Tuesday, 15 April 2014




                                           भारतीय राजनीति में व्यक्ति-पूजन की भर्तस्नीय उग्रता

                                                      मोदी की आलोचना करने पर ए.बी.वी.पी. के एक छात्र नेता, जो छात्र संघ के संयुक्त सचिव भी हैं, द्वारा दिल्ली वि.वि. के उत्तरी परिसर के जंतु विज्ञान के प्राध्यापक प्रो. राय पर हाथ छोड़ना व उनके मुँह पर कालिख पोतना क्या दर्शाता है ? अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् अपने ध्येय में तीन शब्दों का बड़ी प्रमुखता से उल्लेख करता है- ज्ञान, शील और एकता । पर क्या यह क्षुद्र व्यवहार ज्ञानार्जन, शील-संवर्धन, संस्कार- परिमार्जन एवं एकीकरण का परिचायक है ? 

                                                      असहमति और आलोचना तो लोकतंत्र की शर्त हैं । जब इनके प्रात: -आराध्य 56 इंच का सीना रखने वाले पुरुषार्थी मोदी जी, जिन्हें इन्होंने भगवान का दर्ज़ा दे रखा है, में अपनी आलोचना सहने की कुव्वत नहीं है, तो भला इन व्यक्ति-पूजक साधकों से न्यूनतम शालीनता की अपेक्षा ही बेमानी है ।

                                                      मुझे वोल्टेयर याद आते हैं,
"I may disagree with everything that you say, but I'll defend to the last drop of my blood your right to say so."

पर, उन्माद में कहाँ याद रह पाती हैं वही बातें, जिनका ज़िक्र खुद अटल जी संसद में विरोधियों को चुप कराने के लिए करते थे । वैसे भी अटल जी को इस पीढ़ी के "शीलवान, ज्ञानवान और एकता के सूत्र में बंधे" प्रमादी विद्यार्थियों को याद करने की फुरसत कहाँ ? उस पर धृष्टता ये कि बात-बात पर मोदी-भक्त संविधान की दुहाई देने लगते हैं, मानो ब्रह्म-मुहुर्त में देश का संविधान घोलकर इन्हीं लोगों ने पिया हो । कभी इनकी नेत्री भिक्षुणी बनने की धमकी देती थीं, जैसे राष्ट्रीय अस्मिता और गौरव की एकमात्र रक्षक वही हों । 

                                                   चुनाव के नतीजे आने के पूर्व ही किसी को अपना प्रधानमंत्री पद का नेता या दावेदार चुन लेना तो सूक्ष्म रूप से संवैधानिक मान्यता व परम्परा का अपमान व किसी संभावना के उपजने की प्रक्रिया का ही हनन है । लोकतंत्र की आस्था किसी व्यक्ति-विशेष में नहीं हो सकती । और जिन लोगों की याद्दाश्त दुरुस्त है, वे नहीं भूले होंगे कि 2004 में परिणाम की घोषणा आने के दिन तक भी किसी को अन्दाज़ा नहीं था कि जनता ने "फील गुड" व "इन्डिया शाइनिंग" कराने वाली अटल सरकार की रुखसती की गाथा लिख दी है । 

                                                     इसलिए, जोश व अति आत्मविश्वास में इतरा व इठला रहे इन कुशाग्र प्रज्ञावान तथा विवेकशील प्राणियों को थोड़ा धैर्य, संयम व इंतज़ार का मज़ा लेना चाहिए ताकि भारतीय लोकतंत्र के सौंदर्य का सही निदर्शन इन्हें मिल सके । राष्ट्र-निर्माता शिक्षक समुदाय की मान-मर्यादा को धूमिल करने का दुस्साहस करने वालों ! बबुआ याद रखअ् :

                                                   Many a slip between the cup and the lip.

                                                            
                         


                     सिने मंच : भारतीय जनसंचार संस्थान का  स्वर्णिम सृजनशील अध्याय

                                            "पत्रकारिता का मक्का" कहे जाने वाले भारतीय जनसंचार संस्थान, नयी दिल्ली के सिने मंच ने अपनी सात महीने की यात्रा बड़ी खूबसूरती से पूरी की । मौजूदा सत्र की अपनी आखिरी प्रस्तुति के रूप में पिछले दिनों इस मंच ने "गाँधी माय फादर" बनाने वाले फिरोज़ अब्बास ख़ान निर्देशित सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य के ज़रिये कई सवालों व सरोकारों को कई बार स्पष्टता से तो कई बार सूक्ष्मता से उकेरती फिल्म  "देख तमाशा देख" की स्क्रीनिंग की । 

                               इस सिने मंच को बुनियादी तौर पर खड़ा करने में निष्काम कर्मयोगी, व्यवहारकुशल, प्रिय साथी अभिषेक चंचल जी, अपनी रचनात्मकता व सौम्यता के लिए चर्चित सेज़ल ललवानी, सृजनशील मोही नारायण, जौक़े-दीदार रखने वाले भाई अली अनवर, बहुमुखी प्रतिभा की धनी सौम्या शंकर, दीपक पटेल, ओमप्रकाश धीरज, मलयानिल, ज्योति राय आदि का अप्रतिम योगदान रहा है । एक आत्मीय संरक्षक की भाँति बच्चों के बीच लोकप्रिय, फीचर कम्यूनिकेशन के हमारे श्रद्धेय प्राध्यापक डॉ. आनन्द प्रधान निरंतर सिने मंच की क्रमिक प्रगति का न सिर्फ़ जायजा लेते रहे, अपितु प. बंगाल में पिछले दिनों संपन्न हुए एक फिल्म फेस्टिवल में सिने मंच की मौजूदगी दर्ज़ कराकर इसे राष्ट्रीय पहचान भी दिलाई ।

                                इस मंच ने जहाँ स्पिक मैके का कार्यक्रम आयोजित कराया, जिसमें पश्चिमी संगीत का आनंद हमने लिया, वहीं विशुद्ध भारतीय संगीत -सागर में निमज्जित होने का मौका भी दिया ।
                               

                                         “If music be the food of love, play on,
                                           Give me excess of it; that surfeiting,
                                           The appetite may sicken, and so die.”

                                         ― William ShakespeareTwelfth Night 


[संगीत यदि है प्रेमाहार, तो बजने दो, बस बजने दो
इतना निमज्जित करो मुझे कि तृप्त हो जाये ये मन।
संगीत-क्षुधा हो रुग्ण औ' फिर शान्त। ]

                            

 निर्भया पर सी.एन.एन. आइ.बी.एन. द्वारा बनाई गई डॉक्यमेंट्री का प्रदर्शन भी हमने देखा । साथ ही,  कई अहम मुद्दों पर हमने सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में एक दृष्टि के साथ ईमानदार, प्रखर व सुचिंतित चर्चा भी की ।

                              इस मंच ने मेरे जैसे सिनेमा के महज उभरते हुए दर्शक को कई बारीकियाँ सिखाईं, समग्र समझ विकसित करने में मदद की । मैंने बड़े चाव से हर डॉक्यमेंट्री देखी  । एकाध मौके को छोड़कर सिने मंच द्वारा प्रदर्शित शायद ही कोई ऐसी फिल्म हो, जिसे देखने का लोभ संवरण मुझसे हुआ हो । संवाद-सत्र को साथियों ने अपने अनछुए प्रश्नों व गंभीर, मारक तथा अर्थपूर्ण टिप्पणियों से काफी दिलचस्प और निहितार्थ पूरा करने वाला बनाया ।

                               आने वाले दिनों में यह सिने मंच प्रज्ञावान प्राध्यापक डॉ. आनंद प्रधान के कुशल नेतृत्व में आगामी सत्र के विद्यार्थियों के सांस्कृतिक बोध, कला-बोध, रंग-बोध, युग-बोध एवं उनकी सृजनशीलता, रचनाधर्मिता तथा अध्यवसाय के सहारे नित नयी बुलंदियों को छुए, प्रशिक्षुओं-अध्येताओं की अभिरूचि को निखारे और अपनी विशिष्ट पहचान व प्रासंगिकता बचाये व बनाये रखे - यही मेरी आत्मिक अभिलाषा है ।

                                मेरा तसव्वुर, मेरे इरादे करेंगे फितरत पे हुक्मरानी
                                जहाँ फरिश्तों के पर हों लग्ज़ां, मैं उस बुलंदी पे जा रहा हूँ ।
                               
                                                     - इक़बाल

                                

                               

                    

                                            

                                     

Wednesday, 2 April 2014

फ़ेसबुक मेरी नज़र में


                      फ़ेसबुक मेरे लिहाज से संवेदनशील, चिन्तनशील और एकाकीपन को चुनौती देने वाला ज़बर्दस्त समाजवादी लोक माध्यम  है । कहीं-न-कहीं यह हमारी चेतना और संवेदना को समग्र और सम्यक् अभिव्यक्ति का मंच  प्रदान करता है । यहाँ हर कोई संवाददाता है, हर कोई संपादक । बस व्यक्तिनिष्ठता व पक्षधरता जैसे तत्व हावी हैं । गत वर्ष 14 फरवरी को मैं इससे जुड़ा तथा जून से इस पर मेरी सक्रिय मौजूदगी व दिलचस्पी बढ़ने लगी ।

                    एक ऐसी अवधि, जब अवसाद के घेरे ने ज़िन्दगी के हर मोर्चे पर थपेड़े देकर पूरी शख्सियत की परिधि को अतिक्रमित करना आरम्भ किया, तो फ़ेसबुक ने उस माँ की तरह निश्छल, निष्कपट व निष्कलुष आँचल फैलाना शुरु किया, जिसकी निर्मल छाया ने कई झंझावातों व उष्ण लू की तपिश से मेरे वज़ूद को बचाया । यह महज शब्दों की बाज़ीगरी नहीं है, अपितु मेरी अनुभूति की सच्चाई है । मई-जून का वक़्त था । जवाहर लाल नेहरू वि. वि., दिल्ली वि.वि., बनारस हिन्दू वि.वि., इलाहाबाद वि.वि. तथा भारतीय जनसंचार संस्थान, नयी दिल्ली की लिखित परीक्षा और बाद में सेंट स्टीवन'स महाविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर हेतु अंतर्वीक्षा की चुनौती का सामना करना था । इस बीच कुछ रिश्ते बेहद कड़वे हो चले थे । अपनी पीड़ा सूक्ष्म रूप में फ़ेसबुक पर बिम्ब के ज़रिये व्यक्त करता था । मैं बता नहीं सकता कि ऐसा करके मुझे अंदर से कितना सुकून मिलता था । फिर सारी अनिद्रा दूर हो जाती थी । शनै:-शनै: यह मुझे राहतमय स्पर्श (हीलिंग टच) देने लगा । पढ़ाई के बाद स्टेटस अपडेट करना नहीं भूलता था ।

                      मित्रो, इसे आत्मश्लाघा के रूप में न लीजिएगा । परिणाम आये, तो सुखद व अप्रत्याशित । मेरा चयन ज.ने.वि. में भाषा विज्ञान, सेंट स्टीवन'स महाविद्यालय, ब.हि.वि. और इलाहाबाद वि.वि. में अंग्रेजी में और दि.वि.वि. में हिन्दी में स्नातकोत्तर तथा भा.ज.सं.सं. में प्रसार पत्रकारिता व हिन्दी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर उपाधि-पत्र में नामांकन हेतु हो गया । मैं आज भी कृतज्ञ व आभारी हूँ अपने फ़ेसबुक परिवार का, जिसने हर लड़खड़ाते व डगमगाते क़दम पर मेरा हाथ थामा, मुझे शुभेच्छाएँ दीं, मुबारकबाद दीं, उत्साहवर्धन किया ।

             मेरे चेहरे पर जब भी फ़िक्र के आसार पाये हैं
             मुझे तस्कीन दी है, मेरे अंदेशे मिटाये हैं ।

                       - नामालूम

                       प्रकारांतर, फ़ेसबुक पर लोगों से आत्मीयता भी धीरे-धीरे बढ़ने लगी और मेरी रचनात्मकता व सृजनात्मकता, जो अभी शैशवावस्था में है, उन्हें भी उत्तरोत्तर अभिसिञ्चन मिलता गया । इस तरह दो सकारात्मक बातें सामने निकलकर ये आईं कि तन्हाई की वेदना मेरी कमज़ोरी की बजाय ताक़त बनी, मेरा भोगा हुआ यथार्थ फ़ेसबुक पर अभिव्यक्त होकर मेरा संबल बना । साथ ही, इस क्रम में बेहिचक, बेझिझक, निष्पक्ष, निर्भीक, बेबाक, बेलाग, बेलौस, बेखौफ अपनी त्वरित प्रतिक्रिया देने की कला भी विकसित , परिवर्धित, परिष्कृत और परिमार्जित होती रही ।

                         इस कहानी का दूसरा पक्ष  भी है । इसकी तमाम उल्लेखनीय अच्छाइयों के बावजूद इसकी लत के कतिपय साइड इफेक्ट्स को नकारा व खारिज़ नहीं किया जा सकता है । निजी तौर पर मैंने जो अनुभव किया है, वो इस रूप में कि लॉग इन करने के साथ महज अपने होम व वॉल पर आये पोस्ट को आँखों से गुज़ारने मात्र में एक-दो घंटे चले जाते हैं और पता भी नहीं चलता है । दु:ख तो इस बात का होता है कि वक़्त के ज़ाया होने का भी ग़म नहीं होता ।

                        वाए महरूमी मताए-कारवाँ जाता रहा,
                        कारवाँ के दिल से अहसासे-ज़याँ जाता रहा ।

                                                -इक़बाल

                       यह जो मद्य-मधुमय, नशात्मक व किंचित विषमय प्रभाव (टॉक्सिक इफेक्ट) है फ़ेसबुक का, वो सेहत के नज़रिये से भी काफी खतरनाक व चिंताजनक है । जब मैं मोबाइल से फ़ेसबुक चलाता था, तो कभी-कभी लम्बे स्टेटस टाइप करता था और जब पोस्ट करने की बारी आती थी, तो वो पोस्ट ही न हो । उस श्रमसाध्य कार्य को निष्फल होते देखकर वही पीड़ा होती थी, जो शायद शिशु के नवजात होने से पहले ही काल-कवलित होने से एक प्रसूता को होती होगी । इससे चिड़चिड़ापन भी आता था, सर भी भारी रहता था । कभी-कभी अपना खाता-विपर्यय (अकाउंट डिएक्टिवेट) करने की भी कोशिश की, पर दो-चार दिन से ज़्यादा टिक नहीं पाया, रह न पाया । जब कोई साथी अनावश्यक रूप से मुझे टैग करता है, तो भी मुझे बड़ी चिढ़ होती है । आखिर व्यक्ति की निजता का सम्मान तो होना ही चाहिए । मैं कभी भी फालतू (जो मेरी नज़र में है) टाइप न तो अपना स्टेटस डालता हूँ, न ही किसी के घर अनधिकार प्रवेश कर बेसिर-पैर की टिप्पणी करता हूँ । यह संतोष तो है मुझे । मैं अपने प्रोफाइल को यथातिसंभव साफ-सुथरा रखने का प्रयास करता हूँ एवं अपने स्नेहिल तरुण व हमउम्र युवा मित्रों से भी इतनी सदाशयता की अपेक्षा करता हूँ ।

                      दूसरी बात, कोई कुछ भी पोस्ट कर देता है । कोई नियामक निकाय नहीं है, जो इसकी सत्यता की पड़ताल करे । यही वजह है कि अफवाहों के गर्दो-गुबार में मुज़फ्फरनगर दंगे तक हो जाते हैं । इसे गंभीरता से लेना होगा । जिसने पूस की रात देखी ही नहीं, जी ही नहीं, वो हलकू का दर्द भला क्या जाने ! वो तो बस सुने हुए यथार्थ के आलोक में फ़ेसबुक पर बस अपना कौतूहल प्रदर्शित करते हैं । एक दिन एक बच्चा अपने पिता के साथ फ्लाईओवर के पास से गुज़र रहा था । इतने में एक मोहतरमा की तेज़ चलती गाड़ी के नीचे आने से वो बच्चा बमुश्किल बचा ।  गाड़ी के शीशे को खोलकर वो बड़बड़ाती हैं- तेरा बाप भी दारू पीता है और तुझे भी पिलाता है । देख के चला कर । अब जिसने ऐश्वर्य में शराब पीकर ही लोगों के पैरों को डगमगाते हुए देखा है, वो कैसे यकीन करेगा कि भूख से भी क़दम लड़खड़ाते हैं । ऐसे लोग घर लौटकर फ़ेसबुक पर आकर चटखारे लेकर इस तरह की घटना का ललित वर्णन करते हैं । ऐसे लोगों के चलते ही अब सोशल मीडिया किसी नौटंकी से कम नहीं लगती व प्रतिबद्ध तथा संवेदनशील प्राणी के लिए ये लोग किसी जम्हूरे से ज़्यादा मायने नहीं रखते।

                           हम चाहते हैं कि सूचनाओं का तीव्रतम गति से प्रसार हो, पर सच्चाई के हनन और समग्रता के नाश की क़ीमत पर कतई नहीं ।

                      दोपहर तक झूठ सारे बिक गये बाज़ार के,
                      और मैं एक सच को लेकर शाम तक बैठा रहा ।

                              - नामालूम

इसलिए, सोशल मीडिया की सामाजिक भूमिका का भी हमें मूल्यांकन करना होगा ।

                           अपनी तमाम विसंगतियों, विद्रूपताओं, अनियमितताओं, विराधाभासों व अंतर्विरोधों के बावजूद फ़ेसबुक अपने प्रयोक्ताओं (यूज़र्स) से उम्मीद करता है कि वे इस मंच का पूरे उत्तरदायित्व के साथ गंभीरतापूर्वक अपनी गरिमा कायम रखते हुए संतुलित इस्तेमाल करें ताकि इसकी विश्वसनीयता पर जो सवाल उठने लगे हैं, उस चिंताजनक दौर से निकलकर यह बाहर आ सके । आखिरकार,

                            न तो पीने का सलीका है, न पिलाने का शऊर
                             ऐसे ही लोग चले आये हैं मैखाने में ।

                             - गोपाल दास ‘नीरज’

                        आइए, हम सब मिलकर फ़ेसबुक जैसे लोकप्रिय, विस्तृत, समावेशी, सार्वभौमिक एवं समाजवादी लोकमाध्यम की स्वच्छता, निर्बाधता व विश्वसनीयता को बचाने और बढ़ाने में अपनी सशक्त, अभिन्न, अपूर्व, समुचित, विशिष्ट तथा सार्थक भूमिका सुनिश्चित करें ।
                                         
-    जयन्त जिज्ञासु