Thursday, 20 April 2017

उच्च शिक्षा की तबाही (सीटबंदी) के दौर में मंडल को याद करने का अर्थ  

अपने साथियों के साथ 392 पृष्ठ की मंडल कमीशन की रिपोर्ट तैयार कर देश को सामाजिक-आर्थिक​ विषमता से निबटने का एक तरह से मुकम्मल दर्शन देने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व ओजस्वी सांसद बी.पी. मंडल (बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल : 25 अगस्त 1918 - 13 अप्रैल 1982) की आज 35वीं पुण्यतिथि है। 20 दिसंबर 1978 को प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अनुच्छेद 340 के तहत नए पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा सदन में की। आयोग की विज्ञप्‍ति 1 जनवरी, 1979 को जारी की गईजिसकी रिपोर्ट आयोग ने 31 दिसंबर 1980 को दी जिसे राष्ट्रपति ने अनुमोदित किया। 30 अप्रैल 1982 में इसे सदन के पटल पर रखा गयाजो 10 वर्ष तक फिर ठंडे बस्ते में रहा। वी.पी. सिंह की सरकार ने 7 सितंबर 1990 को सरकारी नौकरियों में पिछड़ों के लिए 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा की।

मौजूदा नस्ल को हर वक़्त सचेत रहने की ज़रूरत है कि लोकतंत्र को कभी भी फॉर ग्रांटिड नहीं लिया जा सकता। हर दिन यह अपने नागरिकों से सतर्कता व प्रतिबद्धता की अपेक्षा रखती है। यह खु़द के प्रति छलावा होगा कि जम्हूरियत अपनी हिफ़ाज़त ख़ुद कर लेगी। लोकतंत्र की आयु के लिहाज़ से 70 साल कोई दीर्घ अवधि नहीं होती। हिन्दुस्तानी जमहूरियत अभी किशोरावस्था से निकली ही है। परइतनी कम उम्र में इसने इतने सारे रोग पाल लिए हैं कि बड़ी चिंता होती है। कुपोषण के शिकार अपने इस बड़ेकमोबेश सफल एवं गाँधीअम्बेडकरजयप्रकाशलोहियाफूलेसावित्री,झलकारीनम्बूदरीपादपेरियारआदि सियासी शख़्सियतों की आजीवन पूँजी व चिरटिकाऊ होने के सदिच्छाओं से अनुप्राणित इस बाहर से बुलन्द जिस्म वाले जनतंत्र की नासाज रूह की तीमारदारी करनी होगी।

वर्षों धूल फांकने के बाद मंडल कमीशन की रिपोर्ट पर शरद यादवरामविलास पासवानजार्ज फर्नांडिस, मधु लिमए, मधु दंडवते,लालू प्रसादआदि नेताओं द्वारा सदन के अंदर लगातार धारदार बहस और सड़क पर सतत संघर्ष के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री व पिछड़ों के उन्नायक श्री वी. पी. सिंह ने अपनी जातीय सीमा खारिज़ करते हुएबुद्ध की परम्परा का निर्वहन करते हुए इस देश के अंदर लगातार बढ़ती जा रही विषमता की खाई को पाटने हेतु कमीशन की रपट को लागू करने का साहसिकऐतिहासिक व सराहनीय क़दम उठाकर यह साबित किया कि इच्छाशक्ति हो व नीयत में कोई खोट न होतो मिली-जुली सरकार भी क़ुर्बानी की क़ीमत पर बड़े फैसले ले सकती है।

Photo Courtesy: Google
दुनिया की किसी भी कल्याणकारी योजना से इतने कम समय में इससे बड़ी तादाद व जमात में लोगों के जीवन-स्तर में शायद ही असरदार व काबिले-ज़िक्र तब्दीली आयी हो। अमेरिका में भी दबे-कुचले समुदाय के लोगों की ज़िन्दगी संवारने व उन्हें मुख्यधारा में लाने हेतु अफरमेटिव एक्शन का प्रावधान है और वहाँ इसके प्रतिरोध में कभी कुतर्क नहीं गढ़े जाते। मुझे अमेरिकी कवयित्री एला व्हीलर विलकॉक्स याद आती हैं : 
In India’s land one listens aghast
To the people who scream and bawl;
For each caste yells at a lower caste,
And the Britisher yells at them all. 
(“In India’s Dreamy Land”) 

अर्थात,
भारतवर्ष में लोग बात सुनते 
उन्हीं की जो चीखते व चिल्लाते;
क्योंकि हर जाति दुर्बलतर जाति पर धौंस जमाती
औरब्रिटिशजन उन सब को हिकारत भरी नज़र से देखते.
(आर्यावर्त की स्वप्निल ज़मीं पर) 

वी.पी. सिंह ने जिस मंत्रालय के ज़िम्मे कमीशन की सिफारिश को अंतिम रूप देने का काम सौंपा थाउसकी लेटलतीफी देखते हुए उन्होंने उसे रामविलास पासवान के श्रम व कल्याण मंत्रालय में डाल दिया। उस समय यह मंत्रालय काफी बड़ा हुआ करता था और अल्पसंख्यक मामलेआदिवासी मामलेसामाजिक न्याय व अधिकारिताश्रमकल्याण सहित आज के छह मंत्रालयों को मिलाकर एक ही मंत्रालय होता था। श्री पासवान की स्वीकारोक्ति है कि तत्कालीन सचिव पी.एस. कृष्णनजो दक्षिण भारतीय ब्राह्मण थेने इतने मनोयोग से प्रमुदित होकर काम किया कि दो महीने के अंदर मंडल कमीशन की सिफारिशों को अंतिम रूप दे दिया गया। आरक्षण आरक्षण की ज़रूरत समाप्त करने के लिए लागू हुआ था। परक्या कीजै कि बड़ी सूक्ष्मता से इस देश में आरक्षण को डायल्युट किया जा रहा है और मानसिकता वही है कि हम तुम्हें सिस्टम में नहीं आने देंगे। पिछडों के उभार के प्रति ये असहिष्णुता दूरदर्शिता के लिहाज़ से ठीक नहीं है। केंद्र सरकार का डेटा है कि आज भी केंद्र सरकार की नौकरियों में वही 12 फ़ीसदी के आसपास पिछड़े हैंजो कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के पहले भी अमूमन इतनी ही संख्या में थे। आख़िर कौन शेष 15 % आरक्षित सीटों पर कुंडली मार कर इतने दिनों से बैठा हुआ हैयही रवैया रहा तो लिख कर ले लीजिए कि इस मुल्क से क़यामत तक आरक्षण समाप्त नहीं हो सकता।

जेएनयू जैसी ज़गह में भी आप पीएच.डी तो कर लेंगेपर अध्यापन हेतु साक्षात्कार के बाद नोट फाउंड सुटेबल” करार दे दिये जाएँगे। परये भी थोड़ा संतोष देता था कि अब आप अपनी जीवटतालगन और अपने जुझारूपन व अध्यवसाय से पढ़ ले पा रहे थे। ये सदियों के विचित्र समाज की कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी। मगरइस साल से तो युजीसी ग़ज़ट की आड़ में उपेक्षितों-शोषितों की कोई खेप निकट भविष्य में शोध के ज़रिए अपने समाज के क्रानिक बीमारियों को समझने व दूर करने के लिए विश्वविद्यालय की देहरी लांघ ही नहीं पाएंगे। हर जगहहर छोटे-बड़े विभाग बंद कर दिए गए हैं। जेएनयू में पिछले साल एम.फिल.-पी.एचडी. के इंटीग्रेटेड प्रोग्राम में हुए एडमिशन की तुलना में 83% की भारी सीट कट के साथ मात्र 102 सीटों पर इस साल दाखिले हो रहे हैं। अर्जुन सिंह ने 2006 में उच्च शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर मंडल को जो विस्तार दिया थाउसमें पलीता लगा दिया गया है। अगर बी. पी. मंडल व उस वक़्त के संघर्ष के अपने जांबाज योद्धाओं को सच्चे अर्थों में हम याद करना व रखना चाहते हैंतो हमें निकलना ही होगा सड़कों परतेज़ करने होंगे व बदलने भी पड़ेंगे प्रतिरोध के अपने औजार।

  जो लोग ज़माने की ठोकरों में पलते हैं 
 एक दिन वही​ ज़माने का रुख़ बदलते हैं।  

 -जयन्त जिग्यासु 
(शोधार्थीजेएनयू)

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