मित्रो ! ज़रूर पढ़ें।
मोबाइल और बूढ़े की झल्लाहट
बल्लहौं कय बेटा मोबाइल कीनाय दीहिस
झूट्ठो कय हमरा इ फेरा लगाय दीहिस।
झूट्ठो कय हमरा इ फेरा लगाय दीहिस।
तीस बेर टीपो ते एक बेर लगता है
दू बात बोलै में चार बेर कटता है।
एत्ता न झंझट है टीप-टाप दाबै के
इन्ने उगाबै कय उन्ने मेटाबै के।
हरदम भुलाते हैं नम्बर लगाबै में
बौख-बौख जाते हैं मैसेज बनाबै में।
का बोलें पोता जे दू दिन कय छौरा है
सेटिंग लगाबै में बुरबक बनाय दीहिस
बल्लहौं कय बेटा...
दू बात बोलै में चार बेर कटता है।
एत्ता न झंझट है टीप-टाप दाबै के
इन्ने उगाबै कय उन्ने मेटाबै के।
हरदम भुलाते हैं नम्बर लगाबै में
बौख-बौख जाते हैं मैसेज बनाबै में।
का बोलें पोता जे दू दिन कय छौरा है
सेटिंग लगाबै में बुरबक बनाय दीहिस
बल्लहौं कय बेटा...
हफ्ता में चायर (4) दिन टाबरे नै रहता है
जब भी लगाओ त स्विच ऑफ कहता है।
उनको बताना था बात बड़ा निजी है
उन्ने से बोल दीहिस रूट इज बिजी है।
का बोलें टॉपअप से ऑफर कय चक्कर का
मिश्री रंग बोली में हमको फसाय लीहिस
बल्लहौं कय बेटा...
जब भी लगाओ त स्विच ऑफ कहता है।
उनको बताना था बात बड़ा निजी है
उन्ने से बोल दीहिस रूट इज बिजी है।
का बोलें टॉपअप से ऑफर कय चक्कर का
मिश्री रंग बोली में हमको फसाय लीहिस
बल्लहौं कय बेटा...
अलगे कहानी है घर कय जनानी के
खिस्सा सुनाबै कय, नौता-पिहानी के।
फोने पर दायल-भात-सागो बतियाबै के
घंटा भैर समधिन सय झूट्ठो फरियाबै के।
दाँती लग जाता है कूपन भराबै में
सच्चे सनिच्चर कय फेरा लगाय दीहिस
बल्लहौं कय बेटा...
खिस्सा सुनाबै कय, नौता-पिहानी के।
फोने पर दायल-भात-सागो बतियाबै के
घंटा भैर समधिन सय झूट्ठो फरियाबै के।
दाँती लग जाता है कूपन भराबै में
सच्चे सनिच्चर कय फेरा लगाय दीहिस
बल्लहौं कय बेटा...
को-को दिन कमबख्त इ बड्डी सताता है
इन्ने लगाते हैं, उन्ने लग जाता है।
हम तो लगाये थे लालमणि देबी को
जाकर के लग गया बॉबकट बेबी को।
गाली से धो दिया बोल्ड हिट गाली में
सोचो तो फील हुआ कैसा बुढ़ारी में।
लुच्चा-लफंगा-कमीना तक बोल दिया
लुच्चा-लफंगा-छुछुंदर तक बोल दिया
ऊप्पर से गुंडा कय तोहमत लगाय दीहिस
बल्लहौं कय बेटा मोबाइल कीनाय दीहिस
झूट्ठो कय हमरा इ फेरा लगाय दीहिस।
इन्ने लगाते हैं, उन्ने लग जाता है।
हम तो लगाये थे लालमणि देबी को
जाकर के लग गया बॉबकट बेबी को।
गाली से धो दिया बोल्ड हिट गाली में
सोचो तो फील हुआ कैसा बुढ़ारी में।
लुच्चा-लफंगा-कमीना तक बोल दिया
लुच्चा-लफंगा-छुछुंदर तक बोल दिया
ऊप्पर से गुंडा कय तोहमत लगाय दीहिस
बल्लहौं कय बेटा मोबाइल कीनाय दीहिस
झूट्ठो कय हमरा इ फेरा लगाय दीहिस।
- सलिल (मुंगेर के लोकप्रिय कवि, जिनके साथ 2011 में पूरबसराय में मैंने एक मंच साझा किया था और कविता की भाषा पर अपनी राय रखी थी।)
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