Monday, 7 August 2017

सांप्रदायिकता से जूझने वाला सामाजिक न्याय का योद्धा






पत्थर तोड़ने वाली भगवतिया देवी, जयनारायण निषाद, ब्रह्मानंद पासवान, आदि को संसद भेजने वाले, खगड़िया स्टेशन पर बीड़ी बनाने वाले विद्यासागर निषाद को मंत्री बनाने वाले एवं बिना डिगे सांप्रदायिकता से जूझने का माद्दा रखने वाले लोकप्रिय, मक़बूल व विवादास्पद नेता लालू प्रसाद ने 90 की शुरूआत में यह साबित किया कि जमात की राजनीति से अभिजात्य वर्ग के वर्चस्व को चुनौती देकर समाज में समता व बंधुत्व को स्थापित किया जा सकता है। मानसिक शोषण व गुलामी से बहुत हद तक निजात दिलाने में वे क़ामयाब रहे। 

यह तस्वीर है 90-91 की। पहली तस्वीर है 91 के लोकसभा चुनाव प्रचार की, जिसमें हैं बलिया के तत्कालीन सांसद सूरज दा, चौथम के विधायक व संप्रति भाकपा के प्रांत सचिव कामरेड सत्यनारायण सिंह, पिताजी व अन्य। दूसरी तस्वीर है 90 की, जिसमें हैं जनता के बीच मक़बूल व मशहूर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद, माकपा के समर्पित नेता गीता यादव, अभिनंदन भाषण करते पिताजी व अन्य। (खगड़िया के तत्कालीन डीएम सुधीर त्रिपाठी जी कुछ कहते हैं तो पापा पीछे मुड़कर देखते हैं।) तब जनता दल व बड़े वामपंथी धड़े का गठबंधन था। देहात के फूस के घर में बारिश की बूंदों के चलते लगभग ख़राब हो चुके फटे-पुराने एलबम में कहीं दुबकी पड़ी इन दो तस्वीरों को देखते हुए बड़ा हुआ, और बचपन से लालू प्रसाद की जनराजनीति व लोकसंवाद की अद्भुत कला को समझने की कोशिश कर रहा हूँ। वे सूचना व प्रसारण मंत्रालय की स्वायत्त इकाई व जनसंचार का मक्का कहे जाने वाले एशिया के सबसे बड़े संस्थान के रूुप में चर्चित भारतीय जनसंचार संस्थान कभी नहीं गए, पर किसी भी मंझे हुए कम्युनिकेटर से कहीं ज़्यादा कुशलता व दक्षता के साथ अपना असर छोड़ते हुए जनसामान्य से संवाद स्थापित करने की कला में छात्रजीवन से ही पारंगत नेता हैं।




आरएसएस की उन्मादी, सांप्रदायिक, विभाजनकारी व राष्ट्रभंजक राजनीति करने वालों के खिलाफ खड़ी होनेवाली लोकतांत्रिक शक्तियों की भूमिका व हमारे संघर्ष में उनके अंशदान को हम नम्रता से स्वीकार करते हैं। जिनके पैर शूद्रों और दलितों को ठोकर मारते थे, उनके दर्प को तोड़ने का काम लालू प्रसाद ने किया।


मुख्यमंत्री बनने के बाद 90 में अलौली में लालू जी का पहला कार्यक्रम था मिश्री सदा कालिज में। पिताजी उसी कालिज में गणित के व्याख्याता थे। कर्पूरी जी को याद करते हुए लालू जी ने कहा, "जब कर्पूरी जी आरक्षण की बात करते थे, तो लोग उन्हें मां-बहन-बेटी की गाली देते थे। और, जब मैं रेज़रवेशन की बात करता हूं, तो लोग गाली देने के पहले अगल-बगल देख लेते हैं कि कहीं कोई पिछड़ा-दलित-आदिवासी सुन तो नहीं रहा है। ज़ादे भचर-भचर किये तो कुटैबो करेंगे। ये बदलाव इसलिए संभव हुआ कि कर्पूरी जी ने जो ताक़त हमको दी, उस पर आप सबने भरोसा किया है।"


बिहार में दस साल नीतीश ने संघ को अपना पैर पसारने का भरपूर अवसर मुहैया कराया व शासकीय संरक्षण दिया। मैंने लालू को लगातार पांच चुनाव में शिक़स्त खाते देखा है, पर विचारधारात्मक स्तर पर, धर्मनिरपेक्षता के मामले में लड़खड़ाते कतई नहीं। लगातार पाँच चुनावों (फरवरी 05 व अक्टूबर 05 का विधानसभा चुनाव, 09 का लोस चुनाव, 10 का विस चुनाव एवं 14 का लोस चुनाव) में करारी हार के बाद आदमी सत्ता के गलियारे में अलबला के न जाने किस-किस से हाथ मिलाने को तैयार हो जाता है, मगर लालू प्रसाद ने भाजपा के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। इसीलिए, वे जॉर्ज फर्णांडिस, शरद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार से कहीं ज़्यादा बड़े नेता के रूप में अक़्लियतों के बीच स्थापित हैं। ऐसा नहीं कि जॉर्ज-शरद-रामविलास-मुलायम की पहले की लड़ाई को लोग भूल गये हैं या उसकी क़द्र नहीं है। लेकिन, सामाजिक न्याय साम्प्रदायिक सौहार्द के बगैर अधूरा रहेगा। लालू प्रसाद के प्रति मेरी अपनी आलोचनाएँ हैं, पर सियासी मूल्यांकन सदैव निरपेक्ष नहीं हो सकता। देश की मौजूदा परिस्थिति में मेरी यही मान्यता है। यह भी सच है कि जम्हूरियत में चुनाव ही सबकुछ नहीं है, सामाजिक-सांस्कृतिक जागृति के लिए उत्तर भारत में व्यापक स्तर पर कोई पहल कम ही हुई है।

कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार-सा है।
(कैफ़ी आज़मी)


बाक़ी बातें एक तरफ, लालू प्रसाद का सेक्युलर क्रेडेंशियल एक तरफ। लालू जी की इसी धर्मनिरपेक्ष छवि का क़ायल रहा हूं। 89 के दंगे के बाद विषाक्त हो चुके माहौल में 90 में सत्ता संभालने के बाद बिहार में कोई बड़ा दंगा नहीं होने दिया। मौजूदा हालात में जहां धर्मनिरपेक्ष देश को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने की जबरन कोशिश की जा रही है, वैसे में सामाजिक फ़ासीवाद से जूझने का जीवट रखने वाले नेता कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते। बिहार में किसी को अपना कार्यकाल पूरा करने क्यों नहीं दिया जाता था, इस पर कभी सोचिएगा। चाहे वो दारोगा राय हों, भोला पासवान शास्त्री हों, अब्दुल गफ़ूर हों या कोई और, किसी ने अपना टर्म पूरा नहीं किया। कई मामलों में तुलनात्मक रूप से मैं लालू प्रसाद को श्री कृष्ण सिंह,केदार पांडेय, विनोदानंद झा, बिंदेश्वरी दूबे, भागवत झा आज़ाद, जगन्नाथ मिश्र और के.बी. सहाय (इनकी कार्यशैली के बारे में साहित्यकार, ट्रेड युनियन लीडर व एमएलए रहीं रमणिका जी बेहतर बताएंगी) से बेहतर मुख्यमंत्री मानता हूँ।


बिहार में सरकारी स्तर पर सामंतशाही के संरक्षण पर बिहार के पहले सोशलिस्ट विधायक, सांसद व सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे बी. एन. मंडल चोट करते हैं, जब केदार पांडेय की सरकार के दौरान समाजवादी विधायक सूर्यनारायण सिंह को1973 में इतनी बर्बरता से पीटा गया कि उनकी मौत हो गई। 2 मई, 73 को राज्यसभा में सवाल उठाते हुए भूपेंद्र बाबू ने कहा, “जब सूर्यनारायण सिंह को पुलिस लाठी से मार रही थी, उस समय पूंजीपति के घर पर बिहार का मुख्यमंत्री और एक युनियन का नेता बैठ कर चाय पी रहे थे। और, कहा जाता है कि इन लोगों के षड्यंत्र की वजह से ही उनको मार लगी। ... जलाने के समय में जब उनकी देह को खोला गया, तो समूची पीठ का चमड़ा लाठी की मार से फट गया था। ... ऐसी हालत में अगर लोग अहिंसा को छोड़कर हिंसा का मार्ग पकड़ते हैं, तो कौन-सी बेजा बात करते हैं”।


बिहार लेनिन बाबू जगदेव प्रसाद की किस बर्रबरता और अमानवीयता से हत्या की गई, वह किसी से छिपा नहीं है। उन्हें घसीटा गया, लाठियां बरसायी गईं, प्यास लगने पर उनके मुंह पर पेशाब करने की बात की गई, और साज़िश में जो रामाश्रय सिंह शामिल थे; 2005 में जब नीतीश कुमार लोजपा को तोड़कर गाय-माल की तरह 17-18 विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त कर रहे थे, उस वक़्त लोजपा से भागकर कथित रूप से एक करोड़ में जदयू के हाथों बिके उस आतताई को छविप्रिय 'बालगांधी' नीतीश जी ने अपने मंत्रीमंडल में संसदीय कार्य और जलसंसाधन मंत्री बना दिया।


कर्पूरी ठाकुर पर घोटाले का कहीं कोई आरोप नहीं था, पर दो-दो बार उनकी सरकार नहीं चलने दी गई। 70 के उत्तरार्ध में सिर्फ़ सिंचाई विभाग में वे 17000 वैकेंसिज़ लेकर आते हैं, और जनसंघी पृष्ठभूमि के लोग रामसुंदर दास को आगे करके एक हफ़्ते के अंदर सरकार गिरवा देते हैं। जहां एक साथ इतने बड़े पैमाने पर फेयर तरीक़े से ओपन रिक्रुटमेंट हो, वहां मास्टर रोल पर सजातीय लोगों को बहाल कर बाद में उन्हें नियमित कर देने की लत से लाचार जातिवादी लोग इस पहल को क्योंकर पचाने लगे!


श्री कृष्ण सिंह के बाद अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने वाले लालू प्रसाद बिहार के पहले मुख्यमंत्री हैं। हां, अंतर्विरोधों से दो-चार होना भारतीय लोकतंत्र की नियति बनती जा रही है, जो कचोटता है। जिसने संचय-संग्रह की प्रवृत्ति से पार पा लिया, वह संसदीय राजनीतिक इतिहास में कर्पूरी ठाकुर-मधु लिमये की भांति अमर हो जाएगा। ऐसे त्याग की भावना के साथ  जनसेवा करने वाले जनता के नुमाइंदे विरले आते हैं। पर, मैं आश्वस्त हूं कि आज भी भले लोग हैं जो ओछी महत्वाकांक्षाओं से परे समाज में परिवर्तन के पहिए को घुमाना चाहते हैं ताकि व्यक्ति की गरिमा खंडित न हो, सब लोगों के लिए प्रतिष्ठापूर्ण जीवन सुनिश्चित हो सके।


नीतीश जी ने कहा है कि लालू जी का जीवन संघर्ष से भरा है। वे जिस तरह के बैकग्राउंड से निकलकर आए हैं और जिस ऊंचाई को हासिल किया है, वह बहुत बड़ी बात है।


90 के दौर में जब आडवाणी जी रथयात्रा पर निकले थे और बाबरी को ढहाने चले थे, तो लालू प्रसाद ने उन्हें समस्तीपुर में नाथ दिया था। सभी राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी में पटना की एक विशाल  रैली में वे कहते हैं, "चाहे सरकार रहे कि राज चला जाए, हम अपने राज्य में दंगा-फसाद को फैलने नहीं देंगे। जहां बावेला खड़ा करने की कोशिश हुई, तो सख्ती से निपटा जाएगा। 24 घंटे नज़र रखे हुए हूँ। जितनी एक प्रधानमंत्री की जान की क़ीमत है, उतनी ही एक आम इंसान की जान की क़ीमत है। जब इंसान ही नहीं रहेगा, तो मंदिर में घंटी कौन बजाएगा, जब इंसान ही नहीं रहेगा तो मस्जिद में इबादत देने कौन जाएगा ?" लोग उस लालू प्रसाद के प्रति आभारी हैं, जिन्होंने बिहार में वर्षों से तिरस्कार झेल रही बड़ी आबादी को ग़ैरत के साथ प्रतिष्ठापूर्ण जीवन जीने का साहस दिया,जिनकी पहली प्राथमिकता 'विकास का हव्वा' नहीं, उपेक्षितों-अक़्लियतों की इज़्ज़त-आबरू-अस्मिता की हिफ़ाज़त थी।

लालू प्रसाद अपने अंदाज़ में मीडिया को भी अपनी साख बचाए व बनाए रखने की सीख देते हैं। 'राष्ट्रीय पत्रकारिता' के हवनात्मक पहलू के उभार के दौर में बतौरे-ख़ास एक नज़र :

मनोरंजन भारती : कुछ ज्ञानवर्धन कीजिए सर हमारा।

(Please, enlighten me on your ideals in life.)

लालू प्रसाद : ज्ञानवर्धने है, हरा-हरा सब्जी खाओ, दूध पियो, और सच्चा ख़बर छापा करो।

(Eat green vegetables, drink milk and tell the truth in your reports.)

(सौजन्य से : NDTVClassics)


उसी चारा घोटाले में फसने पर जगन्नाथ मिश्रा जगन्नाथ बाबू बने रहते हैं, पर लालू प्रसाद ललुआ हो जाते हैं। लालू प्रसाद से ललुआ तक की फिसलन भरी यात्रा में लालू प्रसाद की सारथी रही मीडिया का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तो करना पड़ेगा न...

एक बार श्री चंद्रशेखर ने सदन में कहा था, जो आज सत्ता पक्ष के लोगों को भूलना नहीं चाहिए, "एक बात हम याद रखें कि हम इतिहास के आख़िरी आदमी नहीं हैं। हम असफल हो जायेंगे, यह देश असफल नहीं हो सकता। देश ज़िंदा रहेगा, इस देश को दुनिया की कोई ताक़त तबाह नहीं कर सकती। ये असीम शक्ति जनता की, हमारी शक्ति है, और उस शक्ति को हम जगा सकें, तो ये सदन अपने कर्त्तव्य का पालन करेगा।"

जब अधिकांश लोग सेना बुला कर लालू प्रसाद को गिरफ़्तार करने पर 'भ्रष्टाचार' की ढाल बनाकर चुप्पी ओढ़े हुए थे और नीतीश जी जैसे लोग उल्टे इस क़दम के पक्ष में सदन में हंगामा कर रहे थे, तो चंद्रशेखर ने लालू प्रसाद मामले में सीबीआइ द्वारा अपने अधिकार का अतिक्रमण करने, न्यायपालिका को अपने हाथ में लेने व व्यवस्थापिका को अंडरएस्टिमेट करने के अक्षम्य अपराध पर लोकसभा में बहस करते हुए जो कहा था, उसे आज याद किये जाने की ज़रूरत है -

"लालू प्रसाद ने जब ख़ुद ही कहा कि आत्मसमर्पण कर देंगे, तो 24 घंटे में ऐसा कौन-सा पहाड़ टूटा जा रहा था कि सेना बुलाई गई ? ऐसा वातावरण बनाया गया मानो राष्ट्र का सारा काम बस इसी एक मुद्दे पर ठप पड़ा हुआ हो। लालू कोई देश छोड़कर नहीं जा रहे थे। मुझ पर आरोप लगे कि लालू को मैं संरक्षण दे रहा हूँ। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मेरी दिलचस्पी किसी व्यक्ति विशेष में नहीं है, ऐसा करके मैं इस संसदीय संस्कृति की मर्यादा का संरक्षण कर रहा हूँ। जब तक कोई अपराधी सिद्ध नहीं हो जाता, उसे अपराधी कहकर मैं उसे अपमानित और ख़ुद को कलंकित नहीं कर सकता। यह संसदीय परंपरा के विपरीत है, मानव-मर्यादा के अनुकूल नहीं है।

किसी के चरित्र को गिरा देना आसान है, किसी के व्यक्तित्व को तोड़ देना आसान है। लालू को मिटा सकते हो, मुलायम सिंह को गिरा सकते हो, किसी को हटा सकते हो जनता की नज़र से, लेकिन हममें और आपमें सामर्थ्य नहीं है कि एक दूसरा लालू प्रसाद या दूसरा मुलायम बना दें। भ्रष्टाचार मिटना चाहिए, मगर भ्रष्टाचार केवल पैसे का लेन-देन नहीं है। एक शब्द है हिंदी में जिसे सत्यनिष्ठा कहा जाता है, अगर सत्यनिष्ठा (इंटेग्रिटी) नहीं है, तो सरकार नहीं चलायी जा सकती। और, सत्यनिष्ठा का पहला प्रमाण है कि जो जिस पद पर है, उस पद की ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए, उत्तरदायित्व को निभाने के लिए आत्मनियंत्रण रखे, कम-से-कम अपनी वाणी पर संयम रखें। ये नहीं हुआ अध्यक्ष महोदय। 

सीबीआइ अपनी सीमा से बाहर गयी है, ये भी बात सही है कि उस समय सेना के लोगों ने, अधिकारियों ने उसकी माँग को मानना अस्वीकार कर दिया था। ये भी जो कहा गया है कि पटना हाइ कोर्ट ने उसको निर्देश दिया था कि सेना बुलायी जाये; वो बुला सकते हैं, इसको भी सेना के लोगों ने अस्वीकार किया था। ऐसी परिस्थिति में ये स्पष्ट था कि सीबीआइ के एक व्यक्ति, उन्होंने अपने अधिकार का अतिक्रमण किया था। मैं नहीं जानता कि कलकत्ता हाइ कोर्ट का क्या निर्णय है। उस बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहता। लेकिन ये प्रश्न ज़्यादा मौलिक है जिसका ज़िक्र अभी सोमनाथ चटर्जी ने किया। अगर पुलिस के लोग सेना बुलाने का काम करने लगेंगे, तो इस देश का सारा ढाँचा ही टूट जायेगा।

सेना बुलाने के बहुत-से तरीके हैं। वहाँ पर अगर मान लीजिए मुख्यमंत्री नहीं बुला रहे थे, वहाँ पर राज्यपाल जी हैं, यहाँ पर रक्षा मंत्री जी हैं, होम मिनिस्ट्री थी, बहुत-से साधन थे, जिनके ज़रिये उस काम को किया जा सकता था। लेकिन किसी पुलिस अधिकारी का सीधे सेना के पास पहुँचना एक अक्षम्य अपराध है। मैं नहीं जानता किस आधार पर कलकत्ता हाइ कोर्ट ने कहा है कि उनको इस बात के लिए सजा नहीं मिलनी चाहिए। मैं अध्यक्ष महोदय आपसे निवेदन करूँगा और आपके ज़रिये इस सरकार से निवेदन करूँगा कि कुछ लोगों के प्रति हमारी जो भी भावना हो, उस भावना को देखते हुए हम संविधान पर कुठाराघात न होने दें, और सभी अधिकारियों को व सभी लोगों को, चाहे वो राजनीतिक नेता हों, चाहे वो अधिकारी हों; उन्हें संविधान के अंदर काम करने के लिए बाध्य करें।

और, अगर कोई विकृति आयी है, तो उसके लिए उच्चतम न्यायालय का निर्णय लेना आवश्यक है, और मुझे विश्वास है कि हमारे मंत्री, हमारे मित्र श्री खुराना साहेब इस संबंध में वो ज़रा छोटी बातों से ऊपर उठकर के एक मौलिक सवाल के ऊपर बात करेंगे।"


आख़िर क्या वजह है कि घनघोर शुद्धतावादियों की निर्मम-निष्ठुर आलोचनाओं का दायरा लालू-मुलायम के चंदन-टीका करने से नवब्राह्मणवाद की उत्पत्ति तक ही सीमित रहता है ? यह आरोप भी दुराग्रहग्रस्त ही है कि शिक्षा व्यवस्था का बंटाधार बस लालू ने ही किया, मानो उनके आने के पहले ओक्सफ़र्ड,कैम्ब्रिज, कैलिफ़ोर्निया और कोलंबिया युनिवर्सिटिज़ की शाखाएं बिहार में चल रही हों। वीर कुंवर सिंह वि. वि., आरा, जयप्रकाश नारायण युनिवर्सिटी, छपरा, बी.एन. मंडल युनिवर्सिटी, मधेपुरा,विनोबा भावे युनिवर्सिटी, हज़ारीबाग़, सिदो-कान्हु-मुर्मू युनिवर्सिटी,दुमका, मौलाना मजहरूल हक़ अरबी फ़ारसी विश्वविद्यालय, पटना - ये सब 'गंवार-विज़नलेस' लालू ने ही खोलीं। अपने कार्यकाल में भागलपुर वि. वि. का नाम आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी तिलकामांझी के नाम पर किया। बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ्फरपुर का नाम बदलकर बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के नाम पर किया,जिसे बहुत लोग पचा नहीं पा रहे थे। वर्चस्वशाली लोग श्री कृष्ण सिंह के नाम पर कराना चाह रहे थे, जिस श्री कृष्ण सिंह ने इतना बड़ा मुंगेर ज़िला (उस समय बेगूसराय, खगड़िया, जमुई, लखीसराय,शेखपुरा - सब मुंगेर ज़िला में ही आता था) होने के बावजूद वहां कितने मेडिकल-इंजीनियरिंग कालिज खोले ? एक भी नहीं। कारण बताने की ज़रूरत नहीं। यह वही मुज़फ़्फ़रपुर था जहां भूमिहार-ब्राह्मण कालिज हुआ करता था, जिसका बाद में नाम बदलकर लंगट सिंह कालिज किया गया।


महिला आरक्षण बिल पर कोटे के अंदर कोटे की लड़ाई जिस तरह लालू प्रसाद ने शरद जी व मुलायम जी के साथ सदन के अंदर लड़ी, वो क़ाबिले-तारीफ़ है। आख़िर को वंचित-शोषित-पसमांदा समाज की महिलाएं भी क्यों नहीं सदन का मुंह देखें ? इतना-सा बारीक फ़र्क अगर समझ में नहीं आता, और संपूर्ण आधी आबादी की नुमाइंदगी के लिए संज़ीदे सियासतदां की पहल व जिद को कोई महिला विरोधी रुख करार देता है, तो उनकी मंशा सहज समझ में आती है। वे बस विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं को सदन में देखना चाहते हैं, ग़रीब-गुरबे, हाशिये पर धकेली गई, दोहरे शोषण की मार झेल रही खवातीन उनकी चिंता, चिंतन व विमर्श के केंद्र में नहीं हैं।

परिवार के आग्रह और पुत्रमोह व भ्रातृप्रेम में रामविलास पासवान अपना धड़ा बदलें, तो उसूल से भटका हुआ, पदलोलुप, अवसरवादी और न जाने क्या-क्या हो जाते हैं, वहीं कर्नाटक के मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र के राज्यपाल व देश के विदेश मंत्री रहे एस. एम. कृष्णा, दिग्गज कांग्रेसी नेता व युपी के मुख्यमंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा की पुत्री व युपी कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं रीता बहुगुणा जोशी, और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे उनके पुत्र विजय बहुगुणा कांग्रेस से सीधे भाजपा की गोद में जाकर बैठ जाते हैं, तो उस पर कोई हंगामा नहीं बड़पता, कोई चर्चा नहीं होती, उन्हें मीडिया की मंडी में खलनायक सिद्ध करने के लिए सांध्यकालीन बहस में टीवी के पर्दे हिलने नहीं लगते; उल्टे वो महान बागी व दूरदर्शी नेता कहलाते हैं। हालांकि आज के दिनांक में नीतीश ने साबित कर दिया कि पासवान पूसा वाले मौसमवैज्ञानिक ही ठहरे, इसरो वाले एक्सपर्ट मौसमविज्ञानी तो नीतीश कुमार ही हैं।

खेल इतना भी आसान नहीं, बड़ी कमज़ोर नस दबी हुई है कहीं नीतीश कुमार की। बीजेपी के सामने घुटने टेकने का मतलब है कि केंद्रीय सत्ता द्वारा ब्लैकमेलिंग चल रही थी। आएंगे सभी ज़द में। नीतीश जी के पहले कार्यकाल में वित्तीय समंजन में 11412 करोड़ की अनियमितता की सीबीआई जांच का आदेश तो पटना हाइकोर्ट द्वारा 2010 में ही दे दिया गया था। वैसे, श्यामबिहारी सिन्हा सीबीआई के सामने गवाह गुजर चुके हैं कि चारा घोटाले में एक करोड़ समता पार्टी के किसी नीतीश कुमार को दिया गया था। ज़रा पता कीजिए कि वो नीतीश कुमार कौन हैं? मार्च 2012 में आयकर विभाग ने जदयू के कोषाध्यक्ष रहे विनय कुमार सिन्हा के यहां छापेमारी के दौरान 20 बोरों में कई करोड़ रुपए बरामद किए। ये वही विनय कुमार सिन्हा हैं, जिनके तथाकथित आवास में नीतीश कुमार का आशियाना हुआ करता था जब वे मुख्यमंत्री नहीं थे। यह मकान ए. एन. कॉलेज के पास विवेकानंद मार्ग में है। खैर बाद में जदयू के एक और नेता राजीव रंजन प्रसाद के यहां भी आयकर ने छापा मारा था। अकूत धन मिलने की बात हुई थी। मतलब, यहां कोई दूध का धुला नहीं है।

लोकशाही लोकलाज से चलती है, और राजनीति में मैत्री के भी कुछ उसूल होते हैं। पर, नीतीश कुमार मैत्री की मर्यादा तोड़ने के लिए आरंभ से ही कुख्यात रहे हैं। जीवन में कम ही दोस्त हों, पर भरोसेमंद हों! संकट के वक़्त डिच करने वाला न हो! ई.एम. फ़ास्टर ने "व्हाट आइ बिलीव" में कहा था, "दोस्त और देश में किसी एक को धोखा देना पड़े, तो मुझमें देश को धोखा देने का गट्स होना चाहिए"। ( "If I had to choose between betraying my country and betraying my friend, I hope I should have the guts to betray my country".) इसके पीछे यही तर्क था कि जो मैत्री-धर्म न निभा पाये, वो राष्ट्रधर्म व राजधर्म क्या खाक निभाएगा? पिताजी जब विपत्ति में पड़ते हैं, तो एक सूक्ति दुहराते हैं -
श्मशाने य: तिष्ठति स बांधव:। अर्थात्, जो आपके साथ श्मशान घाट में बैठा रहे, मुसीबत में मौजूद रहे, वही सुधीजन है, वही अपना है। मुझे अर्जुन और कृष्ण की नहीं, कर्ण और दुर्योधन की जोड़ी दोस्ती की आदर्श मिसाल लगती है। कर्ण ने कृष्ण को जो जवाब दिया, वह मुझे विह्वल कर देता है :
दें छोड़ भले कभी कृष्ण अर्जुन को
मैं नहीं छोड़ने वाला दुर्योधन को।
इसलिए, मित्रलाभ के सिद्धांत में यह मशवरा है कि जो सामने में मीठा बोले, नीतीश जी की तरह आधी बात मुंह में और आधी बात पेट (अतरी) में रखे, और पीठ पीछे सतुआ-सिदहा बांध के काम में विघ्न डाले; ऐसे मित्र ठीक उस घड़े की भांति होते हैं, जिसका मुंह अमृत से भरा हुआ होता है, पर पूरा पात्र विष से युक्त। ऐसे चिरकुट मित्रों का यथातिशीघ्र त्याग कर देना चाहिए। यही स्वहित, जनहित, समाजहित व देशहित में श्रेयस्कर माना गया है।
परोक्षे कार्यहंतारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनं।
वर्जयेतादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखं।।

आज परिवारवाद वैश्विक परिदृश्य में ही छाया हुआ है, चाहे जुल्फ़िकार अली भुट्टो की बिटिया बेनज़ीर भुट्टो हों, भंडारनायके की पुत्री चंद्रिका कुमारतुंग हों, शेख मुज़ीबुर्रहमान की बेटी शेख हसीना हों, सीनियर बुश के बेटे जॉर्ज बुश हों, फ़िदेल कास्त्रो के भाई राउल कास्त्रो हों, जियाउर्रहमान की बेटी बेगम ख़ालिदा जिया हों, बिल क्लिंटन की बीबी हिलेरी क्लिंटन हों, आदि-इत्यादि। मसला क़ाबिलियत व रुझान का है। हां, यह ज़रूर है कि सियासी परिवार में मौक़े ज़ल्दी मिल जाते हैं, पर राजनीतिक दृष्टि, कौशल व संघर्ष का जज़्बा न हो, तो जनता की अदालत में प्रतिकूल फ़ैसले भी देखने पड़ते हैं। तेजस्वी को इसलिए नहीं फंसाया गया कि वे राजनीतिक परिवार से आने वाले इकलौते व्यक्ति हैं, बल्कि इसलिए भी कि युवाओं के बीच बढ़ती  लोकप्रियता व महिलाओं-बुज़ुर्गों के बीच स्वीकार्यता व बनती साख से ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार घबरा उठे। सत्ता के गलियारे में यह भी चर्चा है कि बहुत-सा मसाला ख़ुद उन्होंने ही विपक्ष को मुहैया कराया था। बहरहाल, बिहार विधानसभा में तेजस्वी के 41 मिनट के भाषण ने यह संकेत दे दिया है कि एक मज़बूत समानांतर नेता का उदय हो चुका है, जिनकी 20 महीने के कार्यकाल में पाक-साफ़ छवि ने स्वाभाविक उम्मीदें जगाई हैं। हां, जब चहुंओर तारीफ़ होने लगे, तो थोड़ी देर ठहर कर मनन करना चाहिए ताकि और भी तार्किकता, पैनापन, निखार व वाग्विदग्धता आए।

बिहार के हालिया घटनाक्रम पर बी.एन. मंडल द्वारा राज्यसभा में 1969 में दिया गया भाषण बरबस याद आ गया -
"जनतंत्र में अगर कोई पार्टी या व्यक्ति यह समझे कि वह ही जबतक शासन में रहेगा, तब तक संसार में उजाला रहेगा, वह गया तो सारे संसार में अंधेरा हो जाएगा, इस ढंग की मनोवृत्ति रखने वाला, चाहे कोई व्यक्ति हो या पार्टी, वह देश को रसातल में पहुंचाएगा। ... हिंदुस्तान में (सत्ता से) चिपके रहने की एक आदत पड़ गयी है, मनोवृत्ति बन गई है। उसी ने देश के वातावरण को विषाक्त कर दिया है।"
दरअसल, नीतीश कुमार येन-केन-प्रकारेण सत्ता में रहने के लिए अपनी अगली  ईगो व अटैंशन सीकिंग सिंड्रोम के चलते किसी भी विचारधारा से हाथ मिलाने को तैयार रहते हैं और मौक़ापरस्ती का अश्लील मुजाहिरा पेश करते हुए विधानसभा के अंदर धर्मनिरपेक्षता शब्द की खिल्ली उड़ाते हैं। वो अपनी सुविधानुसार संघ की भाषा बोलने से बाज नहीं आते। बिहार में जो घिनौना खेल खेला गया, रातोंरात जनता के विश्वास को कुचला गया, वह दरअसल जनादेश का अपहरण मात्र नहीं, बल्कि जनादेश के साथ दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या है। किसी पार्टी विशेष का प्रवक्ता किसी मामले में सफ़ाई किस संवैधानिक दायरे में मांग सकता है? तेजस्वी ने नीतीश कुमार से कहा कि क्या वे कोई ऐसा क़ानून बनाएंगे जिसमें एफआईआर के बाद ही इस्तीफ़ा देना पड़े? अगर ऐसा हुआ, तो सबसे पहले तो हत्या व हत्या के प्रयास के मामले में सबसे पहले नीतीश कुमार को ही त्यागपत्र देना पड़ेगा, और जिस छवि की दुहाई देकर वो हाय मोरल ग्राउंड लेते हैं, उस पर तो उन्हें कोई क़ानून बनने का इंतज़ार किए बगैर ख़ुद ही फ़ौरन इस्तीफ़ा दे देना चाहिए। छविप्रधान सुशासन बाबू सुनील पांडे, मुन्ना शुक्ला और अनंत सिंह के आगे करबद्ध खड़े रहें, तो बहुत अच्छा, तब इनकी छवि घास चरने चली जाती है! 

किसी मामले की उचित एजेंसी से जांच से किसी का विरोध नहीं हो सकता है, पर चयनात्मक व दुराग्रहग्रस्त कार्रवाई एवं मीडिया ट्रायल तो जम्हूरियत की सेहत के लिहाज़ से ठीक नहीं। यदि स्वच्छता अभियान ही चलाना है, तो हो जाए क़ायदे से सभी सांसदों, विधायकों, मंत्रियों व मुख्यमंत्रियों की यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरी जायदादों की जांच। दो दिन में लोकसभा गिर जाएगी, न जाने कितने सूबों की सरकारें हफ़्ते में चली जाएंगी। पर, सेलेक्टिव टारगेटिंग कर नैतिकता का ढोंग रचने वाले दोहरे क़िस्म के लोग इस पर कभी राज़ी नहीं होंगे। बिहार में महागठबंधन की जीत के बाद जेएनयू में लगातार गोष्ठियां हो रही थीं, हमलोग मार्च निकाल रहे थे। उसी दौरान एक परिचर्चा में प्रो. बद्रीनारायण ने जो कहा, उसे नीतीश के सलाहकारों ने भुला दिया, "जनता ने बड़ी उम्मीदों से यह मैंडेट गठबंधन को दिया है, और लालू-नीतीश दोनों के लिए इस विजय को संभाल के रखने की ज़रूरत है"। कुछ साथी मुझसे सवाल करते हैं कि आप लालू के प्रति साफ्ट क्यूं रहते हैं, तो मेरा कहना है कि बात किसी के प्रति नरम रहने या किसी के प्रति भभकने की नहीं है। असल बात किसी बात को पूरे परिप्रेक्ष्य में एक नज़रिए के साथ देखने की है। जेएनयू के लोग तो इतने खोखले व तंगदिल नहीं हुआ करते। जब सारे देश में ही विपक्ष को शंट करने की कवायद चल रही है, तो हम हर उस निर्भीक व मुखर आवाज़ के साथ खड़े होंगे, जिन्हें दबोचने-दबाने की साज़िश चल रही है, जिनके साथ मीडिया चयनित प्रश्नाकुलता दिखाती है, सरकार द्वारा सेलेक्टिव टारगेटिंग के ख़िलाफ़ बोलना वक़्त की मांग है। मैं ऐसे हालात में घनघोर शुद्धतावादी रवैया अपनाने का हिमायती नहीं हूँ, किसी का मूल्यांकन भी निरपेक्ष नहीं हो सकता। किसी ने कोई विसंगति-अनियमितता की है, तो न्यायालय अपना काम करेगा। क़ानून अपना काम करे, इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। मगर क़ानून को गर्दनिया देकर उसके पीछे अपना काम कराने वाले शातिर दिमाग़ जब हरकत में आने लगे, तो समझिए कि क़ानून का चालचलन बिगाड़ा जा रहा है। लक्षण ठीक नहीं लग रहे। क़ानून के सेलेक्टिव इस्तेमाल पर जोनाथन स्विफ़्ट ने बड़ी सटीक टिप्पणी की थी : "Laws are like cobwebs, which may catch small flies, but let wasps and hornets break through.''

मैं कभी-कभी हैरान रह जाता हूँ कि लालू प्रसाद से लोगों को इतनी निजी खुंदक व ईर्ष्या है कि वे तेजस्वी की तारीफ़ करते हुए भी लालू जी को लपेटने का कोई मौक़ा नहीं जाने देते। प्रेम कुमार मणि नेता, प्रतिपक्ष के रूप में तेजस्वी के भाषण की "खुले हृदय उमगि अनुरागा" के सहज भाव से प्रशंसा करते हैं, पर लालू जी के प्रति उनकी आलोचना इस हद तक है कि वे उनके पहनने-ओढ़ने के ढंग पर भी तंज करने से नहीं चूकते। प्रेम जी के पोस्ट का एक अंश यहाँ रख रहा हूँ : "पिछले साल नवंबर में मैंने तेजस्वी को पहली दफा नजदीक से देखा था। मैं लालू जी के यहां एक समारोह का निमंत्रण देने गया था। रात के कोई आठ बज रहे होंगे। मैं बैठके में पहुंचा, तब लालूजी के साथ  राबड़ी जी सहित परिवार के कई सदस्य थे, तेजस्वी भी। लालूजी अस्वस्थ थे। लालूजी से आप शालीनता की उम्मीद कम ही कर सकते हैं। जैसे -तैसे बैठना, अविन्यस्त कपड़ों में रहना उनकी फ़ितरत में शामिल है। लेकिन, तेजस्वी मुझे दीगर दिखे। वह अभिवादन में खड़े हुए, विदा होते समय भी बाहर तक निकले। मुझे महसूस हुआ, यह बालक कुछ अलग है। वही मेरी संक्षिप्त मुलाकात थी, जिसमें मुझसे उनकी कोई बात नहीं हुई थी, लेकिन शालीनता ज़रूर दिखी थी ।"

अब कोई बताए कि अस्वस्थ हालत में कोई प्रैस से आए कपड़े पहनकर बिस्तर पर लेटकर स्वास्थ्य लाभ करता है? घर में लोग कैसे रहते हैं? और, लालू जी तो कम-से-कम इस मामले में किसी दिखावे-ढकोसले में कोई बहुत यक़ीन नहीं करते। उनका अपना शऊर है, अपना अंदाज़ है। वो तो लु़ंगी-बनियान में भी यूं ही सहज रहते हैं, इंटरव्यू भी ऐसे ही देते हैं, यही उनका याकि अधिकांश बिहारी परिवारों में पहनने-ओढ़ने का तौर-तरीक़ा है। गांधीजी को क्या कहिएगा कि आदमी नंगधडंग था, अशालीन था, अशिष्ट था! लालू जी ने तो एक सभा में कुर्ते को खोलकर, बनियान निकालकर कुर्ता पहना, फिर उसके ऊपर बनियान। और, कहा कि अब बिहार में यही होगा। जो नीचे थे, वो अब ऊपर आएंगे, वक़्त का चक्का अब घुमेगा। जब वो यह कहते थे, तो इस अपील का गज़ब का असर होता था।

मुझे आज भी अलौली में  95 में लालू जी की चुनावी सभा में दिया गया नारा याद है - सुअर चराने वालो, गाय चरानो वालो, बकरी चराने वालो, भैंस चराने वालो, भेड़ चराने वाले, मूस के बिल से दाना निकालने वालो, पढ़ना-लिखना सीखो! तब मैं दूसरी जमात में पढ़ता था, बस चुपचाप उनके पीछे पागल भीड़ में मां का हाथ थामे एकटक कभी उन्हें, तो कभी उनके लाल रंग के हैलिकॉप्टर को निहार रहा था। पिताजी सभा की सफलता के लिए कहीं जुटे हुए थे। एक वक़्त वो भी आया, जब राबड़ी जी विषम परिस्थिति में बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, उन्हें दिखाने के लिए मेरे एक शिक्षक ने मुझे गोद में उठा लिया। वो 98 के लोकसभा चुनाव के प्रचार में रौन (अलौली) आई थींं। तब मैं पांचवीं कक्षा का विद्यार्थी था। स्कूल में भाषण देने का साहस नहीं होता था, राबड़ी जी का धीमे-धीमे स्वर में साहसिक भाषण मेरे अंदर के डर को भी कहीं दूर कर रहा था। बाद में जब भागलपुर युनिवर्सिटी आया, तो मैंने अच्छे-अच्छों के पैरों को लड़खड़ाते देखा, बड़े-बड़ों के होठों को थरथराते देखा। राबड़ी देवी की सरकार को कई बार अस्थिर करने की कोशिशें हुईं। इसमें कोई दो मत नहीं कि उस दौर में चंद लोगों की वजह से ज़्यादतियां भी बढ़ रही थीं। आज वो इन्हें छोड़कर जा चुके हैं। पहले कार्यकाल में जो उल्लेखनीय काम हुए, उन्हें और भी आगे और सही दिशा में बढ़ाया जा सकता था। पर, अब तमाम विचलनों-व्यतिक्रमों से सीख लेते हुए उजालों के एक नये सफ़र की ओर नवऊर्जा के साथ सामाजिक न्याय व सांप्रदायिक सौहार्द के स्पष्ट दर्शन में ठोस आर्थिक एजेंडे की रूपरेखा तैयार करते हुए नये नेतृत्व को अविरल-अविचल तीव्रतम गति से आगे बढ़ना होगा।

लालू प्रसाद के कामकाज की शैली के प्रति मेरी अपनी समीक्षा है, और आलोचना व असहमति लोकतंत्र की बुनियादी शर्त हैं। आशा है कि पूर्व में की गई कतिपय प्रशासनिक भूलें नहीं दुहराई जाएंगी, और नई रोशनी समतामूलक समाज की स्थापना हेतु कुछ क़दम और आगे बढ़ाएगी।

#लालूप्रसाद #महिलाआरक्षण #सामाजिकन्याय #कर्पूरीठाकुर  #सांप्रदायिकता #बाबरीमस्जिद #मंडल_कमंडल #रथयात्रा #मीडिया #एनडीटीवीक्लासिक्स #मनोरंजनभारती #अलौलीखगड़िया #मिश्रीसदाकॉलिजरौन #भगवतियादेवी #ब्रह्मानंदपासवान #कैप्टनजयनारायणनिषाद #मुज़फ्फरपुर #जनतादल #91कालोकसभाचुनाव #विद्यासागरनिषाद #कॉमरेडसूर्यनारायणसिंह #कॉमरेडगीतायादव #नीतीशकुमार #शरदयादव #मुलायमसिंह #रामविलासपासवान #जॉर्जफर्णांडिस #मधुलिमये


- जयन्त जिज्ञासु

शोधार्थी, जेएनयू

Monday, 31 July 2017

                                             चेतना व संवेदना के साहित्यकार प्रेमचन्द



आज कलम के सिपाही व हिन्दी-उर्दू उपन्यास के कुशल शिल्पी मुंशी प्रेमचंद की जयन्ती है। एक ऐसे दौर में जब सियासत व संस्थान शनैः-शनैः अपनी स्वायत्तता खोते जा रहे हैं, प्रेमचंद की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। पर, सवाल ये है कि जिसने पूस की रात देखी ही नहीं, वो हलकू का दर्द भला क्या जाने! प्रेमचन्द से मैं पहली बार मिला पिताजी की पीजी की सेलेस्टियल मैकेनिक्स की एक किताब के पहले पन्ने पर, जहां वो अपनी ही ग़ुरबत के तज़ुर्बे व ज़िंदगी के फ़लसफ़े बयां कर रहे थे, "विपत्ति से बढकर अनुभव सिखाने वाला कोई विश्वविद्यालय आज तक नहीं खुला"।
प्रेमचंद कहते हैं कि साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है, उसे अपने असली रूप में निकलते हुए शायद लज्जा आती है, इसलिए वो संकृति की खाल ओढ़कर आती है। आज गाय-भैंस के नाम पर जो देश में क़त्लेआम हो रहा है, उसमें आज से 93 साल पहले 1924 में कही गई उनकी बात बरबस याद आती है, ‌"गोकुशी के मामले में हिन्दुओं ने शुरू से अब तक अन्यायपूर्ण ढंग अख्तियार किया है। हमको अधिकार है कि हम जिस जानवर को चाहें पवित्र समझें, लेकिन यह उम्मीद रखना कि दूसरे धर्म को माननेवाले भी उसे वैसा ही पवित्र समझें, ठीक नहीं है। अगर हिन्दुओं को यह जानना बाकी है कि इंसान किसी जानवर से कहीं ज़्यादा पवित्र प्राणी है, चाहे वह गोपाल की गाय हो या ईसा का गधा, तो उन्होंने अभी सभ्यता की वर्णमाला भी नहीं समझी"।
एक ऐसे निष्ठावान साहित्यकार, जिन्हें कलम का मजदूर भी कहा गया; की वास्तविक पूँजी मानवता के उन्नयन हेतु साहित्यिक हथियार का सदुपयोग करते हुए सामाजिक व राजनीतिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता थी, जिसका वे मृत्यु-शय्या तक निर्वहन करते रहे।। 'पंच परमेश्वर' से लेकर 'कफन' तक एक सरल रेखा खींची जा सकती है, कहीं कोई वक्रता नहीं आयी। जहाँ एक ओर वे कहते हैं, "अपने उत्तरदायित्व का बोध बहुधा हमारे संकुचित विचारों का सुधारक होता है", वहीं दूसरी ओर पाखंड पर करारा प्रहार करते हुए कहते हैं, "ये कैसा रिवाज़ है कि जिसे जीते-जी तन ढकने के लिए चिथड़े नहीं नसीब होते, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए"। उसी पंच परमेश्वर में खाला कहती है, "बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे"? शतरंज के खिलाड़ी में नवाबी विलासिता पर चोट करते हुए लिखते हैं, "ये वो अहिंसा नहीं थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होकर पुष्प की वर्षा करते हैं, बल्कि ये वो अहिंसा थी, जिस पर कायर से कायर लोग भी आंसू बहाते हैं"। प्रेमचंद का युगबोध व सार्वभौमिकतायुक्त विपुल रचना-संसार हमारी चोतना को झकझोरता है, संवेदना को झिंझोरता है। प्रेमचंद 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के समय कहते हैं, "हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो,स्वाधीनता का भाव हो,सौन्दर्य का सार हो,सृजन की आत्मा हो,जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो -- जो हममें गति, संघर्ष, घोर बेचैनी पैदा करे ,सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है"।
जब मैं स्नातक में छोटे-से शहर के बड़े कॉलिज टीएनबी कॉलिज, भागलपुर में पढ़ता था, तो प्रेमचंद जयन्ती पर कॉलिज में सबको कुछ-न-कुछ बोलना होता था। सौ अंक का "राष्ट्रभाषा हिन्दी" नामक पत्र हमें पढ़ाया जाता था। 2009 के प्रेमचंद जयन्ती कार्यक्रम में वनस्पति विज्ञान के एक साथी ने उठकर बोलना शुरू किया, "प्रेमचंद भारतमाता की सच्ची संतान थे। यदि हम उनकी कहानियों को नहीं पढ़ते हैं, तो ये न केवल हमारी संस्कारहीनता है, बल्कि प्रेमचंद जैसे महान सपूत की आत्मा को ठेस पहुँचाने जैसा है। हम कहाँ जा रहे हैं ? अपने वीर साहित्यकार को भूलते जा रहे हैं, जिन्होंने देश को आज़ाद कराने के लिए अद्भुत व अभूतपूर्व अंदाज़ में लिखने के साथ-साथ पाँच बार जेल की सज़ा भोगी। प्रेमचंद ने न जाने कितनी कहानियाँ रच दीं, अनगिनत उपन्यास लिखे...।"
जब वो भलेमानुष कुछ ज़्यादा ही उग्र होकर प्रेमचंद पर अलौकिक जानकारी देते हुए अटकलबाजी पर उतर आये और राष्ट्रवादी तेवर में अपने ज्ञान का भोंडा प्रदर्शन करना शुरु कर दिया, तो हमारे प्राध्यापक प्रो. आलोक चौबे ने बीच में रोका, "भाई प्रेमचंद की आत्मा की परवाह करना आप कृपया छोड़ दें, उन पर आपकी अद्भुत मीमांसा की कोई बाध्यता नहीं है। नहीं बोलना हो, तो बस शालीन श्रोता बनके बैठिये, पर प्रेमचंद के नाम पर इस कदर अफ़वाह न फैलायें। उनकी रचनाओं का एक हिसाब-किताब है।" तो, प्रत्युत्तर में ज्ञानी जी अपनी तीक्ष्ण प्रत्युत्पन्नमति का सहारा लेकर बोले, "सर, अब ये पुनीत मौक़ा एक साल के बाद ही आयेगा, मुझे "पूस की रात" पर अपने शब्दों में कुछ रोशनी डालने दीजिए। उस कहानी में मुझे सबसे ज़्यादा कुत्ते के साथ हलकू का सोना भाया। ऐसा चित्रण सिर्फ़ और सिर्फ़ श्री प्रेमचंद जी कर सकते थे। हिन्दी साहित्य में ऐसा मार्मिक वर्णन किसी और रचयिता के बूते से बाहर की बात है। प्रेमचंद जैसे कवि बार-बार पैदा नहीं होते।" इस पर सर ने कहा, "क्या आपने आज तक प्रेमचंद की कोई कविता पढ़ी है"?
अलज़ेब्रा की किताब बेचकर यदि प्रेमचंद ने तिलिस्म की किताब ख़रीद ली, तो क्या ग़लत किया? जो इंसान ज़िन्दगी की भाषा समझता है, वो गणित की भाषा समझता भी नहीं, और न ही उसकी कोई ज़रूरत है। आज जिस तरह देश के विश्वविद्यालय ढहते जा रहे हैं या कि उन्हें ढाहा जा रहा है, कहीं टैंक लगाने का प्रस्ताव रखा जा रहा है, तो कहीं छात्रों को ख़ुदकुशी करने पर मजबूर, कहीं छात्रसंघ अध्यक्ष समेत अनेकों छात्रों का एडमिशन ब्लॉक कर हास्टल ट्रांसफ़र का फ़रमान सुना दिया जाता है, वहीं न्यायालय में गुहार लगाने पर जवाब मिलता है कि सोशल जस्टिस क्या होता है?; वैसे में प्रेमचन्द की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, जो कहते हैं, "ये विश्वविद्यालय नहीं गुलाम पैदा करने के कारखाने हैं"। वि. वि. को वि. वि. ही रहने दिया जाना चाहिए, उसे युद्ध का मैदान क्यों बनाया जा रहा है, समझ से परे है। छात्रों को टैंक नहीं सीट चाहिए, हास्टल चाहिए, लाइब्रेरी में और रीडिंग हाल चाहिए, समय पर फ़ेलोशिप चाहिए, पर्याप्त संख्या में प्राध्यापक चाहिए। और, उनके लिए ऐसी मांग हेतु विज़न चाहिए, पर वीसी को टैंक पसंद है। हमारे कुलपति 21वीं सदी के बख़्तियार खिलजी हैं। खिलजी ने गौरवशाली नालंदा वि. वि. को जलाकर राख कर दिया था, ये जेएनयू को खाक़ में मिलाने पर तुले हैं। जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिस दूरदर्शिता की ज़रूरत होती है, उससे सर्वथा विमुख लोगों को जानबूझकर कुलपति के पद पर बिठाया जा रहा है।
हमें अपनी नयी नस्ल की बेचैनी व छटपटाहट को समझते हुए अपने नायकों की समृद्ध साहित्यिक व बौद्धिक विरासत से अवगत कराने की आवश्यकता है, ताकि उन्हें भटकाव से रोका जा सके। प्रेमचंद कहते हैं, "चरित्र के भ्रष्ट होने का ख़तरा खुली आबो-हवा में उतना नहीं होता, जितना कि बंद कमरे में"। इसलिए, हम अपने बच्चों को वाजिब व ज़रूरी आज़ादी भी दें व उनकी परवरिश पर भरोसा रखें, नहीं तो सामाजिक सरोकारों के प्रति हमारी सजगता व प्रतिबद्धता भी कुपोषण का शिकार समाज ही निर्मित करेंगी।
जयन्त
31.07

Sunday, 25 June 2017

                                       पिछडों के उन्नायक वी पी सिंह और आरक्षण का अधूरा सफ़र









आज आरक्षण के प्रणेता व उपेक्षितों के उन्नायक पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (25 जून 1931 - नवंबर 2008) का 86वां जन्मदिन है, जिन्होंने मंडल कमीशन के थोड़े हिस्से को लागू करते हुए पिछड़ों के लिए सरकारी नौकरियों में 27 % आरक्षण की घोषणा की। 392 पृष्ठ की मंडल कमीशन की रिपोर्ट देश को सामाजिक-आर्थिक​ विषमता से निबटने का एक तरह से मुकम्मल दर्शन देती है जिसे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद बी.पी. मंडल ने अपने साथियों के साथ बड़ी लगन से तैयार किया था। 20 दिसंबर 1978 को प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अनुच्छेद 340 के तहत नए पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा सदन में की। आयोग की विग्यप्ति 1 जनवरी, 1979 को जारी की गई, जिसकी रिपोर्ट आयोग ने 31 दिसंबर 1980 को दी जिसे  राष्ट्रपति नेे अनुमोदित किया। 30 अप्रैल 1982 में इसे सदन के पटल पर रखा गया, जो 10 वर्ष तक फिर ठंडे बस्ते में रहा। वी.पी. सिंह की सरकार ने 7 अगस्त 1990 को सरकारी नौकरियों में पिछड़ों के लिए 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा की।



वर्षों धूल फांकने के बाद मंडल कमीशन की रिपोर्ट पर शरद यादव, रामविलास पासवान, जार्ज फर्नांडिस, मधु दंडवते, लालू प्रसाद, चौधरी अजीत सिंह, आदि नेताओं द्वारा सदन के अंदर लगातार धारदार बहस और सड़क पर सतत संघर्ष के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री व पिछड़ों के उन्नायक श्री वी पी सिंह ने अपनी जातीय सीमा  खारिज़ करते हुए, बुद्ध की परम्परा का निर्वहन करते हुए इस देश के अंदर लगातार बढ़ती जा रही विषमता की खाई को पाटने हेतु  कमीशन की रपट को लागू करने का साहसिक, ऐतिहासिक व सराहनीय क़दम उठाकर यह स्पष्ट संदेश दिया कि इच्छाशक्ति हो व नीयत में कोई खोट न हो, तो मिली-जुली सरकार भी क़ुर्बानी की क़ीमत पर बड़े फ़ैसले ले सकती है।



वी.पी. सिंह ने जिस मंत्रालय के ज़िम्मे कमीशन की सिफारिश को अंतिम रूप देने का काम सौंपा था, उसकी लेटलतीफी देखते हुए उन्होंने उसे रामविलास पासवान के श्रम व कल्याण मंत्रालय में डाल दिया। उस समय यह मंत्रालय काफी बड़ा हुआ करता था और अल्पसंख्यक मामले, आदिवासी मामले, सामाजिक न्याय व अधिकारिता, श्रम, कल्याण सहित आज के छह मंत्रालयों को मिलाकर एक ही मंत्रालय होता था। श्री पासवान की स्वीकारोक्ति है कि तत्कालीन सचिव पी.एस. कृष्णन, जो दक्षिण भारतीय ब्राह्मण थे; ने इतने मनोयोग से प्रमुदित होकर काम किया कि दो महीने के अंदर मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों को अंतिम रूप दे दिया गया।



दुनिया में आरक्षण से बढ़कर ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनी, जिसने इतने कम समय में अहिंसक क्रान्ति के ज़रिये समाज के इतने बड़े तबके को गौरवपूर्ण व गरिमापूर्ण जीवन जीने में इससे ज़्यादा लाभ पहुँचायी हो। सरकार की क़ुर्बानी देकर आने वाली पीढ़ियों की परवाह करने वाले जननेता वी.पी. सिंह जैसी शख़्सियतों के बारे में ही राजनीतिक चिंतक जे. एफ. क्लार्क कह गये : "एक नेता अगले चुनाव के बारे में सोचता है, जबकि एक राजनेता अगली पीढ़ी के बारे में।"



वी पी सिंह ने साबित किया कि यदि दूरदृष्टि, सत्यनिष्ठा व इंटेग्रिटी हो, तो अल्पमत की गठबंधन सरकार भी समाजहित व देशहित में ऐतिहासिक व ज़रूरी फ़ैसले ले सकती है। जो काम उनके पहले के प्रधानमंत्री अपने पाँच साल के कार्यालय में भी नहीं कर पाये, उसे उन्होंने साल भर के अंदर कर दिखाया। उस वक़्त सत्ता व समानांतर सत्ता का सुख भोगने को आदी हो चुके जातिवादी नेताओं ने परिवर्तन की जनाकांक्षाओं को नकारते हुए उल्टे मंडल कमीशन को लागू कराने की मुहिम में जुटे नेताओं को जातिवादी कहना शुरू कर दिया। मंडल आंदोलन के समय पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने कहा था, "जिस तरह से देश की आजादी के पूर्व मुस्लिम लीग और जिन्ना ने साम्प्रदायिकता  फैलाया उसी तरह वी. पी सिंह ने जातिवाद फैलाया। दोनों समाज के लिए जानलेवा है।" वामपंथी दलों के एक धड़े ने इसे 'मंदिर-मंडल फ्रेंज़ी' कहकर मंडल और कमंडल दोनों को ही एक ही तराज़ू पर तोल दिया। पर, भाकपा-माकपा ने इस लड़ाई को अपना नैतिक समर्थन दिया था, अपनी सामर्थ्य के मुताबिक़ ऊर्जा जोड़ी थी। हालांकि, कुछ 'अगर-मगर' पर कभी अलग से विस्तारपूर्वक चर्चा करने की ज़रूरत है।


तब तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने गरजते हुए कहा था, "चाहे जमीन आसमान में लटक जाए, चाहे आसमान जमीन पर गिर जाए, मगर मंडल कमीशन लागू होकर रहेगा। इसपर कोई समझौता नहीं होगा"। कपड़ा मंत्री शरद यादव, श्रम व रोज़गार मंत्री रामविलास पासवान, उद्योग मंत्री चौधरी अजीत सिंह, रेल मंत्री जार्ज फर्णांडिस, गृह राज्यमंत्री सुबोधकांत सहाय, सबने एक सुर से जातिवादियों और कमंडलधारियों को निशाने पर लिया।



रामविलास पासवान ने कहा, "वी पी सिंह ने इतिहास बदल दिया है। यह 90 % शोषितों और शेष 10 % लोगों के बीच की लड़ाई है। जगजीवन राम का ख़ुशामदी दौर बीत चुका है और रामविलास पासवान का उग्र प्रतिरोधी ज़माना सामने है"।


सुबोधकांत सहाय ने कहा, "जो कोई भी सामाजिक न्याय के रथ का विरोध करेगा, कुचल कर समाप्त कर दिया जाएगा"।


अजीत सिंह ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा, "सिर्फ़ चंद अख़बार, कुछ राजनीतिक नेता और  कुछ अंग्रेज़ीदां लोग मंडल कमीशन का विरोध कर रहे हैं जो कहते हैं कि मंडल मेरिट को फिनिश कर देगा। आपको मंडल की सिफ़ारिशों के लिए क़ुर्बानी तक के लिए तैयार रहना चाहिए"।



 90 के दशक में पटना के गाँधी मैदान के रैला में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद जनसैलाब के बीच जोशोखरोश के साथ वी पी सिंह का अभिनंदन कर रहे थे :
राजा नहीं फ़कीर है
भारत की तक़दीर है।


इस ऐतिहासिक सद्भावना रैली में वी पी सिंह ने कालजयी भाषण दिया था, "हमने तो आरक्षण लागू कर दिया। अब, वंचित-शोषित तबका तदबीर से अपनी तक़दीर बदल डाले, या अपने भाग्य को कोसे।" उन्होंने कहा, "बीए और एमए के पीछे भागने की बजाय युवाओं को ग़रीबों के दु:ख-दर्द का अध्ययन करना चाहिए। लोकसभा और राज्यसभा की 40 फ़ीसदी सीटें ग़रीबों के लिए आरक्षित कर देनी चाहिए। विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के पास जमा गैस और खाद एजेंसियों को ग़रीबों के बीच बांट देना चाहिए।" आगे वो बेफ़िक्र होकर कहते हैं, "मैं जानता हूँ कि मुझे प्रधानमंत्री के पद से हटाया जा सकता है, मेरी सरकार  गिरायी जा सकती है। वे मुझे दिल्ली से हटा सकते हैं, मगर ग़रीबों के दरवाजे पर से नहीं।"



ज़ाहिर है कि पसमांदा समाज ने अपनी तक़दीर ख़ुद गढ़ना गवारा किया, और नतीजे सामने हैं। हाँ, सामाजिक बराबरी व स्वीकार्यता के लिए अभी और लम्बी तथा  दुश्वार राहें तय करनी हैं, बहुत से रास्ते हमवार करने हैं। 




पर अफ़सोस कि मंडल आयोग को सिर्फ़ आरक्षण तक महदूद कर दिया गया, जबकि बी पी मंडल ने भूमिसुधार को भी ग़ैरबराबरी ख़त्म करने की दिशा में महत्वपूर्ण कारक माना था। स्वाधीनता के बाद भी संपत्ति का बंटवारा तो हुआ नहीं। जो ग़रीब, उपेक्षित, वंचित थे, वो आज़ादी के बाद भी ग़रीब और शोषित  ही रहे। उनकी ज़िंदगी में कोई आमूलचूल बदलाव नहीं आया। अभी तो आरक्षण ठीक से लागू भी नहीं हुआ है, और इसे समाप्त करने की बात अभिजात्य वर्ग की तरफ से उठने लगी है।




मौजूदा नस्ल को हर वक़्त सचेत रहने की ज़रूरत है कि लोकतंत्र को कभी भी फॉर ग्रांटिड नहीं लिया जा सकता। हर दिन यह अपने नागरिकों से सतर्कता व प्रतिबद्धता की अपेक्षा रखती है। यह खु़द के प्रति छलावा होगा कि जम्हूरियत अपनी हिफ़ाज़त ख़ुद कर लेगी। लोकतंत्र की आयु के लिहाज़ से 70 साल कोई दीर्घ अवधि नहीं होती। हिन्दुस्तानी जमहूरियत अभी किशोरावस्था से निकली ही है। पर, इतनी कम उम्र में इसने इतने सारे रोग पाल लिए हैं कि बड़ी चिंता होती है। कुपोषण के शिकार दुनिया के सबसे बड़े व कमोबेश क़ामयाब, गाँधी, अम्बेडकर, जयप्रकाश, लोहिया, फूले, सावित्री, झलकारी, पेरियार, सहजानंद, आदि सियासी शख़्सियतों की आजीवन पूँजी व चिरटिकाऊ होने के सदिच्छाओं से अनुप्राणित इस बाहर से बुलन्द व अंदर से खोखले होते जा रहे लोकतंत्र को समय रहते इलाज़ की दरकार है।




विश्व की किसी भी कल्याणकारी योजना से इतने कम समय में इससे बड़ी तादाद व जमात में लोगों के जीवन-स्तर में शायद ही असरदार व काबिले-ज़िक्र तब्दीली आयी हो। अमेरिका में भी दबे-कुचले समुदाय के लोगों की ज़िन्दगी संवारने व उन्हें मुख्यधारा में लाने हेतु अफरमेटिव एक्शन का प्रावधान है और वहाँ इसके प्रतिरोध में कभी कुतर्क नहीं गढ़े जाते। मुझे अमेरिकी कवयित्री एला व्हीलर विलकॉक्स याद आती हैं :
In India’s land one listens aghast
To the people who scream and bawl;
For each caste yells at a lower caste,
And the Britisher yells at them all.

(“In India’s Dreamy Land”)

अर्थात ,
भारतवर्ष में लोग बात सुनते 
उन्हीं की जो चीखते व चिल्लाते ;
क्योंकि हर जाति दुर्बलतर जाति पर धौंस जमाती, 
और, ब्रिटिशजन उन सब को हिकारत भरी नज़र से देखते.
(आर्यावर्त की स्वप्निल ज़मीं पर )




आरक्षण आरक्षण की ज़रूरत समाप्त करने के लिए लागू हुआ था। पर, क्या कीजै कि बड़ी सूक्ष्मता से इस देश में आरक्षण को डायल्युट किया जा रहा है और मानसिकता वही है कि हम तुम्हें सिस्टम में नहीं आने देंगे। पिछडों के उभार के प्रति ये असहिष्णुता दूरदर्शिता के लिहाज़ से ठीक नहीं है। केंद्र सरकार का डेटा है कि आज भी केंद्र सरकार की नौकरियों में वही 12 फ़ीसदी के आसपास पिछड़े हैं, जो कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के पहले भी अमूमन इतनी ही संख्या में थे। आख़िर कौन शेष 15 % आरक्षित सीटों पर कुंडली मार कर इतने दिनों से बैठा हुआ है ? यही रवैया रहा तो लिख कर ले लीजिए कि इस मुल्क से क़यामत तक आरक्षण समाप्त नहीं हो सकता।




जेएनयू जैसी जगह में भी आप पीएच.डी तो कर लेंगे, पर अध्यापन हेतु साक्षात्कार के बाद “नोट फाउंड सुटेबल” करार दे दिये जाएँगे। पर, ये भी थोड़ा संतोष देता था कि अब आप अपनी जीवटता, लगन और अपने जुझारूपन व अध्यवसाय से पढ़ ले पा रहे थे। ये सदियों के विचित्र समाज की कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी। मगर, इस साल से तो युजीसी ग़ज़ट की आड़ में उपेक्षितों-शोषितों की कोई खेप निकट भविष्य में शोध के ज़रिए अपने समाज के क्रानिक बीमारियों को समझने व दूर करने के लिए विश्वविद्यालय की देहरी लांघ ही नहीं पाएंगे। हर जगह, हर छोटे-बड़े विभाग बंद कर दिए गए हैं। जेएनयू में पिछले साल एम.फिल.-पी.एचडी. क इंटीग्रेटेड प्रोग्राम में हुए एडमिशन की तुलना में 83% की भारी सीट कट के साथ मात्र 102 सीटों पर इस साल दाखिले हो रहे हैं। अर्जुन सिंह ने 2006 में उच्च शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर मंडल को जो विस्तार दिया था,  उसमें पलीता लगा दिया गया है। अगर बी. पी. मंडल, वी. पी. सिंह अर्जुन सिंह एवं उस वक़्त के संघर्ष के अपने जांबाज योद्धाओं  को  सच्चे अर्थों में हम याद करना व रखना चाहते हैं, तो हमें निकलना ही होगा सड़कों पर, तेज़ करने होंगे व बदलने भी पड़ेंगे प्रतिरोध के अपने औजार।





जो लोग ज़माने की ठोकरों में पलते हैं
एक दिन वही​ ज़माने का रुख़ बदलते हैं।




जो लोग रात-दिन आरक्षण के ख़िलाफ़ आग उगलते हों, जिन्हें इस अखंड देश के पाखंड से भरे खंड-खंड समाज की रत्ती भर समझ न हो, उनसे मगजमारी करके अपना बेशक़ीमती वक़्त क्यों ज़ाया किया जाये ? मैंने ऐसे लोगों की सोची-समझी, शातिराना बेवकूफ़ी व धूर्तता की अनदेखी करने का फ़ैसला किया है। न वो ख़ुद को बदलने को तैयार हैं, न ही हो रहे बदलाव को क़ुबूल करने को राज़ी। इसलिए, अब जो भी समय पढ़ाई के बाद बचेगा, उसे वंचित समाज की जागरूकता, बेहतरी, उसकी शिक्षा व उसके उन्नयन के लिए लगाऊँगा। यही मुझे असली सुकून व संतोष देगा। एक बार पुन: आरक्षण लागू करने वाले सच्चे, साहसी व दूरदर्शी राजनेता वी. पी. सिंह को सलाम !

- जयन्त जिज्ञासु
(शोधार्थी, जेएनयू)
इ-मेल : jigyasu.jayant@gmail.com

तस्वीर : सौजन्य से, गूगल, गेटी इमेजेज़ & इंडिया टुडे।

Sunday, 11 June 2017

सांप्रदायिकता से जूझने वाला सामाजिक न्याय का योद्धा






पत्थर तोड़ने वाली भगवतिया देवी, जयनारायण निषाद, ब्रह्मानंद पासवान, आदि को संसद भेजने वाले, खगड़िया स्टेशन पर बीड़ी बनाने वाले विद्यासागर निषाद को मंत्री बनाने वाले एवं बिना डिगे सांप्रदायिकता से जूझने का माद्दा रखने वाले लोकप्रिय, मक़बूल व विवादास्पद नेता लालू जी को 70वें जन्मदिन की बधाई व उनके आरोग्यमय जीवन की सद्कामनाएं !


यह तस्वीर है 90-91 की। पहली तस्वीर है 91 के लोकसभा चुनाव प्रचार की, जिसमें हैं बलिया के तत्कालीन सांसद सूरज दा, चौथम के विधायक व संप्रति भाकपा के प्रांत सचिव कामरेड सत्यनारायण सिंह, पिताजी व अन्य। दूसरी तस्वीर है 90 की, जिसमें हैं जनता के बीच मक़बूल व मशहूर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद, माकपा के समर्पित नेता गीता यादव, अभिनंदन भाषण करते पिताजी व अन्य। (खगड़िया के तत्कालीन डीएम सुधीर त्रिपाठी जी कुछ कहते हैं तो पापा पीछे मुड़कर देखते हैं।) तब जनता दल व बड़े वामपंथी धड़े का गठबंधन था। देहात के फूस के घर में बारिश की बूंदों के चलते लगभग ख़राब हो चुके फटे-पुराने एलबम में कहीं दुबकी पड़ी इन दो तस्वीरों को देखते हुए बड़ा हुआ, और बचपन से लालू प्रसाद की जनराजनीति व लोकसंवाद की अद्भुत कला को समझने की कोशिश कर रहा हूँ। वे सूचना व प्रसारण मंत्रालय की स्वायत्त इकाई व जनसंचार का मक्का कहे जाने वाले एशिया के सबसे बड़े संस्थान के रूुप में चर्चित भारतीय जनसंचार संस्थान कभी नहीं गए, पर किसी भी मंझे हुए कम्युनिकेटर से कहीं ज़्यादा कुशलता व दक्षता के साथ अपना असर छोड़ते हुए जनसामान्य से संवाद स्थापित करने की कला में छात्रजीवन से ही पारंगत नेता हैं।





आरएसएस की उन्मादी, सांप्रदायिक, विभाजनकारी व राष्ट्रभंजक राजनीति करने वालों के खिलाफ खड़ी होनेवाली लोकतांत्रिक शक्तियों की भूमिका व हमारे संघर्ष में उनके अंशदान को हम नम्रता से स्वीकार करते हैं। जिनके पैर शूद्रों और दलितों को ठोकर मारते थे, उनके दर्प को तोड़ने का काम लालू प्रसाद ने किया।


मुख्यमंत्री बनने के बाद 90 में अलौली में लालू जी का पहला कार्यक्रम था मिश्री सदा कालिज में। पिताजी उसी कालिज में गणित के व्याख्याता थे। कर्पूरी जी को याद करते हुए लालू जी ने कहा, "जब कर्पूरी जी आरक्षण की बात करते थे, तो लोग उन्हें मां-बहन-बेटी की गाली देते थे। और, जब मैं रेज़रवेशन की बात करता हूं, तो लोग गाली देने के पहले अगल-बगल देख लेते हैं कि कहीं कोई पिछड़ा-दलित-आदिवासी सुन तो नहीं रहा है। ज़ादे भचर-भचर किये तो कुटैबो करेंगे। ये बदलाव इसलिए संभव हुआ कि कर्पूरी जी ने जो ताक़त हमको दी, उस पर आप सबने भरोसा किया है।"


लगातार पाँच चुनावों (फरवरी 05 व अक्टूबर 05 का विधानसभा चुनाव, 09 का लोस चुनाव, 10 का विस चुनाव एवं 14 का लोस चुनाव) में करारी हार के बाद आदमी सत्ता के गलियारे में अलबला के न जाने किस-किस से हाथ मिलाने को तैयार हो जाता है, मगर लालू प्रसाद ने भाजपा के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। इसीलिए, वे जॉर्ज फर्णांडिस, शरद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार से कहीं ज़्यादा बड़े नेता के रूप में अक़्लियतों के बीच स्थापित हैं। ऐसा नहीं कि जॉर्ज-शरद-रामविलास-मुलायम की पहले की लड़ाई को लोग भूल गये हैं या उसकी क़द्र नहीं है। लेकिन, सामाजिक न्याय साम्प्रदायिक सौहार्द के बगैर अधूरा रहेगा। लालू प्रसाद के प्रति मेरी अपनी आलोचनाएँ हैं, पर सियासी मूल्यांकन सदैव निरपेक्ष नहीं हो सकता। देश की मौजूदा परिस्थिति में मेरी यही मान्यता है। यह भी सच है कि जम्हूरियत में चुनाव ही सबकुछ नहीं है, सामाजिक-सांस्कृतिक जागृति के लिए उत्तर भारत में व्यापक स्तर पर कोई पहल कम ही हुई है।


कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार-सा है।
(कैफ़ी आज़मी)


बाक़ी बातें एक तरफ, लालू प्रसाद का सेक्युलर क्रेडेंशियल एक तरफ। लालू जी की इसी धर्मनिरपेक्ष छवि का क़ायल रहा हूं। 89 के दंगे के बाद विषाक्त हो चुके माहौल में 90 में सत्ता संभालने के बाद बिहार में कोई बड़ा दंगा नहीं होने दिया। मौजूदा हालात में जहां धर्मनिरपेक्ष देश को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने की जबरन कोशिश की जा रही है, वैसे में सामाजिक फ़ासीवाद से जूझने का जीवट रखने वाले नेता कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते। बिहार में किसी को अपना कार्यकाल पूरा करने नहीं दिया जाता था, चाहे वो दारोगा राय हों, भोला पासवान शास्त्री हों, अब्दुल गफ़ूर हों या कोई और।


कर्पूरी ठाकुर पर घोटाले का कहीं कोई आरोप नहीं था, पर दो-दो बार उनकी सरकार नहीं चलने दी गई। 70 के उत्तरार्ध में सिर्फ़ सिंचाई विभाग में वे 17000 वैकेंसिज़ लेकर आते हैं, और जनसंघी पृष्ठभूमि के लोग रामसुंदर दास को आगे करके एक हफ़्ते के अंदर सरकार गिरवा देते हैं। जहां एक साथ इतने बड़े पैमाने पर फेयर तरीक़े से ओपन रिक्रुटमेंट हो, वहां मास्टर रोल पर सजातीय लोगों को बहाल कर बाद में उन्हें नियमित कर देने की लत से लाचार जातिवादी लोग इस पहल को क्योंकर पचाने लगे!


श्री कृष्ण सिंह के बाद अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने वाले लालू प्रसाद बिहार के पहले मुख्यमंत्री हैं। हां, अंतर्विरोधों से दो-चार होना भारतीय लोकतंत्र की नियति बनती जा रही है, जो कचोटता है। जिसने संचय-संग्रह की प्रवृत्ति से पार पा लिया, वह संसदीय राजनीतिक इतिहास में कर्पूरी ठाकुर-मधु लिमये की भांति अमर हो जाएगा। ऐसे त्याग की भावना के साथ  जनसेवा करने वाले जनता के नुमाइंदे विरले आते हैं। पर, मैं आश्वस्त हूं कि आज भी भले लोग हैं जो ओछी महत्वाकांक्षाओं से परे समाज में परिवर्तन के पहिए को घुमाना चाहते हैं ताकि व्यक्ति की गरिमा खंडित न हो, सब लोगों के लिए प्रतिष्ठापूर्ण जीवन सुनिश्चित हो सके।


नीतीश जी ने कहा है कि लालू जी का जीवन संघर्ष से भरा है। वे जिस तरह के बैकग्राउंड से निकलकर आए हैं और जिस ऊंचाई को हासिल किया है, वह बहुत बड़ी बात है।


90 के दौर में जब आडवाणी जी रथयात्रा पर निकले थे और बाबरी को ढहाने चले थे, तो लालू प्रसाद ने उन्हें समस्तीपुर में नाथ दिया था। सभी राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी में पटना की एक विशाल  रैली में वे कहते हैं, "चाहे सरकार रहे कि राज चला जाए, हम अपने राज्य में दंगा-फसाद को फैलने नहीं देंगे। जहां बावेला खड़ा करने की कोशिश हुई, तो सख्ती से निपटा जाएगा। 24 घंटे नज़र रखे हुए हूँ। जितनी एक प्रधानमंत्री की जान की क़ीमत है, उतनी ही एक आम इंसान की जान की क़ीमत है। जब इंसान ही नहीं रहेगा, तो मंदिर में घंटी कौन बजाएगा, जब इंसान ही नहीं रहेगा तो मस्जिद में इबादत देने कौन जाएगा ?"


लालू प्रसाद अपने अंदाज़ में मीडिया को भी अपनी साख बचाए व बनाए रखने की सीख देते हैं। 'राष्ट्रीय पत्रकारिता' के हवनात्मक पहलू के उभार के दौर में बतौरे-ख़ास एक नज़र :

मनोरंजन भारती : कुछ ज्ञानवर्धन कीजिए सर हमारा।

(Please, enlighten me on your ideals in life.)

लालू प्रसाद : ज्ञानवर्धने है, हरा-हरा सब्जी खाओ, दूध पियो, और सच्चा ख़बर छापा करो।

(Eat green vegetables, drink milk and tell the truth in your reports.)

(सौजन्य से : NDTVClassics)


उसी चारा घोटाले में फसने पर जगन्नाथ मिश्रा जगन्नाथ बाबू बने रहते हैं, पर लालू प्रसाद ललुआ हो जाते हैं। लालू प्रसाद से ललुआ तक की फिसलन भरी यात्रा में लालू प्रसाद की सारथी रही मीडिया का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तो करना पड़ेगा न...

एक बार श्री चंद्रशेखर ने सदन में कहा था, जो आज सत्ता पक्ष के लोगों को भूलना नहीं चाहिए, "एक बात हम याद रखें कि हम इतिहास के आख़िरी आदमी नहीं हैं। हम असफल हो जायेंगे, यह देश असफल नहीं हो सकता। देश ज़िंदा रहेगा, इस देश को दुनिया की कोई ताक़त तबाह नहीं कर सकती। ये असीम शक्ति जनता की, हमारी शक्ति है, और उस शक्ति को हम जगा सकें, तो ये सदन अपने कर्त्तव्य का पालन करेगा।"

जब अधिकांश लोग सेना बुला कर लालू प्रसाद को गिरफ़्तार करने पर 'भ्रष्टाचार' की ढाल बनाकर चुप्पी ओढ़े हुए थे और नीतीश जी जैसे लोग उल्टे इस क़दम के पक्ष में सदन में हंगामा कर रहे थे, तो चंद्रशेखर ने लालू प्रसाद मामले में सीबीआइ द्वारा अपने अधिकार का अतिक्रमण करने, न्यायपालिका को अपने हाथ में लेने व व्यवस्थापिका को अंडरएस्टिमेट करने के अक्षम्य अपराध पर लोकसभा में बहस करते हुए जो कहा था, उसे आज याद किये जाने की ज़रूरत है -

"लालू प्रसाद ने जब ख़ुद ही कहा कि आत्मसमर्पण कर देंगे, तो 24 घंटे में ऐसा कौन-सा पहाड़ टूटा जा रहा था कि सेना बुलाई गई ? ऐसा वातावरण बनाया गया मानो राष्ट्र का सारा काम बस इसी एक मुद्दे पर ठप पड़ा हुआ हो। लालू कोई देश छोड़कर नहीं जा रहे थे। मुझ पर आरोप लगे कि लालू को मैं संरक्षण दे रहा हूँ। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मेरी दिलचस्पी किसी व्यक्ति विशेष में नहीं है, ऐसा करके मैं इस संसदीय संस्कृति की मर्यादा का संरक्षण कर रहा हूँ। जब तक कोई अपराधी सिद्ध नहीं हो जाता, उसे अपराधी कहकर मैं उसे अपमानित और ख़ुद को कलंकित नहीं कर सकता। यह संसदीय परंपरा के विपरीत है, मानव-मर्यादा के अनुकूल नहीं है।

किसी के चरित्र को गिरा देना आसान है, किसी के व्यक्तित्व को तोड़ देना आसान है। लालू को मिटा सकते हो, मुलायम सिंह को गिरा सकते हो, किसी को हटा सकते हो जनता की नज़र से, लेकिन हममें और आपमें सामर्थ्य नहीं है कि एक दूसरा लालू प्रसाद या दूसरा मुलायम बना दें। भ्रष्टाचार मिटना चाहिए, मगर भ्रष्टाचार केवल पैसे का लेन-देन नहीं है। एक शब्द है हिंदी में जिसे सत्यनिष्ठा कहा जाता है, अगर सत्यनिष्ठा (इंटेग्रिटी) नहीं है, तो सरकार नहीं चलायी जा सकती। और, सत्यनिष्ठा का पहला प्रमाण है कि जो जिस पद पर है, उस पद की ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए, उत्तरदायित्व को निभाने के लिए आत्मनियंत्रण रखे, कम-से-कम अपनी वाणी पर संयम रखें। ये नहीं हुआ अध्यक्ष महोदय। 

सीबीआइ अपनी सीमा से बाहर गयी है, ये भी बात सही है कि उस समय सेना के लोगों ने, अधिकारियों ने उसकी माँग को मानना अस्वीकार कर दिया था। ये भी जो कहा गया है कि पटना हाइ कोर्ट ने उसको निर्देश दिया था कि सेना बुलायी जाये; वो बुला सकते हैं, इसको भी सेना के लोगों ने अस्वीकार किया था। ऐसी परिस्थिति में ये स्पष्ट था कि सीबीआइ के एक व्यक्ति, उन्होंने अपने अधिकार का अतिक्रमण किया था। मैं नहीं जानता कि कलकत्ता हाइ कोर्ट का क्या निर्णय है। उस बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहता। लेकिन ये प्रश्न ज़्यादा मौलिक है जिसका ज़िक्र अभी सोमनाथ चटर्जी ने किया। अगर पुलिस के लोग सेना बुलाने का काम करने लगेंगे, तो इस देश का सारा ढाँचा ही टूट जायेगा।

सेना बुलाने के बहुत-से तरीके हैं। वहाँ पर अगर मान लीजिए मुख्यमंत्री नहीं बुला रहे थे, वहाँ पर राज्यपाल जी हैं, यहाँ पर रक्षा मंत्री जी हैं, होम मिनिस्ट्री थी, बहुत-से साधन थे, जिनके ज़रिये उस काम को किया जा सकता था। लेकिन किसी पुलिस अधिकारी का सीधे सेना के पास पहुँचना एक अक्षम्य अपराध है। मैं नहीं जानता किस आधार पर कलकत्ता हाइ कोर्ट ने कहा है कि उनको इस बात के लिए सजा नहीं मिलनी चाहिए। मैं अध्यक्ष महोदय आपसे निवेदन करूँगा और आपके ज़रिये इस सरकार से निवेदन करूँगा कि कुछ लोगों के प्रति हमारी जो भी भावना हो, उस भावना को देखते हुए हम संविधान पर कुठाराघात न होने दें, और सभी अधिकारियों को व सभी लोगों को, चाहे वो राजनीतिक नेता हों, चाहे वो अधिकारी हों; उन्हें संविधान के अंदर काम करने के लिए बाध्य करें।

और, अगर कोई विकृति आयी है, तो उसके लिए उच्चतम न्यायालय का निर्णय लेना आवश्यक है, और मुझे विश्वास है कि हमारे मंत्री, हमारे मित्र श्री खुराना साहेब इस संबंध में वो ज़रा छोटी बातों से ऊपर उठकर के एक मौलिक सवाल के ऊपर बात करेंगे।"


आख़िर क्या वजह है कि घनघोर शुद्धतावादियों की निर्मम-निष्ठुर आलोचनाओं का दायरा लालू-मुलायम-नीतीश के चंदन-टीका करने से नवब्राह्मणवाद की उत्पत्ति तक ही सीमित रहता है ?


महिला आरक्षण बिल पर कोटे के अंदर कोटे की लड़ाई जिस तरह लालू प्रसाद ने शरद जी व मुलायम जी के साथ सदन के अंदर लड़ी, वो क़ाबिले-तारीफ़ है। आख़िर को वंचित-शोषित-पसमांदा समाज की महिलाएं भी क्यों नहीं सदन का मुंह देखें ? इतना-सा बारीक फ़र्क अगर समझ में नहीं आता, और संपूर्ण आधी आबादी की नुमाइंदगी के लिए संज़ीदे सियासतदां की पहल व जिद को कोई महिला विरोधी रुख करार देता है, तो उनकी मंशा सहज समझ में आती है। वे बस विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं को सदन में देखना चाहते हैं, ग़रीब-गुरबे, हाशिये पर धकेली गई, दोहरे शोषण की मार झेल रही खवातीन उनकी चिंता, चिंतन व विमर्श के केंद्र में नहीं हैं।

परिवार के आग्रह और पुत्रमोह व भ्रातृप्रेम में रामविलास पासवान अपना धड़ा बदलें, तो उसूल से भटका हुआ, पदलोलुप, अवसरवादी और न जाने क्या-क्या हो जाते हैं, वहीं कर्नाटक के मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र के राज्यपाल व देश के विदेश मंत्री रहे एस. एम. कृष्णा, दिग्गज कांग्रेसी नेता व युपी के मुख्यमंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा की पुत्री व युपी कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं रीता बहुगुणा जोशी, और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे उनके पुत्र विजय बहुगुणा कांग्रेस से सीधे भाजपा की गोद में जाकर बैठ जाते हैं, तो उस पर कोई हंगामा नहीं बड़पता, कोई चर्चा नहीं होती, उन्हें मीडिया की मंडी में खलनायक सिद्ध करने के लिए सांध्यकालीन बहस में टीवी के पर्दे हिलने नहीं लगते; उल्टे वो महान बागी व दूरदर्शी नेता कहलाते हैं। आज परिवारवाद वैश्विक परिदृश्य में ही छाया हुआ है, चाहे जुल्फ़िकार अली भुट्टो की बिटिया बेनज़ीर भुट्टो हों, भंडारनायके की पुत्री चंद्रिका कुमारतुंग हों, शेख मुज़ीबुर्रहमान की बेटी शेख हसीना हों, सीनियर बुश के बेटे जॉर्ज बुश हों, फ़िदेल कास्त्रो के भाई राउल कास्त्रो हों, जियाउर्रहमान की बेटी बेगम ख़ालिदा जिया हों, बिल क्लिंटन की बीबी हिलेरी क्लिंटन हों, आदि-इत्यादि। मसला क़ाबिलियत व रुझान का है। हां, यह ज़रूर है कि सियासी परिवार में मौक़े ज़ल्दी मिल जाते हैं, पर राजनीतिक दृष्टि, कौशल व संघर्ष का जज़्बा न हो, तो जनता की अदालत में प्रतिकूल फ़ैसले भी देखने पड़ते हैं। तेजस्वी को इसलिए नहीं फंसाया गया कि वे राजनीतिक परिवार से आने वाले इकलौते व्यक्ति हैं, बल्कि इसलिए भी कि युवाओं के बीच बढ़ती  लोकप्रियता व महिलाओं-बुज़ुर्गों के बीच स्वीकार्यता व बनती साख से ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार घबरा उठे। सत्ता के गलियारे में यह भी चर्चा है कि बहुत-सा मसाला ख़ुद उन्होंने ही विपक्ष को मुहैया कराया था। बहरहाल, बिहार विधानसभा में तेजस्वी के 41 मिनट के भाषण ने यह संकेत दे दिया है कि एक मज़बूत समानांतर नेता का उदय हो चुका है, जिनकी 20 महीने के कार्यकाल में पाक-साफ़ छवि ने स्वाभाविक उम्मीदें जगाई हैं। हां, जब चहुंओर तारीफ़ होने लगे, तो थोड़ी देर ठहर कर मनन करना चाहिए ताकि और भी तार्किकता, पैनापन, निखार व वाग्विदग्धता आए।

बिहार के हालिया घटनाक्रम पर बी.एन. मंडल द्वारा राज्यसभा में 1969 में दिया गया भाषण बरबस याद आ गया -
"जनतंत्र में अगर कोई पार्टी या व्यक्ति यह समझे कि वह ही जबतक शासन में रहेगा, तब तक संसार में उजाला रहेगा, वह गया तो सारे संसार में अंधेरा हो जाएगा, इस ढंग की मनोवृत्ति रखने वाला, चाहे कोई व्यक्ति हो या पार्टी, वह देश को रसातल में पहुंचाएगा। ... हिंदुस्तान में (सत्ता से) चिपके रहने की एक आदत पड़ गयी है, मनोवृत्ति बन गई है। उसी ने देश के वातावरण को विषाक्त कर दिया है।"
दरअसल, नीतीश कुमार भी येन-केन-प्रकारेण सत्ता में रहने के लिए अपनी अगली  ईगो व अटैंशन सीकिंग सिंड्रोम के चलते किसी भी विचारधारा से हाथ मिलाने को तैयार रहते हैं और मौक़ापरस्ती का अश्लील मुजाहिरा पेश करते हुए विधानसभा के अंदर धर्मनिरपेक्षता शब्द की खिल्ली उड़ाते हैं। वो अपनी सुविधानुसार संघ की भाषा बोलने से बाज नहीं आते। बिहार में जो घिनौना खेल खेला गया, रातोंरात जनता के विश्वास को कुचला गया, वह दरअसल जनादेश का अपहरण मात्र नहीं, बल्कि जनादेश के साथ दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या है। किसी पार्टी विशेष का प्रवक्ता किसी मामले में सफ़ाई किस संवैधानिक दायरे में मांग सकता है? तेजस्वी ने नीतीश कुमार से कहा कि क्या वे कोई ऐसा क़ानून बनाएंगे जिसमें एफआईआर के बाद ही इस्तीफ़ा देना पड़े? अगर ऐसा हुआ, तो सबसे पहले तो हत्या व हत्या के प्रयास के मामले में सबसे पहले नीतीश कुमार को ही त्यागपत्र देना पड़ेगा, और जिस छवि की दुहाई देकर वो हाय मोरल ग्राउंड लेते हैं, उस पर तो उन्हें कोई क़ानून बनने का इंतज़ार किए बगैर ख़ुद ही फ़ौरन इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।

किसी मामले की उचित एजेंसी से जांच से किसी का विरोध नहीं हो सकता है, पर चयनात्मक व दुराग्रहग्रस्त कार्रवाई एवं मीडिया ट्रायल तो जम्हूरियत की सेहत के लिहाज़ से ठीक नहीं। यदि स्वच्छता अभियान ही चलाना है, तो हो जाए क़ायदे से सभी सांसदों, विधायकों, मंत्रियों व मुख्यमंत्रियों की यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरी जायदादों की जांच। दो दिन में लोकसभा गिर जाएगी, न जाने कितने सूबों की सरकारें हफ़्ते में चली जाएंगी। पर, सेलेक्टिव टारगेटिंग कर नैतिकता का ढोंग रचने वाले दोहरे क़िस्म के लोग इस पर कभी राज़ी नहीं होंगे।

मैं कभी-कभी हैरान रह जाता हूँ कि लालू प्रसाद से लोगों को इतनी निजी खुंदक व ईर्ष्या है कि वे तेजस्वी की तारीफ़ करते हुए भी लालू जी को लपेटने का कोई मौक़ा नहीं जाने देते। प्रेम कुमार मणि नेता, प्रतिपक्ष के रूप में तेजस्वी के भाषण की "खुले हृदय उमगि अनुरागा" के सहज भाव से प्रशंसा करते हैं, पर लालू जी के प्रति उनकी आलोचना इस हद तक है कि वे उनके पहनने-ओढ़ने के ढंग पर भी तंज करने से नहीं चूकते। प्रेम जी के पोस्ट का एक अंश यहाँ रख रहा हूँ : "पिछले साल नवंबर में मैंने तेजस्वी को पहली दफा नजदीक से देखा था। मैं लालू जी के यहां एक समारोह का निमंत्रण देने गया था। रात के कोई आठ बज रहे होंगे। मैं बैठके में पहुंचा, तब लालूजी के साथ  राबड़ी जी सहित परिवार के कई सदस्य थे, तेजस्वी भी। लालूजी अस्वस्थ थे। लालूजी से आप शालीनता की उम्मीद कम ही कर सकते हैं। जैसे -तैसे बैठना, अविन्यस्त कपड़ों में रहना उनकी फ़ितरत में शामिल है। लेकिन, तेजस्वी मुझे दीगर दिखे। वह अभिवादन में खड़े हुए, विदा होते समय भी बाहर तक निकले। मुझे महसूस हुआ, यह बालक कुछ अलग है। वही मेरी संक्षिप्त मुलाकात थी, जिसमें मुझसे उनकी कोई बात नहीं हुई थी, लेकिन शालीनता ज़रूर दिखी थी ।"

अब कोई बताए कि अस्वस्थ हालत में कोई प्रैस से आए कपड़े पहनकर बिस्तर पर लेटकर स्वास्थ्य लाभ करता है? घर में लोग कैसे रहते हैं? और, लालू जी तो कम-से-कम इस मामले में किसी दिखावे-ढकोसले में कोई बहुत यक़ीन नहीं करते। उनका अपना शऊर है, अपना अंदाज़ है। वो तो लु़ंगी-बनियान में भी यूं ही सहज रहते हैं, इंटरव्यू भी ऐसे ही देते हैं, यही उनका याकि अधिकांश बिहारी परिवारों में पहनने-ओढ़ने का तौर-तरीक़ा है। गांधीजी को क्या कहिएगा कि आदमी नंगधडंग था, अशालीन था, अशिष्ट था! लालू जी ने तो एक सभा में कुर्ते को खोलकर, बनियान निकालकर कुर्ता पहना, फिर उसके ऊपर बनियान। और, कहा कि अब बिहार में यही होगा। जो नीचे थे, वो अब ऊपर आएंगे, वक़्त का चक्का अब घुमेगा। जब वो यह कहते थे, तो इस अपील का गज़ब का असर होता था।

मुझे आज भी अलौली में  95 में लालू जी की चुनावी सभा में दिया गया नारा याद है - सुअर चराने वालो, गाय चरानो वालो, बकरी चराने वालो, भैंस चराने वालो, भेड़ चराने वाले, मूस के बिल से दाना निकालने वालो, पढ़ना-लिखना सीखो! तब मैं दूसरी जमात में पढ़ता था, बस चुपचाप उनके पीछे पागल भीड़ में मां का हाथ थामे एकटक कभी उन्हें, तो कभी उनके लाल रंग के हैलिकॉप्टर को निहार रहा था। पिताजी सभा की सफलता के लिए कहीं जुटे हुए थे। एक वक़्त वो भी आया, जब राबड़ी जी विषम परिस्थिति में बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, उन्हें दिखाने के लिए मेरे एक शिक्षक ने मुझे गोद में उठा लिया। वो 98 के लोकसभा चुनाव के प्रचार में रौन (अलौली) आई थींं। तब मैं पांचवीं कक्षा का विद्यार्थी था। स्कूल में भाषण देने का साहस नहीं होता था, राबड़ी जी का धीमे-धीमे स्वर में साहसिक भाषण मेरे अंदर के डर को भी कहीं दूर कर रहा था। बाद में जब भागलपुर युनिवर्सिटी आया, तो मैंने अच्छे-अच्छों के पैरों को लड़खड़ाते देखा, बड़े-बड़ों के होठों को थरथराते देखा। राबड़ी देवी की सरकार को कई बार अस्थिर करने की कोशिशें हुईं। इसमें कोई दो मत नहीं कि उस दौर में चंद लोगों की वजह से ज़्यादतियां भी बढ़ रही थीं। आज वो इन्हें छोड़कर जा चुके हैं। पहले कार्यकाल में जो उल्लेखनीय काम हुए, उन्हें और भी आगे और सही दिशा में बढ़ाया जा सकता था। पर, अब तमाम विचलनों-व्यतिक्रमों से सीख लेते हुए उजालों के एक नये सफ़र की ओर नवऊर्जा के साथ सामाजिक न्याय व सांप्रदायिक सौहार्द के स्पष्ट दर्शन में ठोस आर्थिक एजेंडे की रूपरेखा तैयार करते हुए नये नेतृत्व को अविरल-अविचल तीव्रतम गति से आगे बढ़ना होगा।

लालू प्रसाद के कामकाज की शैली के प्रति मेरी अपनी समीक्षा है, और आलोचना व असहमति लोकतंत्र की बुनियादी शर्त हैं। पर, मौजूदा सियासत में मूल्यांकन कभी भी निरपेक्ष नहीं हो सकता। आशा है कि पूर्व में की गई कतिपय प्रशासनिक भूलें नहीं दुहराई जाएंगी, और नई रोशनी समतामूलक समाज की स्थापना हेतु कुछ क़दम और आगे बढ़ाएगी।
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- जयन्त जिज्ञासु

शोधार्थी, जेएनयू