Friday, 17 February 2017


                        जननायक कर्पूरी ठाकुर की जनपक्षधर राजनीति को याद करते हुए


पिछड़ों-दबे-कुचलों के उन्नायक, बिहार के शिक्षा मंत्री, एक बार उपमुख्यमंत्री (5-3-67 से 31-1-68) और दो बार मुख्यमंत्री (22 दिसंबर 70 - 2 जून 71 एवं 24 जून 77 - 21 अप्रैल 79) रहे जननायक कर्पूरी ठाकुर (24.1.1924 - 17.2.88) को उनकी 29वीं पुण्यतिथि पर सलाम ! आज़ादी की लड़ाई में वे 26 महीने जेल में रहे, फिर आपातकाल के दौरान रामविलास पासवान और रामजीवन सिंह के साथ नेपाल में रहे। 1952 में बिहार विधानसभा के सदस्य बने। शोषितों को चेतनाशील बनाने के लिए वो अक़्सर अपने भाषण में कहते थे -

उठ जाग मुसाफिर भोर भई
अब रैन कहां जो सोवत है।

बिहार में 1978 में हाशिये पर धकेल दिये वर्ग के लिए सरकारी रोज़गार में 26 प्रतिशत आरक्षण लागू करने पर उन्हें क्या-क्या न कहा गया, भद्दी गालियां दी गयीं, जो यहां लिखने लायक नहीं है। अभिजात्य वर्ग के लोग उन पर तंज कसते हुए ये भी बोलते थे -

कर कर्पूरी कर पूरा
छोड़ गद्दी, धर उस्तूरा।

एक बार वो निधन से ठीक तीन महीने पहले पिताजी के बुलावे पर एक कार्यक्रम में अलौली (खगड़िया) आये थे। वहां मंच से वो बोफोर्स पर बोलते हुए राजीव गांधी के स्विस बैंक के खाते का उल्लेख कर रहे थे। कर्पूरी जी भाषण के दौरान ही धीरे से एक पुर्जे (रेल टिकट) पर लिखकर 'कमल' की अंग्रेज़ी जानना चाहा। मंच पर बैठे लोगों ने कर्पूरी जी की किताब "कितना सच, कितना झूठ" बंटवा रहे पिताजी को ज़ल्दी से बुलवाया। फिर उसी स्लिप पर पापा ने 'लोटस' लिख कर बढ़ाया। और, कर्पूरी जी राजीव गांधी को लपेटते रहे कि राजीव मने कमल, और कमल को अंग्रेजी में लोटस बोलते हैं। इसी नाम से स्विस बैंक में खाता है श्री गांधी का। अपना ही अंदाज़ था कर्पूरी जी का।

पिताजी ने ही बटवायी थी वह किताब खगड़िया में। पर, अफ़सोस कि आख़िरी प्रति जो बची थी, वह 97 में लालू जी ने मांगी थी, तो उन्हें दे दी। अब उनके बेटे रामनाथ ठाकुर के पास शायद हो। मेरी उसे पढ़ने की बड़ी ख़्वाहिश है।

90 में अलौली में लालू जी का पहला कार्यक्रम था मिश्री सदा कालिज में। कर्पूरी जी को याद करते हुए उन्होंने कहा, "जब कर्पूरी जी आरक्षण की बात करते थे, तो लोग उन्हें मां-बहन-बेटी की गाली देते थे। और, जब मैं रेज़रवेशन की बात करता हूं, तो लोग गाली देने के पहले अगल-बगल देख लेते हैं कि कहीं कोई पिछड़ा-दलित-आदिवासी सुन तो नहीं रहा है। ज़ादे भचर-भचर किये तो कुटैबो करेंगे। ये बदलाव इसलिए संभव हुआ कि कर्पूरी जी ने जो ताक़त हमको दी, उस पर आप सबने भरोसा किया है।" किसी दलित-पिछड़े मुख्यमंत्री को बिहार में कार्यकाल पूरा करने नहीं दिया जाता था। श्रीकृष्ण सिंह के बाद सफलतापूर्वक अपना कार्यकाल पूरा करने वाले लालू प्रसाद पहले मुख्यमंत्री थे।

70 के दशक के उत्तरार्द्ध (78) में कर्पूरी ठाकुर सिर्फ़ सिंचाई विभाग में 17000 रिक्तियों (वैकेन्सी) के लिए आवेदन आमंत्रित करते हैं। और, एक सप्ताह भी नहीं बीतता है कि रामसुंदर दास को आगे करके ज्ञानी-ध्यानी लोग उनकी सरकार गिरवा देते हैं। ऐसा अकारण नहीं होता है। पहले होता ये था कि बैक डोर से अस्थायी बहाली कर दी जाती थी, बाद में उसी को नियमित कर दिया जाता था। एक साथ इतने लोग फेयर तरीके से ओपन रिक्रूटमेंट के ज़रिये बहाल हों; इस पूरी व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठे कुछ लोग भला क्योंकर पचाने लगे, सो सरकार गिराना व कर्पूरी की माँ-बहन करना ही उन्हें सहल जान पड़ा। आज भी विश्वविद्यालय के किरानी, चपरासी, मेसकर्मी से लेकर समाहरणालय-सचिवालय तक के क्लर्क आपको कुछ ख़ास जातियों से ताल्लुक़ात रखने वाले आसानी से मिल जायेंगे।

हमारे टीएनबी कॉलिज, भागलपुर के हॉस्टलों में दरबान से लेकर मेसप्रबंधक तक आपको मधुबनी तरफ के पंडीजी मिल जायेंगे। एक दिन मैंने वेस्ट ब्लॉक हॉस्टल के एक बुज़ुर्ग सज्जन, जिनकी मैं बड़ी इज़्ज़त करता था (रात को आने में देर होने पर थोड़े मान-मनौव्वल के बाद वे गेट खोल देते थे); से कहा, "बाबा, आपलोग इतनी बड़ी तादाद में एक ही इलाके से सिस्टम में घुसे कैसे ?" वे मुस्कराते हुए बोले, "सब जगन्नाथ मिश्रा जी की कृपा है। जो जिस लायक़ था, उस पर वैसी कृपा बरसी। चपरासी से लेकर 'भायस चांसलॉर' तक वे चुटकी में बनाते थे। बस साहेब की कृपा बरसनी चाहिए।" तो, खाली प्रोफेसरे नै बनाते थे मिश्रा जी, चपरासी और किरानियो में लगबाते थे जग्गू बाबू। मेस में भी प्रसन्न होने पर अपने इलाके के लोगों को घुसवाते थे। वाकई बहुते दयालु थे अपनी चलती के दिनों में जगन्नाथ बाबू, है न ?

- जयन्त जिग्यासु
ई-मेल : jigyasu.jayant@gmail.com

(लेखक सम्प्रति जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में मीडिया अध्ययन केंद्र में शोधार्थी हैं।)

No comments:

Post a Comment