बीच समन्वय भी सागर की सबसे बड़ी चुनौती रही । हमारे जीवन की त्रासदी यह भी है कि हम अपनी भावनात्मक निर्भरता किसी एक व्यक्ति के साथ इतना जोड़ लेते हैं कि शेष मित्रों से संवाद ही कम कर देते हैं । खासकर, युवा दोस्तों को सुकून के स्रोत का विकेन्द्रीकरण करना होगा । ख़ुशी के लिए परजीविता, पराश्रयता एक मोड़ पर आकर कचोटने लगती है ।

पत्रकारिता का पेशा या समाजकार्य का क्षेत्र बेहद धैर्य की माँग करता है, नहीं तो खीझ कब घनीभूत अवसाद में तब्दील हो जाये, आपके अंदर की अनिर्वचनीय घनीभूत पीड़ा शनैः-शनैः आपकी जिजीविषा, जीवटता व आपके जुझारूपन को आपकी गंभीर हसी के बीच से कब दरका जाये; यहाँ पता भी नहीं चलता है। अभिभावक से तो और भी भावनात्मक सहयोग, हिम्मतअफज़ाई व सब्र की अपेक्षा रहती है। कई बार अपने ही बच्चों के बीच अनावश्यक तुलना उनके मन में खीझ, चिड़चिड़ापन व कुंठा पैदा करती है। इसीलिए मैं महसूस करता हूँ कि इस मुल्क में अभिभावकत्व (पेरन्टिंग) की मुफ्त व ज़रूरी तालीम दी जानी चाहिए। बच्चों के मिज़ाज को समझना व तदनुसार उनका विकास करना आवश्यक है। डॉ. हैम गिनॉट लिखते हैं कि बच्चे भीगे सीमेन्ट की तरह होते हैं। उनपर जो कुछ भी गिरता है, अपना प्रभाव छोड़ जाता है। अस्तु, आरम्भ से ही हमारे मानस की निर्मिति में हमारे परिवेश व परवरिश की महती व प्रभावी भूमिका रहती है।

आज की आपाधापी भरी ज़िंदगी में भीतर ही भीतर कुछ दरकता रहता है और अंत में जाकर बड़ा शून्य बन जाता है, सब बिखरता हुआ-सा दिखता है, जिसे हम कभी जोड़ नहीं पाते, समेट नहीं पाते हैं और उसी हौचपौच, बेचैनी, छटपटाहट, मानसिक उलझन व अनिर्णय की दशा में जब कुछ नहीं सूझता, तो हम ये ग़लती कर बैठते हैं, जिसे किसी के लाख बुलाने पर भी कभी लौटकर हम सुधार नहीं सकते। मुझे लगता है कि उस नाज़ुक पल में आदमी स्वयं से ही संवाद तोड़ देता है, तो फिर औरों से संवाद करने के बारे में कहाँ सोच पायेगा ?

हादसा हो जाने के बाद हम तकलीफ में होते हैं कि अपने क़रीब के दोस्त के कुछ उदास अनछुए पहलुओं को समग्रता में, सूक्ष्मता से पढ़ने में हम चूक गये, उनकी मनःस्थिति से कभी वाकिफ न हो सके। हम ख़ुद को वाकई दोषी व लाचार महसूस करते हैं और अभागे भी ! हम न हाथ थाम पाते हैं, न पकड़ पाते हैं दामन और बड़े क़रीब से उठकर कोई चला जाता है। घर-परिवार की उम्मीदें हमारी ओर लगी हुई रहती हैं। जब सारी दुनिया आपकी ओर से निराश हो जाती है, तब भी प्रतीक्षारत पलकों के साथ दो लोग आपकी ओर टकटकी लगाये रहते हैं – एक माँ और दूसरा आदर्श शिक्षक। हर शिष्य की मौत में अध्यापक की मौत होती है। परिवार के सदस्य अपराधबोध में जीते हैं कि वे बच्चे की मनोदशा को भाँप नहीं सके,  उसके अन्तर्मन के द्वन्द्व को वक़्त रहते पढ़ न सके।   हमारे शुभेच्छु के पास अफसोस करने के अलावा कुछ बचता नहीं है कि अब जबकि दिन सँवरने वाले थे, तो अतिशय भावुक सदस्य को कहाँ जाके बिछड़ने की सूझी। अकबर इलाहाबादी ने ठीक ही कहा है - पुरानी रोशनी में और नई में फ़र्क़ है इतना / उसे कश्ती नहीं मिलती इसे साहिल नहीं मिलता


सूचना-क्रान्ति व सूचना के लोकतांत्रीकरण के मौजूदा दौर में लोकमाध्यम यानि सोशल मीडिया के विवेकपूर्ण व यथोचित प्रयोग की निहायत ज़रूरत है।  क्या दिन-ब-दिन अमानवीकृत होकर यांत्रिकता से नियंत्रित होना ही हमारी नियति बन गयी है ? आखिर, मानवीय संवेदना व चेतना का सर्वथा अभाव क्यों दिखता है ? क्या फेसबुक, ट्वीटर, वॉट्सऐप के ज़रिये आज का तरुण व युवा भारत अपनी बहुसंख्य आबादी से जुड़ पा रहा है, या अपने ही मसले सुलझा पा रहा है ? कहना न होगा कि वे इन तकनीकों के अविवेकपूर्ण व अंधाधुंध इस्तेमाल से ख़ुद ही रात-दिन उलझ रहे हैं व नित नये-नये मानसिक रोग व कुंठा पाल रहे हैं। हम उस देश के वासी हैं जहाँ क्रंदन भी अपने आप में सम्वाद का बेहतरीन माध्यम रहा है। गाँव के मेले या हाट में जब माँ व मौसी मिलती थीं, तो गले लगकर, रोते हुए अपना सारा क़िस्सा बयाँ कर देती थीं। पर, आज के तंगी-ए-वक़्ते-मुलाक़ात का दौर हमें आँसू बहाने की भी तो मोहलत नहीं देता। मिल-बैठकर सुख-दुःख की गुफ़्तगू का कोई विकल्प नहीं हो सकता।



 किताबों की प्यारी दुनिया से वाबस्तगी घट रही है, किताबों के दिल में झाँकने का अनवरत सिलसिला समाप्त हो रहा है, किताबों के ख़ूबसूरत अंतर्मन से मीठी अंतर्वीक्षा की संस्कृति वाले अथक पाठकों की तादाद कम हो रही है ! कि किताबें कभी थपकी देती हैं, कि किताबें सुकून देती हैं, सांत्वना देती हैं। ये रूठती हैं तो फिर ऐसे कि छूने नहीं देतीं। बड़ी निश्छल होती हैं किताबें कि दिल से मनाओ, तो झट से आकर सीने में चेहरा छुपा लेती हैं। ये वात्सल्यमयी माँ का किरदार भी निभाती हैं, तो कभी बन जाती हैं स्नेह लुटाने वाली बहना। कोई चाहे दादी माँ की लोरी फिर से सुनना, तो किताबों की सोहबत में आ जाये, उलट ले कुछ पुराने पन्ने। तज़ुर्बे तो इसके पास दादू वाले हैं। ये किताबें भी अपने अंदर न जाने कितने संसार समेटे हुए हैं। अमूल्य निधि हैं ये किताबें। पर, गुमसुम रहने लगी हैं आजकल ये। जब भी नज़र मिलती है, बड़ी मायूस लगती हैं। उदास दिखती हैं इन दिनों। आओ कि असामाजिक होते जा रहे इस सोशल मीडिया से थोड़ा तौबा करें व किताबों से अब सारे गिले-शिकवे दूर करते हुए उनसे वही पुराना आत्मीय संबंध जोड़कर मन-प्राण को तरोताज़ा करें। कि यही इस नस्ल को तमाम नव-उदारवाद व प्रचंड बाज़ारवाद के चंगुल से मुक्त कर, छद्म आधुनिकता के जाल से निकालकर सुकून दे सकती है।

इस दमघोंटू व्यवस्था को मंथन करना होगा कि आखिर कब तक भावना-संवेदना व चेतना में समन्वय न बिठा पाने के चलते संवादहीनता का शिकार होकर निश्छल-निष्कपट-निष्कलुष प्रतिभा-प्रसून व कौशल-कुसुम यूँ असमय काल-कवलित होते रहेंगे ? आर्थिक मोर्चे पर नौज़वान पीढ़ी की कमर तोड़ने वाले पेशे में कब उन्हें उनका समुचित प्राप्य मिलेगा ?


 - जयन्त जिज्ञासु
स्नातकोत्तर, पूर्वार्द्ध, अंग्रेजी साहित्य
हंसराज कॉलिज, दिल्ली विश्वविद्यालय

Monday, 18 May 2015




HAPPY WORLD PRESS FREEDOM DAY ! ( May, 3)

"Fear none, Spare none and Favour none."

"Freedom of the Press is the stuff of life for any vital democracy."
- W. L. Willkie

 "Were it left to me to decide whether we should have government without newspapers or newspapers without a government, I should not hesitate a moment to prefer the latter."
- Thomas Jefferson

 "A free press can be good or bad, but most certainly, without freedom a press will never be anything but bad." - Thomas Jefferson 

"To limit the Press is to insult a nation."
- Clande Adrien Hevetius

"Our liberty depends on the freedom of the Press and that cannot be limited without being lost."
- Thomas Jefferson

"A free Press in an enlightened democratic society should function as a catalyst for economic development and social change with an objective to establishing an egalitarian society at the same time safeguarding individual autonomy and cultural identities."
-Anonymous

"A good newspaper is a nation talking to itself."
- Arthur Miller

"In America the President reigns for four years, and Journalism governs for ever and ever."
- Oscar Wilde

 "Whenever the press quits abusing me I know I'm in the wrong pew."
 - Harry S. Truman

"To the press alone, chequered as it is with abuses, the world is indebted for all the triumphs which have gained by reason and humanity over error and oppression."

- James Madison

Wednesday, 15 April 2015





                                         दलों के सद्यःविलय की पूर्वाग्रह-प्रेरित मनमानी मीमांसा

छह दलों के विलय की व्याख्या कुछ भले लोग जातीय समीकरण के उभार व कुछ परिवारों की गोलबंदी के रूप में कर रहे हैं व इसके देशव्यापी असर के आसार को इसकी शैशवावस्था में ही खारिज़ कर रहे हैं। पता नहीं उनकी याद्दाश्त इतनी कमज़ोर क्यों हो जाती है ? गत वर्ष बिहार में हुए उपचुनाव के वक़्त बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन कह रहे थे कि राजद का सारा वोट जद यू. को नहीं मिल सकता, न ही जद यू. का शत प्रतिशत वोट राजद के पाले में जायेगा। तर्क ये कि जॉर्ज व नीतीश की समता पार्टी की बुनियाद लालू प्रसाद की कुछ ग़लत नीतियों के विरोध में पड़ी थी, जो आगे चलकर जद यू. की शक्ल में सामने आया। अतः, अपने अंतर्द्वन्द्वों के चलते यह गठबंधन फेल हो जायेगा। अब कुछ स्तंभकार व हर वक़्त हड़बड़ी में रहने वाले टीवी के भविष्यवेत्ता इस विलय के विफल होने की आशंका जता रहे हैं।


तब जबकि राजनीति की प्रयोगशाला बिहार में इस बड़े गठबंधन ने बाजी मार ली, तो उसकी मीमांसा में कुतर्क गढ़े जा रहे थे। और, अब जबकि इन पार्टियों का विलय हुआ है, तो उसका मखौल उड़ाया जा रहा है। हाँ, इन शोषितों, पीड़ितों की राजनीति, रहनुमाई व रहबरी का दावा करने वाले नेताओं के डीएनए में सत्ता-संचालन व पार्टी प्रबंधन का कौशल नहीं है। हाँ, ये सूक्ष्मता से जनता के साथ खिलवाड़ कर बच निकलना नहीं जानते। हाँ, चालाकी व धूर्तता इनके ख़ून में नहीं है। हाँ, शातिराना चाल इनकी नस-नस में नहीं है। हाँ, क्रूरता व ग़रीब-गुरबों के साथ भद्दा मज़ाक कर बच निकलना इनके रग-रग में नहीं है। जी हाँ, मीडिया को मैनेज करने का हुनर इन्हें नहीं आता। यही वजह है कि जगन्नाथ मिश्रा के समय से चले आ रहे चारा घोटाले में लालू प्रसाद जेल चले जाते हैं व अपनी पूरी राजनीतिक यात्रा को कुंठित व लांछित कर डालते हैं। राजतंत्र में भी खज़ाना राजा अपने पास नहीं रखता था। कोई भी होशियार सियासतदां वित्त मंत्रालय अपने पास नहीं रखता। पर, ये सियासी भूल लालू प्रसाद से हुई व वो खज़ाना मंत्री बन बैठे। अदूरदर्शी व कुछ चालबाज़ सलाहकारों ने एक होनहार राष्ट्रीय नेता को पुष्पित-पल्लवित होने से पहले राजनीतिक रूप से काल-कवलित करा दिया।


भाजपा के बिहार में रामविलास पासवान की लोजपा व उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा के साथ एवं उत्तरप्रदेश में उदित राज व अुनप्रिया पटेल के अपना दल के साथ गठबंधन में इन भलेमानुषों को अवसरवाद व जातिवाद नहीं दिखता। कमरतोड़ महँगाई व रोज़मर्रा की चीज़ों के दाम में बेतहाशा वृद्धि, केंद्र की राजग सरकार की जनादेश के साथ अपनी मनमानी करने एवं मुख्यमंत्रियों के लगातार अपमान, राजभवन के कार्यक्रम में मोदी-मोदी के नारे पर प्रधानमंत्री की हैरान करने वाली चुप्पी, आदि के विरोध में बिहार व यूपी के उपचुनाव में वहाँ की जनता की सहज प्रतिक्रिया हम देख चुके हैं। समय रहते चेत जायें उन्माद व सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की राजनीति करने वाले मगरूर सत्ताधीश, नहीं तो 2015 का परिणाम आपके अभिमान को धो कर रख देगा।


और हाँ, ये जंगलराज के आगमन की आशंका का राग अलापना छोड़ दीजिए, ये मर्सिया तराने किसी और दिन आपके काम आयेंगे। जब भी, जहाँ भी किसी वंचित, शोषित, उत्पीड़ित समाज की राजनीतिक अभिव्यक्ति पुख्ता ढंग से महसूस की जाने लगती है, लोकतंत्र को हाइजैक करने की मंशा पाले कुछ ठेकेदारों के पेट में दर्द शुरु हो जाता है, मानो लोकतंत्र को निखारने-सँवारने का दायित्व इकलौता इनका है। संघीय ढाँचे पर लगातार चोट करने वाले अब भी नहीं संभले , तो उनका मद उन्हें कहीं का न छोड़ेगा। बाकी रहा, इस गठबंधन के 2015 में और भी फलने-फूलने की बात और परिणामस्वरूप बिहार के रसातल में चले जाने की आपकी चिंता, तो आप फिक्र करना छोड़ दीजिए। बिहार के लोग राजनीतिक रूप से काफी परिपक्व हैं, सामाजिक समरसता की परिधि को भी अपरिमित करना बेहतर जानते हैं, अपना भला-बुरा उन्हें आपसे ज़्यादा मालूम है।


मैं तो अक्सर कहता हूँ, भारतीय लोकतंत्र उस पुण्य-सलिला, सतत प्रवहमान गंगा की तरह है, जिसमें स्व-शुद्धीकरण की क्षमता है। तमाम सुधार की गुंजाइश के बावजूद यह अपनी गंदगी को खुद साफ कर लेगा। फिलहाल, बिना किसी राग-द्वेष के, वैमनस्य के इन दलों के सद्यःविलय को ठंडे मन से, निर्विकार भाव से स्वीकार कीजिए व लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था बनाये रखिए।


मेरी आस्था लोकतांत्रिक संस्था के प्रति है, किसी व्यक्ति या दल-विशेष के प्रति नहीं। लालू-नीतीश-मुलायम-चोटाला-देवगौड़ा के गठजोड़ को सुअरों का झुंड बताना न सिर्फ  अभिजात्य वर्ग की सामंती सोच को दर्शाता है, बल्कि यह उसके मानसिक दिवालियापन का भी द्योतक है। लालू प्रसाद के प्रशासनिक मोर्चे पर विफलता का सबक जनता ने अच्छी तरह उन्हें सिखा दिया, मगर वहाँ का सदियों से शोषित वर्ग उनकी सामाजिक न्याय की लड़ाई को आज भी भूला नहीं है। न्याय-बोध बिहार की जनता अच्छी तरह जानती है, समझती है। और आप जान लें कि शीर्ष पर काबिज़ चंद लोगों की अमानुषी जीवन-धारा ने बाध्य किया बिहार के पीड़ितों को लालू प्र. में, यूपी के वंचितों को मुलायम सिंह में व हरियाणा के शोषितों को देवीलाल में अपना नेतृत्व तलाशने के लिए। उन्होंने बिहार-यूपी-हरियाणा को स्वर्गिक अहसास तो नहीं दिया, पर दबी ज़बान को स्वर ज़रूर दिया, जिसे कोई भी निष्पक्ष विश्लेषक नकार नहीं सकता।


हाँ, इस पूरी प्रक्रिया की आड़ में कुछ अनैतिक कार्य भी हुए, जिस तांडव नृत्य को सदियों से सत्ता के संस्कार को जीने वाले, अपनी जीवनशैली में ढाल लेने वाले ये स्वयंभू लोग किया करते थे, उसी आईने को उन्हें दिखाना एक समय के बाद जनता को ठीक नहीं लगने लगा। उन शोषकों के रास्ते पर ही परिवर्तन के पहिये को मोड़ देना न्यायोचित नहीं हो सकता, न ही यथोचित ठहराया जा सकता है। मैं स्वानुभूत सच बोलता हूँ, लिखता हूँ। न तो सस्ती लोकप्रियता की कोई ख्वाहिश है, न ही अप्रियता से डरता हूँ। बाकी, कुछ उग्र व असहिष्णु साथियों की भाषा में बात करने का हुनर नहीं सीखा है। और, इस तरह की असंसदीय टिप्पणी से अपनी तुच्छ वैचारिक गंदगी फैलाना भर्त्सनीय है। मैं आपसे भले सहमत न होऊँ, पर आपकी हर टिप्पणी का स्वागत है, बशर्ते आपकी भाषा में न्यूनतम अपेक्षित मर्यादा व संस्कार झलके।


और, जमहूरियत किसी की जागीर नहीं हुआ करती, जनादेश व राजनीतिक समीकरण, गठबंधन, दलों के विलय व नयी पार्टी के गठन की व्याख्या होती रही है, होती रहेगी। कोई भी जनादेश या राजनीतिक विकल्प अंतिम नहीं होता। व्यक्ति-उपासकों का भ्रम भी जल्द टूट जायेगा। इतनी तिलमिलाहट व राजनीतिक अस्पृश्यता ठीक नहीं। नीतीश कुमार जब तक भाजपा के साथ थे, सब ठीक था, अलग होते ही स्कूल के नल का पानी विषाक्त होने लगा। कुछ दोस्त जिस विशिष्ट धारा से आते हैं, उसने तो जननायक कर्पूरी ठाकुर की माँ-बहन-बेटी को गाली दी। बेहतर होगा कि वे मेरा मुँह न खुलवायें। जिस वर्ग को ज्ञान पर वर्षों शत प्रतिशत आरक्षण रहा हो, उनमें से कुछ ऐसी ही ओछी बातें करते हैं। आरक्षण के मनोविज्ञान को समझना है, तो पुनर्जन्म में विश्वास करने वालो ! कभी डोम जाति में पैदा होकर देखना या हो सको तो बुद्ध, वी.पी. आदि जैसा उदारचेता होकर खुद से संवाद करना। उस अस्तित्व के संघर्ष को जीने के बाद पता चलेगा कि शुद्र ये उपेक्षित लोग हैं, या शोषक लोग क्षुद्र हैं। किसी बातचीत में हर टिप्पणी का जवाब देना मैं उचित नहीं समझता, न ही बाध्य हूँ।


मेरी जो थोड़ी- बहुत सियासी समझ है, उसके आलोक में कह सकता हूँ कि वैचारिक धरातल पर एक साथ खड़े रहे ये राजनीतिक साथी इस विलय को वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए दूर तक ले जायेंगे और चुनाव में जाने से पहले जनहित के मुद्दों को उभारकर, केन्द्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ सतत संघर्ष कर जनता का दिल जीतने का प्रयास करेंगे। अभी जबकि यह विलय राजनीतिक प्रसवगृह से बाहर भी नहीं निकला है; इसके भविष्य को शंकित निगाह से देखना-आँकना इसके प्रति न्याय नहीं होगा। इस विलय को अभी से खारिज़ करना इसकी निष्ठुर व्याख्या है, इसका निर्मम विश्लेषण है, इसका एकपक्षीय व अधूरा मूल्यांकन है।

- जयन्त जिज्ञासु

(लेखक सेंट स्टीवन'स कॉलिज, दिल्ली से की कॉन्सेप्ट्स व क्रिटिकल थॉट की पढ़ाई कर चुके हैं।)