चेतना व संवेदना के साहित्यकार प्रेमचन्द
आज कलम के सिपाही व हिन्दी-उर्दू उपन्यास के कुशल शिल्पी मुंशी प्रेमचंद की जयन्ती है। एक ऐसे दौर में जब सियासत व संस्थान शनैः-शनैः अपनी स्वायत्तता खोते जा रहे हैं, प्रेमचंद की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। पर, सवाल ये है कि जिसने पूस की रात देखी ही नहीं, वो हलकू का दर्द भला क्या जाने! प्रेमचन्द से मैं पहली बार मिला पिताजी की पीजी की सेलेस्टियल मैकेनिक्स की एक किताब के पहले पन्ने पर, जहां वो अपनी ही ग़ुरबत के तज़ुर्बे व ज़िंदगी के फ़लसफ़े बयां कर रहे थे, "विपत्ति से बढकर अनुभव सिखाने वाला कोई विश्वविद्यालय आज तक नहीं खुला"।
प्रेमचंद कहते हैं कि साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है, उसे अपने असली रूप में निकलते हुए शायद लज्जा आती है, इसलिए वो संकृति की खाल ओढ़कर आती है। आज गाय-भैंस के नाम पर जो देश में क़त्लेआम हो रहा है, उसमें आज से 93 साल पहले 1924 में कही गई उनकी बात बरबस याद आती है, "गोकुशी के मामले में हिन्दुओं ने शुरू से अब तक अन्यायपूर्ण ढंग अख्तियार किया है। हमको अधिकार है कि हम जिस जानवर को चाहें पवित्र समझें, लेकिन यह उम्मीद रखना कि दूसरे धर्म को माननेवाले भी उसे वैसा ही पवित्र समझें, ठीक नहीं है। अगर हिन्दुओं को यह जानना बाकी है कि इंसान किसी जानवर से कहीं ज़्यादा पवित्र प्राणी है, चाहे वह गोपाल की गाय हो या ईसा का गधा, तो उन्होंने अभी सभ्यता की वर्णमाला भी नहीं समझी"।
एक ऐसे निष्ठावान साहित्यकार, जिन्हें कलम का मजदूर भी कहा गया; की वास्तविक पूँजी मानवता के उन्नयन हेतु साहित्यिक हथियार का सदुपयोग करते हुए सामाजिक व राजनीतिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता थी, जिसका वे मृत्यु-शय्या तक निर्वहन करते रहे।। 'पंच परमेश्वर' से लेकर 'कफन' तक एक सरल रेखा खींची जा सकती है, कहीं कोई वक्रता नहीं आयी। जहाँ एक ओर वे कहते हैं, "अपने उत्तरदायित्व का बोध बहुधा हमारे संकुचित विचारों का सुधारक होता है", वहीं दूसरी ओर पाखंड पर करारा प्रहार करते हुए कहते हैं, "ये कैसा रिवाज़ है कि जिसे जीते-जी तन ढकने के लिए चिथड़े नहीं नसीब होते, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए"। उसी पंच परमेश्वर में खाला कहती है, "बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे"? शतरंज के खिलाड़ी में नवाबी विलासिता पर चोट करते हुए लिखते हैं, "ये वो अहिंसा नहीं थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होकर पुष्प की वर्षा करते हैं, बल्कि ये वो अहिंसा थी, जिस पर कायर से कायर लोग भी आंसू बहाते हैं"। प्रेमचंद का युगबोध व सार्वभौमिकतायुक्त विपुल रचना-संसार हमारी चोतना को झकझोरता है, संवेदना को झिंझोरता है। प्रेमचंद 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के समय कहते हैं, "हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो,स्वाधीनता का भाव हो,सौन्दर्य का सार हो,सृजन की आत्मा हो,जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो -- जो हममें गति, संघर्ष, घोर बेचैनी पैदा करे ,सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है"।
जब मैं स्नातक में छोटे-से शहर के बड़े कॉलिज टीएनबी कॉलिज, भागलपुर में पढ़ता था, तो प्रेमचंद जयन्ती पर कॉलिज में सबको कुछ-न-कुछ बोलना होता था। सौ अंक का "राष्ट्रभाषा हिन्दी" नामक पत्र हमें पढ़ाया जाता था। 2009 के प्रेमचंद जयन्ती कार्यक्रम में वनस्पति विज्ञान के एक साथी ने उठकर बोलना शुरू किया, "प्रेमचंद भारतमाता की सच्ची संतान थे। यदि हम उनकी कहानियों को नहीं पढ़ते हैं, तो ये न केवल हमारी संस्कारहीनता है, बल्कि प्रेमचंद जैसे महान सपूत की आत्मा को ठेस पहुँचाने जैसा है। हम कहाँ जा रहे हैं ? अपने वीर साहित्यकार को भूलते जा रहे हैं, जिन्होंने देश को आज़ाद कराने के लिए अद्भुत व अभूतपूर्व अंदाज़ में लिखने के साथ-साथ पाँच बार जेल की सज़ा भोगी। प्रेमचंद ने न जाने कितनी कहानियाँ रच दीं, अनगिनत उपन्यास लिखे...।"
जब वो भलेमानुष कुछ ज़्यादा ही उग्र होकर प्रेमचंद पर अलौकिक जानकारी देते हुए अटकलबाजी पर उतर आये और राष्ट्रवादी तेवर में अपने ज्ञान का भोंडा प्रदर्शन करना शुरु कर दिया, तो हमारे प्राध्यापक प्रो. आलोक चौबे ने बीच में रोका, "भाई प्रेमचंद की आत्मा की परवाह करना आप कृपया छोड़ दें, उन पर आपकी अद्भुत मीमांसा की कोई बाध्यता नहीं है। नहीं बोलना हो, तो बस शालीन श्रोता बनके बैठिये, पर प्रेमचंद के नाम पर इस कदर अफ़वाह न फैलायें। उनकी रचनाओं का एक हिसाब-किताब है।" तो, प्रत्युत्तर में ज्ञानी जी अपनी तीक्ष्ण प्रत्युत्पन्नमति का सहारा लेकर बोले, "सर, अब ये पुनीत मौक़ा एक साल के बाद ही आयेगा, मुझे "पूस की रात" पर अपने शब्दों में कुछ रोशनी डालने दीजिए। उस कहानी में मुझे सबसे ज़्यादा कुत्ते के साथ हलकू का सोना भाया। ऐसा चित्रण सिर्फ़ और सिर्फ़ श्री प्रेमचंद जी कर सकते थे। हिन्दी साहित्य में ऐसा मार्मिक वर्णन किसी और रचयिता के बूते से बाहर की बात है। प्रेमचंद जैसे कवि बार-बार पैदा नहीं होते।" इस पर सर ने कहा, "क्या आपने आज तक प्रेमचंद की कोई कविता पढ़ी है"?
अलज़ेब्रा की किताब बेचकर यदि प्रेमचंद ने तिलिस्म की किताब ख़रीद ली, तो क्या ग़लत किया? जो इंसान ज़िन्दगी की भाषा समझता है, वो गणित की भाषा समझता भी नहीं, और न ही उसकी कोई ज़रूरत है। आज जिस तरह देश के विश्वविद्यालय ढहते जा रहे हैं या कि उन्हें ढाहा जा रहा है, कहीं टैंक लगाने का प्रस्ताव रखा जा रहा है, तो कहीं छात्रों को ख़ुदकुशी करने पर मजबूर, कहीं छात्रसंघ अध्यक्ष समेत अनेकों छात्रों का एडमिशन ब्लॉक कर हास्टल ट्रांसफ़र का फ़रमान सुना दिया जाता है, वहीं न्यायालय में गुहार लगाने पर जवाब मिलता है कि सोशल जस्टिस क्या होता है?; वैसे में प्रेमचन्द की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, जो कहते हैं, "ये विश्वविद्यालय नहीं गुलाम पैदा करने के कारखाने हैं"। वि. वि. को वि. वि. ही रहने दिया जाना चाहिए, उसे युद्ध का मैदान क्यों बनाया जा रहा है, समझ से परे है। छात्रों को टैंक नहीं सीट चाहिए, हास्टल चाहिए, लाइब्रेरी में और रीडिंग हाल चाहिए, समय पर फ़ेलोशिप चाहिए, पर्याप्त संख्या में प्राध्यापक चाहिए। और, उनके लिए ऐसी मांग हेतु विज़न चाहिए, पर वीसी को टैंक पसंद है। हमारे कुलपति 21वीं सदी के बख़्तियार खिलजी हैं। खिलजी ने गौरवशाली नालंदा वि. वि. को जलाकर राख कर दिया था, ये जेएनयू को खाक़ में मिलाने पर तुले हैं। जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिस दूरदर्शिता की ज़रूरत होती है, उससे सर्वथा विमुख लोगों को जानबूझकर कुलपति के पद पर बिठाया जा रहा है।
हमें अपनी नयी नस्ल की बेचैनी व छटपटाहट को समझते हुए अपने नायकों की समृद्ध साहित्यिक व बौद्धिक विरासत से अवगत कराने की आवश्यकता है, ताकि उन्हें भटकाव से रोका जा सके। प्रेमचंद कहते हैं, "चरित्र के भ्रष्ट होने का ख़तरा खुली आबो-हवा में उतना नहीं होता, जितना कि बंद कमरे में"। इसलिए, हम अपने बच्चों को वाजिब व ज़रूरी आज़ादी भी दें व उनकी परवरिश पर भरोसा रखें, नहीं तो सामाजिक सरोकारों के प्रति हमारी सजगता व प्रतिबद्धता भी कुपोषण का शिकार समाज ही निर्मित करेंगी।
जयन्त
31.07
31.07
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