देश के ढहते विश्वविद्यालयों को बचाओ
जहां एक ओर लिखित परीक्षा (दो प्रारूप में - आब्जेक्टिव व सब्जेक्टिव) को क्वालिफाइंग और मौखिक परीक्षा (वाइवा-वोसे) को निर्णायक बनाने का विश्लेषण सामने दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सीट कट की चाल चली जाती है। यह बेहद हैरतअंगेज़ है। यह सरकार की शिक्षाविरोधी एवं शोधविरोधी रवैये को प्रकट करता है। अब्दुल नाफ़े कमिटि द्वारा वाइवा के अंक 30 से घटाकर 15 करने के रेकमेंडेशन को भी कुलपति ने गज़ट की आड़ में पलीता लगा दिया है। पिछले साल जो लड़ाई लड़ी गयी, उसका हासिल भी बेकार करने की फिराक में प्रशासन जुटा हुआ है। पिछले साल यह तय हुआ कि सभी स्तरों पर शोषित तबके के अभ्यर्थियों को छूट मिलेगी। पर, सबके लिए 50 फ़ीसदी अंक लिखित परीक्षा में लाना अनिवार्य कर देने से मार्जिनलाइज़्ड सेक्शन के लोगों के साथ बड़ा ही क्रूर मज़ाक हो गया है। यह तो आरक्षण की बुनियादी अवधारणा का ही उल्लंघन है।
इसमें दो मत नहीं कि इसका असर शोध करने के सपने के साथ समाज की चेतना के स्तर को उठाने के लिए विश्वविद्यालय पहुंचने वाले सभी कैटगरी के एमए के छात्रों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा। साथ ही इसकी जद में एम.फिल. के छात्र भी आयेंगे। इसके पीछे वजह यह है कि पीएचडी में हर प्रफेसर, एसोशिएट प्रोफेसर एवं असिस्टेंट प्रोफेसर के साथ काम करने वाले शोधार्थियों की संख्या सीमित कर क्रमश: 8, 6 और 4 कर दी गयी है। वहीं एम.फिल. के लिए यह संख्या क्रमश: 3, 2 और 1 है। जिन्हें गाइड अलाट नहीं हुआ है, वो तो दिनदहाड़े गाइडलेस हो जायेंगे।
जहां वाइवा-वोसे में हो रहे भेदभाव को युनिवर्सिटी द्वारा गठित कमेटी ने ही पड़ताल के बाद माना है। वहीं , 27 शिक्षकों द्वारा घटाने के पक्ष में व 23 शिक्षकों द्वारा नहीं घटाने के पक्ष में राय आने के बाद भी कुलपति ने अजीबोगरीब फ़ैसला लिया कि हर सेंटर अपने हिसाब से तय कर ले कि किनको घटाना है, किनको यथास्थिति (स्टेटस को) मेंटेन रखना है।
इस फ़ैसले का विरोध करने पर 9 छात्रों - भूपाली कुसुम विट्ठल, शकील, दावा शेरपा, मुलायम सिंह, राहुल सोनपिंपले, दिलीप यादव, दिलीप कुमार, प्रशांत निहाल और मृत्युंजय सिंह को निलंबित कर दिया गया था, और दो मौजूदा छात्र - वीरेंद्र और थल्लापल्ली प्रवीण को पूर्ववर्ती छात्र बताकर उन्हें भी अकादमिक परिषद की उस बैठक में बाधा पहुंचाने के लिए ज़िम्मेदार बताया गया, जिस बैठक को प्रशासन ने ही संपन्न माना। यह अपने आप में ही विरोधाभासी है। गज़ट के खिलाफ़ दिलीप, अनिल मीणा, राजू समेत कई छात्र भूख हड़ताल पर बैठे थे, और अभी भी कुछ साथी बैठे हुए हैं। पर, घनघोर असंवेदनशील प्रशासन अपनी मनमानी करते जा रहा है। इस तरह से पूरे देश की उच्च शिक्षा-व्यवस्था को चौपट कर निजीकरण पर सरकार आमादा है। अदूरदर्शी कुलपति जी को देश के कोने-कोने से आये युवाओं का करियर संवारने के काम में लगना चाहिए, पर उन्हें अपने सौंदर्य-बोध (एस्थेटिक सेंस) का शत प्रतिशत इस्तेमाल कर एड ब्लॉक को फुलवाड़ी बनाके उसकी क्यारी सींचने-सजाने से ही फुर्सत कहां है ! अजी साहेब,
घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे
(वसीम बरेलवी)
एम.ए. के छात्रों का भविष्य अधर में लटका दिया गया है, बीच में एम.फिल-पीएचडी के इंटीग्रेटेड प्रोग्रैम को डिलिंक करने की बात भी चली। इस जगत में जाने कैसे-कैसे अजब-ग़ज़ब आदेश जारी करने वाले, मार डालने को उद्यत ममीडाला साहेब की कारस्तानियों के जवाब में जेएयू की फिज़ाओं में गूंज रहा है -
आज अगर तुम सोओगे
हम अपील करते हैं कि पिछले आठ दिनों से प्रशासनिक भवन पर देश भर की उच्च शिक्षा व्यवस्था को झालमुढ़ी में बेचकर भक्षण कर जाने को आमादा सरकार व प्रशासन का प्रतिरोध कर रहे जुझारू कर्मण्यों की हौसलाफज़ाई के लिए देश भर के विश्वविद्यालयों में आक्रोश की अभिव्यक्ति को उभारें, अपने स्तर से इसमें अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें। जेएनयू के साथी भी अपेक्षाकृत अधिक संख्या में बंद कमरों से निकलें, सहयोग कर इस मुहिम को सफल बनायें, ताकि प्रोस्पेक्टस छपने के पहले छात्रविरोधी नामांकन नीतियों को थोपे जाने से रोका जा सके, और काफ़ी जद्दोजहद के बाद लंबी दूरी तय कर विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने वाले साथियों को शोध करने की होड़ से पीछे धकेल दिये जाने की घिनौनी साज़िश से बचाया जा सके। हम आशान्वित हैं कि इस घुप्प गहन अंधकार से निकलकर विश्वविद्यालय परिसर और भी निखरकर सामने आयेगा। इस घटाटोप ने हमें तलाश कर, तराश कर सोमाया गुप्ता, मनमीत रंधावा, सुमित समोस, अनुभूति, परमजीत काजल, कमलिनी, श्यामली, शाम्भवी शर्मा, वर्षा नायर जैसे कई प्रखर एक्टिविस्ट दिये हैं। इसलिए, सबसे अच्छे और सबसे बुरे वक़्तों में से एक इस कालखंड में जी रही हमारी नस्ल लोकतंत्र की गंदगी को बाहर निकलते देख रही है, जो उच्च शिक्षा की किडनी फेल होने नहीं देगी।
छात्र एकता ज़िंदाबाद ! सामाजिक न्याय ज़िंदाबाद !
लैंगिक न्याय ज़िंदाबाद ! बुद्धि-विवेक ज़िंदाबाद !




