Saturday, 18 February 2017


                                      देश के ढहते विश्वविद्यालयों को बचाओ






विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के साथ खिलवाड़ के इस दौर में युजीसी का नया  फरमान लोकतंत्र की जड़ में मट्ठा डालने वाला है। युजीसी के नये गज़ट का सीधे-सरल शब्दों में मतलब समझें तो हम पाते हैं कि यह युनिवर्सिटी में शोध के दरवाज़े बंद करने जा रहा है। देश भर के कैंपसों में पहले से फंड कट को लेकर पनपे आक्रोश के बीच यह अदूरदर्शी फ़ैसला उन्हें बारूद की ढेर पर खड़ा कर देगा, जिसमें सामाजिक न्याय का भग्नावशेष भी न बचेगा। जेएनयू कुलपति-सह-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष श्री ममीडाला साहब मार डालने पर तुले हुए हैं, जगादेश जी रोज़-ब-रोज़ विचित्र आदेश जारी कर रहे हैं।

जहां एक ओर लिखित परीक्षा (दो प्रारूप में - आब्जेक्टिव व सब्जेक्टिव) को क्वालिफाइंग और मौखिक परीक्षा (वाइवा-वोसे) को निर्णायक बनाने का विश्लेषण सामने दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सीट कट की चाल चली जाती है। यह बेहद हैरतअंगेज़ है। यह सरकार की शिक्षाविरोधी एवं शोधविरोधी रवैये को प्रकट करता है। अब्दुल नाफ़े कमिटि द्वारा वाइवा के अंक 30 से घटाकर 15 करने के रेकमेंडेशन को भी कुलपति ने गज़ट की आड़ में पलीता लगा दिया है। पिछले साल जो लड़ाई लड़ी गयी, उसका हासिल भी बेकार करने की फिराक में प्रशासन जुटा हुआ है। पिछले साल यह तय हुआ कि सभी स्तरों पर शोषित तबके के अभ्यर्थियों को छूट मिलेगी। पर, सबके लिए 50 फ़ीसदी अंक लिखित परीक्षा में लाना अनिवार्य कर देने से मार्जिनलाइज़्ड सेक्शन के लोगों के साथ बड़ा ही क्रूर मज़ाक हो गया है। यह तो आरक्षण की बुनियादी अवधारणा का ही उल्लंघन है।

इसमें दो मत नहीं कि इसका असर शोध करने के सपने के साथ समाज की चेतना के स्तर को उठाने के लिए विश्वविद्यालय पहुंचने वाले सभी कैटगरी के एमए के छात्रों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा। साथ ही इसकी जद में एम.फिल. के छात्र भी आयेंगे। इसके पीछे वजह यह है कि पीएचडी में हर प्रफेसर, एसोशिएट प्रोफेसर एवं असिस्टेंट प्रोफेसर के साथ काम करने वाले शोधार्थियों की संख्या सीमित कर क्रमश: 8, 6 और 4 कर दी गयी है। वहीं एम.फिल. के लिए यह संख्या क्रमश: 3, 2 और 1 है।  जिन्हें गाइड अलाट नहीं हुआ है, वो तो दिनदहाड़े गाइडलेस हो जायेंगे।




जहां वाइवा-वोसे में हो रहे भेदभाव को युनिवर्सिटी द्वारा गठित कमेटी ने ही पड़ताल के बाद माना है। वहीं , 27 शिक्षकों द्वारा घटाने के पक्ष में व 23 शिक्षकों द्वारा नहीं घटाने के पक्ष में राय आने के बाद भी कुलपति ने अजीबोगरीब फ़ैसला लिया कि हर सेंटर अपने हिसाब से तय कर ले कि किनको घटाना है, किनको यथास्थिति  (स्टेटस को) मेंटेन रखना है।

इस फ़ैसले का विरोध करने पर 9 छात्रों - भूपाली कुसुम विट्ठल, शकील, दावा शेरपा, मुलायम सिंह, राहुल सोनपिंपले, दिलीप यादव, दिलीप कुमार, प्रशांत निहाल और मृत्युंजय सिंह को निलंबित कर दिया गया था, और दो मौजूदा छात्र - वीरेंद्र और थल्लापल्ली प्रवीण को पूर्ववर्ती छात्र बताकर उन्हें भी अकादमिक परिषद की उस बैठक में बाधा पहुंचाने के लिए ज़िम्मेदार बताया गया, जिस बैठक को प्रशासन ने ही संपन्न माना। यह अपने आप में ही विरोधाभासी है।  गज़ट के खिलाफ़ दिलीप, अनिल मीणा, राजू समेत कई छात्र भूख हड़ताल पर बैठे थे, और अभी भी कुछ साथी बैठे हुए हैं। पर, घनघोर असंवेदनशील प्रशासन अपनी मनमानी करते जा रहा है। इस तरह से पूरे देश की उच्च शिक्षा-व्यवस्था को चौपट कर निजीकरण पर सरकार आमादा है। अदूरदर्शी कुलपति जी को देश के कोने-कोने से आये युवाओं का करियर संवारने के काम में लगना चाहिए, पर उन्हें अपने सौंदर्य-बोध (एस्थेटिक सेंस) का शत प्रतिशत इस्तेमाल कर एड ब्लॉक को फुलवाड़ी बनाके उसकी क्यारी सींचने-सजाने से ही फुर्सत कहां है ! अजी साहेब,

घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे
(वसीम बरेलवी)



एम.ए. के छात्रों का भविष्य अधर में लटका दिया गया है, बीच में एम.फिल-पीएचडी के इंटीग्रेटेड प्रोग्रैम को डिलिंक करने की बात भी चली। इस जगत में जाने कैसे-कैसे अजब-ग़ज़ब आदेश जारी करने वाले, मार डालने को उद्यत ममीडाला साहेब की कारस्तानियों के जवाब में जेएयू की फिज़ाओं में गूंज रहा है -

आज अगर तुम सोओगे
तो कल बैठ के रोओगे।
आज अगर तुम सो जाओगे
एम.फिल कैसे कर पाओगे




हम अपील करते हैं कि पिछले आठ दिनों से प्रशासनिक भवन पर देश भर की उच्च शिक्षा व्यवस्था को झालमुढ़ी में बेचकर भक्षण कर जाने को आमादा सरकार व प्रशासन का प्रतिरोध कर रहे जुझारू कर्मण्यों की हौसलाफज़ाई के लिए देश भर के विश्वविद्यालयों में आक्रोश की अभिव्यक्ति को उभारें, अपने स्तर से इसमें अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें। जेएनयू के साथी भी अपेक्षाकृत अधिक संख्या में बंद कमरों से निकलें, सहयोग कर इस मुहिम को सफल बनायें, ताकि प्रोस्पेक्टस छपने के पहले छात्रविरोधी नामांकन नीतियों को थोपे जाने से रोका जा सके, और काफ़ी जद्दोजहद के बाद लंबी दूरी तय कर विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने वाले साथियों को शोध करने की होड़ से पीछे धकेल दिये जाने की घिनौनी साज़िश से बचाया जा सके। हम आशान्वित हैं कि इस घुप्प गहन अंधकार से निकलकर विश्वविद्यालय परिसर और भी निखरकर सामने आयेगा। इस घटाटोप ने हमें तलाश कर, तराश कर सोमाया गुप्ता, मनमीत रंधावा, सुमित समोस, अनुभूति, परमजीत काजल, कमलिनी, श्यामली, शाम्भवी शर्मा, वर्षा नायर जैसे कई प्रखर एक्टिविस्ट दिये हैं। इसलिए, सबसे अच्छे और सबसे बुरे वक़्तों में से एक इस कालखंड में जी रही हमारी नस्ल लोकतंत्र की गंदगी को बाहर निकलते देख रही है, जो उच्च शिक्षा की किडनी फेल  होने नहीं देगी।

छात्र एकता ज़िंदाबाद ! सामाजिक न्याय ज़िंदाबाद !
लैंगिक न्याय ज़िंदाबाद ! बुद्धि-विवेक ज़िंदाबाद !

Friday, 17 February 2017


                        जननायक कर्पूरी ठाकुर की जनपक्षधर राजनीति को याद करते हुए


पिछड़ों-दबे-कुचलों के उन्नायक, बिहार के शिक्षा मंत्री, एक बार उपमुख्यमंत्री (5-3-67 से 31-1-68) और दो बार मुख्यमंत्री (22 दिसंबर 70 - 2 जून 71 एवं 24 जून 77 - 21 अप्रैल 79) रहे जननायक कर्पूरी ठाकुर (24.1.1924 - 17.2.88) को उनकी 29वीं पुण्यतिथि पर सलाम ! आज़ादी की लड़ाई में वे 26 महीने जेल में रहे, फिर आपातकाल के दौरान रामविलास पासवान और रामजीवन सिंह के साथ नेपाल में रहे। 1952 में बिहार विधानसभा के सदस्य बने। शोषितों को चेतनाशील बनाने के लिए वो अक़्सर अपने भाषण में कहते थे -

उठ जाग मुसाफिर भोर भई
अब रैन कहां जो सोवत है।

बिहार में 1978 में हाशिये पर धकेल दिये वर्ग के लिए सरकारी रोज़गार में 26 प्रतिशत आरक्षण लागू करने पर उन्हें क्या-क्या न कहा गया, भद्दी गालियां दी गयीं, जो यहां लिखने लायक नहीं है। अभिजात्य वर्ग के लोग उन पर तंज कसते हुए ये भी बोलते थे -

कर कर्पूरी कर पूरा
छोड़ गद्दी, धर उस्तूरा।

एक बार वो निधन से ठीक तीन महीने पहले पिताजी के बुलावे पर एक कार्यक्रम में अलौली (खगड़िया) आये थे। वहां मंच से वो बोफोर्स पर बोलते हुए राजीव गांधी के स्विस बैंक के खाते का उल्लेख कर रहे थे। कर्पूरी जी भाषण के दौरान ही धीरे से एक पुर्जे (रेल टिकट) पर लिखकर 'कमल' की अंग्रेज़ी जानना चाहा। मंच पर बैठे लोगों ने कर्पूरी जी की किताब "कितना सच, कितना झूठ" बंटवा रहे पिताजी को ज़ल्दी से बुलवाया। फिर उसी स्लिप पर पापा ने 'लोटस' लिख कर बढ़ाया। और, कर्पूरी जी राजीव गांधी को लपेटते रहे कि राजीव मने कमल, और कमल को अंग्रेजी में लोटस बोलते हैं। इसी नाम से स्विस बैंक में खाता है श्री गांधी का। अपना ही अंदाज़ था कर्पूरी जी का।

पिताजी ने ही बटवायी थी वह किताब खगड़िया में। पर, अफ़सोस कि आख़िरी प्रति जो बची थी, वह 97 में लालू जी ने मांगी थी, तो उन्हें दे दी। अब उनके बेटे रामनाथ ठाकुर के पास शायद हो। मेरी उसे पढ़ने की बड़ी ख़्वाहिश है।

90 में अलौली में लालू जी का पहला कार्यक्रम था मिश्री सदा कालिज में। कर्पूरी जी को याद करते हुए उन्होंने कहा, "जब कर्पूरी जी आरक्षण की बात करते थे, तो लोग उन्हें मां-बहन-बेटी की गाली देते थे। और, जब मैं रेज़रवेशन की बात करता हूं, तो लोग गाली देने के पहले अगल-बगल देख लेते हैं कि कहीं कोई पिछड़ा-दलित-आदिवासी सुन तो नहीं रहा है। ज़ादे भचर-भचर किये तो कुटैबो करेंगे। ये बदलाव इसलिए संभव हुआ कि कर्पूरी जी ने जो ताक़त हमको दी, उस पर आप सबने भरोसा किया है।" किसी दलित-पिछड़े मुख्यमंत्री को बिहार में कार्यकाल पूरा करने नहीं दिया जाता था। श्रीकृष्ण सिंह के बाद सफलतापूर्वक अपना कार्यकाल पूरा करने वाले लालू प्रसाद पहले मुख्यमंत्री थे।

70 के दशक के उत्तरार्द्ध (78) में कर्पूरी ठाकुर सिर्फ़ सिंचाई विभाग में 17000 रिक्तियों (वैकेन्सी) के लिए आवेदन आमंत्रित करते हैं। और, एक सप्ताह भी नहीं बीतता है कि रामसुंदर दास को आगे करके ज्ञानी-ध्यानी लोग उनकी सरकार गिरवा देते हैं। ऐसा अकारण नहीं होता है। पहले होता ये था कि बैक डोर से अस्थायी बहाली कर दी जाती थी, बाद में उसी को नियमित कर दिया जाता था। एक साथ इतने लोग फेयर तरीके से ओपन रिक्रूटमेंट के ज़रिये बहाल हों; इस पूरी व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठे कुछ लोग भला क्योंकर पचाने लगे, सो सरकार गिराना व कर्पूरी की माँ-बहन करना ही उन्हें सहल जान पड़ा। आज भी विश्वविद्यालय के किरानी, चपरासी, मेसकर्मी से लेकर समाहरणालय-सचिवालय तक के क्लर्क आपको कुछ ख़ास जातियों से ताल्लुक़ात रखने वाले आसानी से मिल जायेंगे।

हमारे टीएनबी कॉलिज, भागलपुर के हॉस्टलों में दरबान से लेकर मेसप्रबंधक तक आपको मधुबनी तरफ के पंडीजी मिल जायेंगे। एक दिन मैंने वेस्ट ब्लॉक हॉस्टल के एक बुज़ुर्ग सज्जन, जिनकी मैं बड़ी इज़्ज़त करता था (रात को आने में देर होने पर थोड़े मान-मनौव्वल के बाद वे गेट खोल देते थे); से कहा, "बाबा, आपलोग इतनी बड़ी तादाद में एक ही इलाके से सिस्टम में घुसे कैसे ?" वे मुस्कराते हुए बोले, "सब जगन्नाथ मिश्रा जी की कृपा है। जो जिस लायक़ था, उस पर वैसी कृपा बरसी। चपरासी से लेकर 'भायस चांसलॉर' तक वे चुटकी में बनाते थे। बस साहेब की कृपा बरसनी चाहिए।" तो, खाली प्रोफेसरे नै बनाते थे मिश्रा जी, चपरासी और किरानियो में लगबाते थे जग्गू बाबू। मेस में भी प्रसन्न होने पर अपने इलाके के लोगों को घुसवाते थे। वाकई बहुते दयालु थे अपनी चलती के दिनों में जगन्नाथ बाबू, है न ?

- जयन्त जिग्यासु
ई-मेल : jigyasu.jayant@gmail.com

(लेखक सम्प्रति जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में मीडिया अध्ययन केंद्र में शोधार्थी हैं।)