अधूरी दास्तां / अभिशप्त
कुछ चीज़ों के अप्रत्याशित और अप्रिय ढंग से घटने के बाद किसलय इतना भावशून्य हो चुका था कि कई दिनों तक समझ ही नहीं सका कि ये क्या हुआ!
उसके कुछ ही दिन पहले जब कुसुम अपने दोस्तों के साथ मिली थी तो खाने के बाद किसलय ने अनुरोध किया कि थालियां कमरे में ही रख दी जाएं, वह बाद में धोएगा।
उसके दो-चार दिन बाद जब कुसुम मिलने आईं और इसके चलते जो कुछ सुनाया गया उसे, वह किसलय को स्वीकार्य नहीं था। वह न सिर्फ़ कुसुम की वैयक्तिकता का अपमान था, बल्कि उसकी गरिमा के भी अनुरूप नहीं था। उसके बाद कुसुम के लगातार आग्रह के बावजूद किसलय नहीं मिला, वह बहुत अपसेट था! कुछ वक़्त मिला होता शांत हो जाने को तो शायद वह मिलता भी! पर, वह इतना ट्रॉमैटाइज़्ड महसूस कर रहा था कि कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। आज वह कह सकता है कि अगर मिला होता, उसकी बातें मानी होतीं, तो शायद कुछ और ही उनके हिस्से होता! जब उसे याद आती है कुसुम की बात, "बस मिल लो, तुम जो कहोगे मैं वही करूंगी, सब ठीक हो जाएगा, मैं कह रही हूं, मेरी बात मान लो!"; तो वह गड़ जाता है अपराध-बोध से, अफ़सोस से, पश्चात्ताप से! और, फिर फ़ोन पर उसका यह कहना, "मैं रो रही हूं!"
वह कैसा हो गया था, क्यों हो गया था इतना हृदयहीन! जिसके कान अपने सीने के पास लाकर अपनी धड़कनें सुनाता था, जिसके सीने पर सर रखकर उसकी जवां धड़कनें वह गिनता था, जिसके माथे पर अपनी अंगुलियों से वह जाने क्या लिखता रहता था; उसके सुबकने की अनसुनी की! बहुत सालती हैं वे बातें! किसलय नहीं था वैसा, पर हुआ ये सब!
किसलय याद करता है कि जब किसी बात पर उसके नीर बहे जा रहे थे, कुसुम ने उसकी हथेली ली और अपने लब रख दिये उसके रुख़सार पर आहिस्ता से किसी बच्चे की तरह! जब वह पीठ उसकी तरफ़ करके लेटती तो वह उसके बालों में अंगुलियां फिराते कहता, "बब्बू, मैं तुमसे बातें करना चाहता हूं, पीठ से नहीं!" वह कहती, "तो बोलो न, मैं सुन रही हूं सब!" किसलय मनुहार करता, "नहीं, मुझे तुम्हें देखते हुए बात करनी है, तुम्हारी आंखों को देखना है"। किसलय पूछता कि तुम्हें मेरी आंखों में प्यार नहीं नज़र आता? कुसुम को शरारत सूझती और मुंह बनाती कहती, "नहीं, मुझे तो दीखता ही नहीं!" और, हंस पड़ती। ऐसा कहते हुए उसकी नाक पर बल पड़ते। किसलय उसकी नाक से अपनी नाक रगड़ते हुए लाड़ करता। बीच में सौतन चश्मा आ जाता तो 'कोरा काग़ज़' की याद आती और किसलय चहक कर कहता, "नैन मिले कैसे!" और धीरे से उसका चश्मा उतार कर मेज़ पर रख देता।
कभी-कभी कुसुम खरगोश मालूम पड़ती, बहुत कोमल, मुलायम! किसलय से एक दिन बोलती है, "आज मुझे एक बात कहनी है तुझसे, कहूं?" उसका चेहरा दोनों हथेलियों में भर कर किसलय कहता है, "बोलो"। शांत स्वर में वह कहती है, "तुमसे मिल कर मैं घर जाती हूं तो अच्छा नहीं लगता! मुझे वहां समय नहीं बिताना!" किसलय कुछ नहीं कहता, उसका माथा चूम लेता है। छुपा लेता है उसे अपने सीने में।
दोनों अभी बच्चे की तरह ही थे निष्कपट। कम-से-कम दुनियादारी तो बिल्कुल समझ में नहीं आती थी। पर, दोनों की प्रेममय दोस्ती धीरे-धीरे खटकने लगी एक जोड़ी आंख को। और, सब गड्ड-मड्ड हो गया। कुसुम दुनिया से लड़ जाने को तैयार थी। पर, किसलय अनभ्यस्त था। वह बचपन से ही अड़ता नहीं था किसी बात के लिए। आपत्ति हुई किसी को, छोड़ दी प्यारी से प्यारी जगह, चांद से सुन्दर, स्फटिक मणि की तरह पवित्र इंसान को! यह उसकी दुर्बलता थी शायद या ख़ौफ़ के साये में हुई उसकी परवरिश ने उसे ऐसा बना दिया। कुसुम के पिता बिना कुछ बोले भी उसे आहत करने की कला जानते थे, और किसलय के पिता ज़रूरत से ज़्यादा नियंत्रण रखते थे। एक ही समय में किसलय दोषी भी ठहराया जा सकता था और हालात का शिकार भी!
कभी-कभी लगता है, कुछ चीज़ें समय हाथ पकड़ कर हमसे करा देता है, और जीवन भर के लिए जो घाव दे जाता है, वह भरता नहीं कभी!
किसलय पर बेइंतहा भरोसा करती थी कुसुम। पलायन करते हुए वह यह भी भूल गया था कि उसने क्या वादे किये थे! "जान, मुझे डर लगता है!", जब कुसुम आशंकित होती, तो किसलय उसके होंठों पर अपनी अंगुली रख देता, जब फ़ोन पर होता तो उसे तस्कीन देता, अंदेशे मिटाता! पर, जब इम्तिहान की घड़ी आई तो उसने मुंह मोड़ लिया! जब कुसुम को उसकी सबसे अधिक ज़रूरत थी, उसने नहीं मानी! वह कुसुम से रूठा या ख़ुद से, पता नहीं। उसने कुसुम से एक बार कहा था, "जो चीज़ मुझे बहुत प्यारी होती है, वह बहुत दिनों तक मेरे पास नहीं रहती। मुझसे छिन जाती है, टूट जाती है मुझसे, कुछ हो जाता है! इंसान के साथ भी यही अनुभव है। जहां अनुराग बढ़ता है, दूर चले जाते प्यारे लोग। अभिशप्त हूं मैं!" कुसुम उससे कहती, "मैं सारे अभिशापों से तुम्हें मुक्त करने ही तो आई हूं। ... मैं देखूं तो सही दुनिया तुम्हें कैसे सताती है...."
कुसुम से वह बहुत लाड़ करता, शिकायतें भी कि अभी-अभी तो आई हो, अभी-अभी जाना है... पूरे 24 घंटे गुज़ारने की तमन्ना रखता कि निहारे उसे जी भर!
कह तो दिया कि अब हम कभी नहीं मिलेंगे, पर उसके बाद किसलय फिर कभी पहले की तरह नहीं रह पाया। एक हिस्सा कहीं सूख ही गया जो फिर कभी हरा नहीं हो पाया! हमेशा चहकने वाला, महफ़िलों की रौनक किसलय अब दोस्तों के जमावड़े में भी तन्हा महसूस करता था, संजीदा होता चला गया वह। वह ख़ुद से बातें करते हुए कहता, "कुसुम के अंदर की कोमलता को ठेस पहुंचाने का गुनाहगार हूं"। कुसुम के अंदर के बिखराव, उसकी टुटन, मुसलसल उसकी उदासी के लिए वह ख़ुद को दोषी मानता।
और, वो जो बर्तन खाने के बाद रखे गये थे कोने में, उसे धोने का मन नहीं होता! उसमें लगी दाल कब की सूख गई! 7 महीने बाद जब कमरा खाली करने लगा किसलय, तो वे धुले!
इंसान इतना असहाय क्यों हो जाता है कि एक ही धरती पर रहते हुए वे फिर कभी मिल नहीं पाते!
जो व्यक्ति इतना संकोची था जिसे ख़ुद अपने ही अहसास का पता नहीं चल पाता था न वह स्वीकार कर पाता था, न अपने जज़्बात से अकेले में बात कर पाता था; वह अब अपनी अनुभूतियों के बारे में साफ़-साफ़ सोच सकता है, उसे दीवार पर किसी चित्र की तरह स्पष्ट देख सकता है। उसे पता है कि वह बेनज़ीर इंसान क्या थी! मानिनी! गर्व से दीप्त! किसी बच्चे की-सी निश्छल! उसे सुलाने की कोशिश में आहिस्ता-आहिस्ता भवें दबाते हुए जब उसकी आंखें मुंदने लगती थीं तो यूं महसूस होता था गोया संसार के सारे सुन्दर सपने आकर वहीं उसकी पलकों ठहर गये हों! सोते में वह और पाकीज़ा-सी लगती थी!
जब वह थोड़ी देर बाद जगती थी, और उतर कर नीचे को आने को होती तो वह पाकीज़ा को याद करते हुए उसे नाज़ से कहता, "आपके पाँव देखे, बहुत हसीन हैं। इन्हें ज़मीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जायेंगे"।
वह शर्मा जाती, मुस्करा भर देती! उस पल उसकी दोशीजगी और भी निखर आती! जब वह उसके पैरों का बोसा लेने को आगे बढ़ता, वह चेहरा ठुकरा देती और उसकी निर्दोष हंसी पूरे चेहरे पर फैल जाती। किसलय उसे प्यार से "नाजों पली" कहता!
उसे सरदर्द होता तो वह उसे दबाता भी अलग-अलग तरीक़े से, और फूंकता भी जैसे वह कोई गुणी जादूगर हो और उसका सारा दर्द उसके टोटके से हर जायेगा!
एक रोज़ किसलय बहुत अनमना-सा था और थक कर चूर। वह याद करता है कुसुम को! आती है तो उसे उनींदा देख कर कहती है कि तुम्हें और सोना है तो आराम करो। मैं फिर आऊंगी। वह बोलता है कि नहीं हो गया। बस थोड़ी देर और, और अपनी हथेली उसकी तरफ़ कर देता है। वह उसके कंधे और पीठ दबाती है। उसके लम्स और ऊष्मा से सारी थकन जाती रहती है।
जब वह थकी नज़र आती तो वह उसका सर अपनी गोद में रख लेता, दबाता। उसकी एड़ियां थकतीं, वह यूं थकन निकालता! कब उनके बीच से तकल्लुफ़ मिटे, कब दोनों सहज हुए, परस्पर विश्वास बढ़ता गया, अनुमति की ज़रूरत जाती रही, किसी को पता ही नहीं चला!
वह उसके साथ खेलता था बच्चे की तरह, गुदगुदी करता! उसे हंसाने के जतन करता! वह आई थी किसी नेमत की तरह! कराती थी उसे महसूस निरापद! वह उससे मचलते हुए कहता, "तुम थोड़ा इंतज़ार नहीं कर सकती थी? सब कुछ ज़ल्दी-ज़ल्दी क्यों!" वह कुछ नहीं कहती, बस मुस्करा देती और वहीं फूल खिल उठते!
कुसुम ने बड़ी मुश्किल से ख़ुद को संभाला, कितना कुछ अंदर ही अंदर दरकता रहा। किसलय उसकी नज़रों से ओझल, उसकी दुनिया से बेख़बर था। "एक इंसान तो ऐसा आया जो मेरे वजूद से ही भयभी होकर चला गया!", कुसुम की यह वेदना 4 बरस बाद किसलय जान पाया। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कुसुम ने ख़ुद को कठोर बना लिया था। वह किसलय के प्रति ही निर्मम नहीं थी, ख़ुद के प्रति भी निष्ठुर। और, यह घड़ी किसलय को खाये जाती थी! वह मासूम प्रेम को पल्लवित होने से पहले ही मसलने वाला अपराधी था।
जब से किसलय ने अपनी तरुणी के हाथ झटके, वह हंसना भूल गया! उसके बिना कहां रह सका हरा-भरा! कहां उबरा फिर! उसकी अनुपस्थिति में भी चारों तरफ़ उसी की उपस्थिति तो है!
जिये हुए क्षणों के प्रति निष्ठुर होने व स्मृतियों को निर्ममता से बिसरा देने या कि मसल दिये जाने के दौर में कुछ यादों को बचा लेने का जतन किसलय बारहा करता है! यादें चाहे जैसी भी हों, शिशुवत ही हुआ करती हैं, आप पर है कि उन्हें दुलराते हैं या दुत्कारते हैं, उनकी अंगुली पकड़ते हैं या हाथ झटकते हैं!
कोई पूछे कि कहां आना है, किसलय बोलता है कि आपको 1947 तो याद रहेगा, फिर 147 भी आ जाएंगे आसानी से! कोई 3 बरस यहां रहना हुआ किसलय का। कितनी बातें, कितनी यादें, कुछ बहुत मासूम क़िस्म के रिश्ते का अंकुरण! कुछ निश्छल, नि:स्वार्थ दोस्तियों का पनपना! उमंग व उत्साह भरी प्रतीक्षा, टेलीपैथी ऐसी कि एक याद करे तो दूजे को ख़बर लगे, किसी का एक आवाज़ पर ख़ुशी-ख़ुशी आना कि गुलशन का कारोबार चलता रहे! और, कितनी अनुभूति पहली और आख़िरी! हर उस बात के लिए कृतज्ञता!
कितनी सियासी-समाजी-अदबी गुफ़्तगू यहां हुई! फिर जब खीझ, क्षोभ, ऊब, झुंझलाहट के दिन शुरू हुए तो यही कमरा काटने को दौड़े! कीट्स किसलय के काम आते हैं, "The air I breathe, in a room empty of you, is unhealthy." और, यादों से जंग फरमाते-फरमाते एक दिन मध्य परिसर छोड़ने का निर्णय, और फिर उदास क़दमों के साथ पूरब की ओर!
We look before and after,
And pine for what is not:
Our sincerest laughter
With some pain is fraught.
Our sweetest songs are those
That tell of saddest thought.
- Shelly in "To a Skylark"
कोई साढ़े पांच वर्ष बाद किसलय अपने कमरे को देखने की हिम्मत जुटा पाया! इस ठांव के पास से चुपचाप गुज़र जाता रहा! उसे लगता है कि हमें निर्मम होकर स्मृतियों को खुरचने के बजाय उनके प्रति सदय होना चाहिए। आज एक क़िस्म से वह यहां की तवाफ़ कर आया!
किसलय कुसुम को कभी बिसराना नहीं चाहता। वह उसकी यादों को सहेजे हुए रहता है जो किसी संबल की तरह है उसके लिए। वह दुआ करता है:
वो बड़ा रहीमो-करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूं तो मिरी दुआ में असर न हो।
(बशीर बद्र)
किसलय जब याद करता है कुसुम को, तो वह खिल उठता है। उसे बार-बार आवाज़ लगाता है, "बब्बू, बब्बू, बब्बू, सुनो न!" और उसकी आंखों से आंसू झर-झर बहने लगते हैं। उसे ख़याल आता है कि कुसुम ने तो उसकी उदासी पर भी प्रतिबंध लगा रखा है। और, उसने भी तो उससे वादा किया था, "कोशिश करूंगा कि अब से तुम्हें याद न किया करूं!" किसलय असहाय-सा महसूस कर रहा था। प्रकृति कभी-कभी कितना अभिशप्त कर देती है कि याद करना कोई गुनाह हो जैसे, और उसके लिए भी आदमी माफ़ी मांगता है। किसलय एक दिन लिखता है:
कम-से-कम एक इंसान का
दुनिया में
कोई स्थानापन्न नहीं होता!
तुम मुझसे उदास होने का हक़ भी ले लेना चाहती हो?
तुम याद किये जाने को लेकर नाराज़ होती हो!
तुम सहज मानवीय भावों से भी वंचित कर देना चाहती हो?
क्या स्मृतियों का पाथेय भी ले लोगी?
एक बात पूछूं?
इतनी निर्ममता तुम्हारे प्रेमिल आंचल में समा पाएगी?
जब किसलय को वे यादें अपनी गिरफ़्त में लेती हैं और सामने कुसुम को नहीं पाता तो वह कहता है:
तुम तो शाकाहारी हो
पर तुम्हारी यादें
नहीं हैं शाकाहारी
वे आती हैं अचानक
झपट्टा मारते हुए
और भक्षण करती हैं
पूरे वजूद का!
(जारी)
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