Wednesday, 15 April 2015





                                         दलों के सद्यःविलय की पूर्वाग्रह-प्रेरित मनमानी मीमांसा

छह दलों के विलय की व्याख्या कुछ भले लोग जातीय समीकरण के उभार व कुछ परिवारों की गोलबंदी के रूप में कर रहे हैं व इसके देशव्यापी असर के आसार को इसकी शैशवावस्था में ही खारिज़ कर रहे हैं। पता नहीं उनकी याद्दाश्त इतनी कमज़ोर क्यों हो जाती है ? गत वर्ष बिहार में हुए उपचुनाव के वक़्त बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन कह रहे थे कि राजद का सारा वोट जद यू. को नहीं मिल सकता, न ही जद यू. का शत प्रतिशत वोट राजद के पाले में जायेगा। तर्क ये कि जॉर्ज व नीतीश की समता पार्टी की बुनियाद लालू प्रसाद की कुछ ग़लत नीतियों के विरोध में पड़ी थी, जो आगे चलकर जद यू. की शक्ल में सामने आया। अतः, अपने अंतर्द्वन्द्वों के चलते यह गठबंधन फेल हो जायेगा। अब कुछ स्तंभकार व हर वक़्त हड़बड़ी में रहने वाले टीवी के भविष्यवेत्ता इस विलय के विफल होने की आशंका जता रहे हैं।


तब जबकि राजनीति की प्रयोगशाला बिहार में इस बड़े गठबंधन ने बाजी मार ली, तो उसकी मीमांसा में कुतर्क गढ़े जा रहे थे। और, अब जबकि इन पार्टियों का विलय हुआ है, तो उसका मखौल उड़ाया जा रहा है। हाँ, इन शोषितों, पीड़ितों की राजनीति, रहनुमाई व रहबरी का दावा करने वाले नेताओं के डीएनए में सत्ता-संचालन व पार्टी प्रबंधन का कौशल नहीं है। हाँ, ये सूक्ष्मता से जनता के साथ खिलवाड़ कर बच निकलना नहीं जानते। हाँ, चालाकी व धूर्तता इनके ख़ून में नहीं है। हाँ, शातिराना चाल इनकी नस-नस में नहीं है। हाँ, क्रूरता व ग़रीब-गुरबों के साथ भद्दा मज़ाक कर बच निकलना इनके रग-रग में नहीं है। जी हाँ, मीडिया को मैनेज करने का हुनर इन्हें नहीं आता। यही वजह है कि जगन्नाथ मिश्रा के समय से चले आ रहे चारा घोटाले में लालू प्रसाद जेल चले जाते हैं व अपनी पूरी राजनीतिक यात्रा को कुंठित व लांछित कर डालते हैं। राजतंत्र में भी खज़ाना राजा अपने पास नहीं रखता था। कोई भी होशियार सियासतदां वित्त मंत्रालय अपने पास नहीं रखता। पर, ये सियासी भूल लालू प्रसाद से हुई व वो खज़ाना मंत्री बन बैठे। अदूरदर्शी व कुछ चालबाज़ सलाहकारों ने एक होनहार राष्ट्रीय नेता को पुष्पित-पल्लवित होने से पहले राजनीतिक रूप से काल-कवलित करा दिया।


भाजपा के बिहार में रामविलास पासवान की लोजपा व उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा के साथ एवं उत्तरप्रदेश में उदित राज व अुनप्रिया पटेल के अपना दल के साथ गठबंधन में इन भलेमानुषों को अवसरवाद व जातिवाद नहीं दिखता। कमरतोड़ महँगाई व रोज़मर्रा की चीज़ों के दाम में बेतहाशा वृद्धि, केंद्र की राजग सरकार की जनादेश के साथ अपनी मनमानी करने एवं मुख्यमंत्रियों के लगातार अपमान, राजभवन के कार्यक्रम में मोदी-मोदी के नारे पर प्रधानमंत्री की हैरान करने वाली चुप्पी, आदि के विरोध में बिहार व यूपी के उपचुनाव में वहाँ की जनता की सहज प्रतिक्रिया हम देख चुके हैं। समय रहते चेत जायें उन्माद व सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की राजनीति करने वाले मगरूर सत्ताधीश, नहीं तो 2015 का परिणाम आपके अभिमान को धो कर रख देगा।


और हाँ, ये जंगलराज के आगमन की आशंका का राग अलापना छोड़ दीजिए, ये मर्सिया तराने किसी और दिन आपके काम आयेंगे। जब भी, जहाँ भी किसी वंचित, शोषित, उत्पीड़ित समाज की राजनीतिक अभिव्यक्ति पुख्ता ढंग से महसूस की जाने लगती है, लोकतंत्र को हाइजैक करने की मंशा पाले कुछ ठेकेदारों के पेट में दर्द शुरु हो जाता है, मानो लोकतंत्र को निखारने-सँवारने का दायित्व इकलौता इनका है। संघीय ढाँचे पर लगातार चोट करने वाले अब भी नहीं संभले , तो उनका मद उन्हें कहीं का न छोड़ेगा। बाकी रहा, इस गठबंधन के 2015 में और भी फलने-फूलने की बात और परिणामस्वरूप बिहार के रसातल में चले जाने की आपकी चिंता, तो आप फिक्र करना छोड़ दीजिए। बिहार के लोग राजनीतिक रूप से काफी परिपक्व हैं, सामाजिक समरसता की परिधि को भी अपरिमित करना बेहतर जानते हैं, अपना भला-बुरा उन्हें आपसे ज़्यादा मालूम है।


मैं तो अक्सर कहता हूँ, भारतीय लोकतंत्र उस पुण्य-सलिला, सतत प्रवहमान गंगा की तरह है, जिसमें स्व-शुद्धीकरण की क्षमता है। तमाम सुधार की गुंजाइश के बावजूद यह अपनी गंदगी को खुद साफ कर लेगा। फिलहाल, बिना किसी राग-द्वेष के, वैमनस्य के इन दलों के सद्यःविलय को ठंडे मन से, निर्विकार भाव से स्वीकार कीजिए व लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था बनाये रखिए।


मेरी आस्था लोकतांत्रिक संस्था के प्रति है, किसी व्यक्ति या दल-विशेष के प्रति नहीं। लालू-नीतीश-मुलायम-चोटाला-देवगौड़ा के गठजोड़ को सुअरों का झुंड बताना न सिर्फ  अभिजात्य वर्ग की सामंती सोच को दर्शाता है, बल्कि यह उसके मानसिक दिवालियापन का भी द्योतक है। लालू प्रसाद के प्रशासनिक मोर्चे पर विफलता का सबक जनता ने अच्छी तरह उन्हें सिखा दिया, मगर वहाँ का सदियों से शोषित वर्ग उनकी सामाजिक न्याय की लड़ाई को आज भी भूला नहीं है। न्याय-बोध बिहार की जनता अच्छी तरह जानती है, समझती है। और आप जान लें कि शीर्ष पर काबिज़ चंद लोगों की अमानुषी जीवन-धारा ने बाध्य किया बिहार के पीड़ितों को लालू प्र. में, यूपी के वंचितों को मुलायम सिंह में व हरियाणा के शोषितों को देवीलाल में अपना नेतृत्व तलाशने के लिए। उन्होंने बिहार-यूपी-हरियाणा को स्वर्गिक अहसास तो नहीं दिया, पर दबी ज़बान को स्वर ज़रूर दिया, जिसे कोई भी निष्पक्ष विश्लेषक नकार नहीं सकता।


हाँ, इस पूरी प्रक्रिया की आड़ में कुछ अनैतिक कार्य भी हुए, जिस तांडव नृत्य को सदियों से सत्ता के संस्कार को जीने वाले, अपनी जीवनशैली में ढाल लेने वाले ये स्वयंभू लोग किया करते थे, उसी आईने को उन्हें दिखाना एक समय के बाद जनता को ठीक नहीं लगने लगा। उन शोषकों के रास्ते पर ही परिवर्तन के पहिये को मोड़ देना न्यायोचित नहीं हो सकता, न ही यथोचित ठहराया जा सकता है। मैं स्वानुभूत सच बोलता हूँ, लिखता हूँ। न तो सस्ती लोकप्रियता की कोई ख्वाहिश है, न ही अप्रियता से डरता हूँ। बाकी, कुछ उग्र व असहिष्णु साथियों की भाषा में बात करने का हुनर नहीं सीखा है। और, इस तरह की असंसदीय टिप्पणी से अपनी तुच्छ वैचारिक गंदगी फैलाना भर्त्सनीय है। मैं आपसे भले सहमत न होऊँ, पर आपकी हर टिप्पणी का स्वागत है, बशर्ते आपकी भाषा में न्यूनतम अपेक्षित मर्यादा व संस्कार झलके।


और, जमहूरियत किसी की जागीर नहीं हुआ करती, जनादेश व राजनीतिक समीकरण, गठबंधन, दलों के विलय व नयी पार्टी के गठन की व्याख्या होती रही है, होती रहेगी। कोई भी जनादेश या राजनीतिक विकल्प अंतिम नहीं होता। व्यक्ति-उपासकों का भ्रम भी जल्द टूट जायेगा। इतनी तिलमिलाहट व राजनीतिक अस्पृश्यता ठीक नहीं। नीतीश कुमार जब तक भाजपा के साथ थे, सब ठीक था, अलग होते ही स्कूल के नल का पानी विषाक्त होने लगा। कुछ दोस्त जिस विशिष्ट धारा से आते हैं, उसने तो जननायक कर्पूरी ठाकुर की माँ-बहन-बेटी को गाली दी। बेहतर होगा कि वे मेरा मुँह न खुलवायें। जिस वर्ग को ज्ञान पर वर्षों शत प्रतिशत आरक्षण रहा हो, उनमें से कुछ ऐसी ही ओछी बातें करते हैं। आरक्षण के मनोविज्ञान को समझना है, तो पुनर्जन्म में विश्वास करने वालो ! कभी डोम जाति में पैदा होकर देखना या हो सको तो बुद्ध, वी.पी. आदि जैसा उदारचेता होकर खुद से संवाद करना। उस अस्तित्व के संघर्ष को जीने के बाद पता चलेगा कि शुद्र ये उपेक्षित लोग हैं, या शोषक लोग क्षुद्र हैं। किसी बातचीत में हर टिप्पणी का जवाब देना मैं उचित नहीं समझता, न ही बाध्य हूँ।


मेरी जो थोड़ी- बहुत सियासी समझ है, उसके आलोक में कह सकता हूँ कि वैचारिक धरातल पर एक साथ खड़े रहे ये राजनीतिक साथी इस विलय को वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए दूर तक ले जायेंगे और चुनाव में जाने से पहले जनहित के मुद्दों को उभारकर, केन्द्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ सतत संघर्ष कर जनता का दिल जीतने का प्रयास करेंगे। अभी जबकि यह विलय राजनीतिक प्रसवगृह से बाहर भी नहीं निकला है; इसके भविष्य को शंकित निगाह से देखना-आँकना इसके प्रति न्याय नहीं होगा। इस विलय को अभी से खारिज़ करना इसकी निष्ठुर व्याख्या है, इसका निर्मम विश्लेषण है, इसका एकपक्षीय व अधूरा मूल्यांकन है।

- जयन्त जिज्ञासु

(लेखक सेंट स्टीवन'स कॉलिज, दिल्ली से की कॉन्सेप्ट्स व क्रिटिकल थॉट की पढ़ाई कर चुके हैं।)

Monday, 13 April 2015

मसला नुमाइंदगी व समतामूलक समाज का




                     


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न मार्क्स फेल हुए हैं, न मार्क्सवाद। मार्क्सवादी​ अपने समाज के ताने-बाने को समसामयिक परिप्रेक्ष्य में नहीं समझने की ऐतिहासिक जिद के चलते अपनी विफलता का ठीकरा मार्क्स पर फोड़कर उनके साथ ज़्यादती ही करेंगे। किसी विचारधारा को संपूर्णता में नहीं समझने की क़सम खाने पर बहुतेरे प्रयोग टिकते नहीं। जड़ता व ठहराव तोड़ने के लिए कुछ क्षेपक जोड़ना पड़े तो संपूर्ण समृद्धि के लिए बुरा नहीं है। 
बकौल प्रो. तुलसीराम, "भारतीय समाज के बारे में मार्क्स, एंगेल्स ने 1853 तथा 1858 के बीच कई लेख लिखे। मूलतः जाति से संबंधित कार्ल मार्क्स के विचार अधूरे रह गए, अन्यथा हमारे लिए वे युगांतरकारी सिद्ध हुए होते। मार्क्स बुद्ध को नहीं जानते थे। यदि ऐसा होता, तो वे जाति व्यवस्था के बारे में बहुत कुछ लिख जाते। फिर भी उन्होंने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत सीख ली जा सकती थी। मार्क्स भारत के विकास में जाति व्यवस्था को सबसे बड़ी बाधा मानते थे। उन्होंने भारत में धर्मांधता और मिथकों की तरफ भी ध्यान आकर्षित किया है। मार्क्स ने जगन्नाथ यात्रा के दौरान रथ के पहिए के नीचे कूदकर आत्महत्या करने वालों का भी जिक्र किया है। इन आत्महत्याकर्ताओं का विश्वास था कि ऐसा करने से वे सीधे स्वर्ग चले जाएंगे। मार्क्स ने जगन्नाथ मंदिर से संबद्ध वेश्यावृत्ति का भी जिक्र किया है।इस कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण बात उन्होंने यह लिखी है कि भारत को भारतीय लोगों ने जीत कर अंग्रेजों को सौंप दिया। मार्क्स ने प्रमुखता से उल्लेख किया है कि सिंधिया राजघराना अंग्रेजों को समर्थन दे रहा था। सन् 1857 के बंगाल रेजिमेंटों की भारतीय इतिहासकारों द्वारा बड़ी तारीफ की जाती है, क्योंकि मंगल पांडे उसी के सिपाही थे, जिन्होंने हथियारों में गोचर्म के इस्तेमाल के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। कार्ल मार्क्स उस रेजिमेंट के बारे में लिखते हैं कि बंगाल आर्मी के कुल 80 हज़ार सैनिक थे, जिनमें 28 हज़ार राजपूत, 23 हज़ार ब्राह्मण तथा 13 हज़ार मुसलमान थे। निम्न जातियों से सिर्फ़ 5 हज़ार लोग थे। अपने गहन अध्ययन के बावजूद पार्टी में मैं मूर्ख बना रहा। ऊपर से जातिवादी होने वाले आरोप से मैं छिन्न-भिन्न होने लगा था। उस समय मेरी समझ में आने लगा था कि वर्ग संघर्ष के माध्यम से भारत में समाजवादी व्यवस्था लागू होना असंभव-सा है।"

कुछ लोग अपने ज़ेहन में अपनी जाति भी लिए चलते हैं। अपने-अपने इलाक़े व प्रांतों से सूबे व देश की राजधानी पहुँचते हैं, तो जातीय समूह भी बनाते-तलाशते हैं व उस गोलबंदी का हिस्सा बनकर ख़ुद को कतिपय दुश्वारियों से महफ़ूज़ महसूस करते हैं। शैक्षणिक संस्थानों में ऐसे गुटों की पहचान बड़ी आसानी से की जा सकती है, जो अपनी जातीय अस्मिता की बैसाखी के सहारे संघर्ष की दुश्वार राहें हमवार करने की जुगत में लगे रहते हैं। वामपंथ से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं, मगर ख़ुद को कॉमरेड कहलाना पसंद करते हैं।  बिहार-यूपी में साम्यवाद को कोसने वाले व जेएनयू आकर वामपंथ को रूमानी नज़रों से देखने वाले ऐसे छद्म वामपंथियों ने ही वामपंथ की दुर्गति की है, उसका मज़ाक उड़ाया है। मार्क्स (अंक / ग्रेड ) के लिए मार्क्सिस्ट होने वाले व काम के लिए रेड (लाल) होने वाले कुछ कामरेड  पहले विचारधारा की स्पष्ट रेखाएँ तो खींच लें। "कमरे के अंदर जातिवाद और कमरे के बाहर साम्यवाद" की चिरकुट नीति ने ही  इस देश में साम्यवाद की कमर तोड़ी है।  जिसने पूस की रात कभी देखी ही नहीं, जी ही नहीं, वो  हलकू का दर्द भला क्या जाने !  अब, बेवजह ब्राह्मण को गाली देने, राजपूत पर तंज़ कसने, कायस्थ को बेईमान व चालाक करार देने और भूमिहारों को शातिर का प्रमाण-पत्र बाँटने से यदि समरस, सौहार्दपूर्ण व समतामूलक समाज की स्थापना होनी होती, तो कब की हो चुकी होती।

वैसे ही, दलितों के उभार के प्रति एक तरह की हेय दृष्टि, आदिवासियों के उन्नयन के प्रति उपेक्षा-भाव व पिछड़ों की उन्नति-तरक्की को संदेहास्पद ढंग से देखते हुए खारिज़ करने की मनोवृत्ति से यदि आप चाहते हैं कि राष्ट्रधर्म का निर्वाह हो जायेगा, आरक्षण की ज़रूरत समाप्त हो जायेगी, तो आप लिख लीजिए कि इस मानसिकता के साथ इस देश से आप  क़यामत तक आरक्षण ख़त्म नहीं कर पायेंगे। आरक्षण, आरक्षण की आवश्यकता समाप्त करने के लिए लागू हुआ था, पर यदि आप हर बात के सामान्यीकरण की अपनी आदतों में तब्दीली नहीं लाते हैं, तो ये अनंतकाल तक रहेगा।

कुछ मित्र कहते हैं,"मेरिट शुड नोट बी इगनॉड"।  किस योग्यता की बात आप करते हैं ? प्रतिभा की इतनी ही क़द्र थी, तो अंग्रेजों को क्यों भगाया ?  वो हमसे कहीं ज़्यादा प्रतिभावान थे और शायद ईमानदारी में भी कई स्तर पर आपसे आगे। जब अंग्रेज यहाँ थे, हमारी बौद्धिक हैसियत व औकात एक सब- इंस्पेक्टर तक बनने की नहीं थी, एकाध सत्येन्द्रनाथ टैगोर व सुभाषचंद्र बोस जैसे आइसीएस के उदाहरण को छोड़ दें तो। मसला क़ाबिलियत का नहीं है, मसला नुमाइंदगी का है। ये वो लोग हैं, हज़ारों सालों से जिनके पेट पर ही नहीं, दिमाग़ पर भी लात मारी गयी है। समाज व मुल्क़ की मुख्यधारा से इन्हें जोड़ने  हेतु विशेष अवसर प्रदान किया ही जाना चाहिए।

 हमारी संवैधानिक प्रतिबद्धता है कि समान के साथ समान व्यवहार होगा। कभी-कभी बराबरी ग़ैर-बराबरी को जन्म देती है।  समान व असमान के बीच समान स्पर्धा नहीं हो सकती। राष्ट्रपति भवन में काबुल से लाये गये घोड़े, जिन्हें काजू-बादाम-पिस्ता खिलाया जाता हो, और बिहार के फरकिया के घोड़े, जिन्हें दो जून की घास तक नसीब न हो; को एक ही रेस में दौड़ाकर उनका समुचित, सम्यक् व न्यायपरक मूल्यांकन कैसे किया जा सकता है ? यहीं समग्रता में आरक्षण की वाजिब बहस की ज़रूरत  महसूस होती है व सदियों से सताये गये लोगों को इसकी तलब लगती है। अब, ये कहना कि ज्ञान पर शत प्रतिशत आरक्षण हमें तो नहीं है, हमारे पुरखों ने किनके साथ क्या अन्याय किया, नहीं किया, उनसे हमारी क्या वाबस्तगी ? प्रथमद्रष्टया तो ये तर्क थोड़ी देर के लिए ठहर सकता है, पर जब बारीकी से आप विश्लेषण करें, तो पायेंगे कि कहीं-न-कहीं ये इतिहास को नकारने का सिण्ड्रोम (डिनायल ऑव हिस्ट्री) है।

तुलसीराम जी लिखते हैं , "मार्क्स ने कहा था कि ब्रिटिश शासकों का भारत में दोहरा मिशन था। एक तो यहां के एशियाटिक समाज को ध्वस्त करना तथा दूसरा एशिया में यूरोपीय सामाजिक व्यवस्था लागू करना। मार्क्स के इस कथन से ही जाहिर होता है कि एशियाई समाज यूरोपीय समाज से बिल्कुल भिन्न था, इसलिए वर्ग संघर्ष का फार्मुला बहुत हद तक यहां फिट नहीं बैठता है। भारत के मजदूरों का एक हिस्सा हिंदुत्ववादी ताक़तों के साथ है। बाक़ी सैकड़ों युनियनों में बंटा हुआ है। यहां हर पार्टी की अपनी मजदूर यूनियनें हैं। फिर क्रांति का आधार कहां से आएगा ?"

जब आप ये कहते हैं कि किसी प्रतियोगी परीक्षा में आदिवासी को आमंत्रित कर उन्हें बस जलपान कराना चाहिए व उत्तीर्ण घोषित कर देना चाहिए, दलित को बस परीक्षा में बैठने मात्र से पास कर देना चाहिए, पिछड़ों के लिए दस में तीन प्रश्न के ही उत्तर देने अनिवार्य होने चाहिए व सामान्य वर्ग के लिए सभी दस प्रश्न अनिवार्य होने चाहिए; तो आप एक तरह से उन वर्गों को गाहे-बगाहे उकसा ही रहे होते हैं, वैमनस्य का विषवपन ही कर रहे होते हैं। आरक्षण तो बस संस्थान में प्रवेशमात्र के लिए है, आगे अपनी योग्यता, श्रम, जुनून व अध्यवसाय से ही उपाधि व ख्याति मिलती है।

इन अनोखे-अलबेले प्राणियों की रचनाधर्मिता यहीं नही विराम लेती, बल्कि हिलोरें मारते हुए आइसीसी को भी अयाचित परामर्श देती है कि ओबीसी खिलाड़ी द्वारा यदि चौका लगाया जाय, तो उसे छक्का माना जाना चाहिए, दलित खिलाड़ी द्वारा नोबॉल फेंके जाने पर भी कोई अतिरिक्त रन विपक्षी टीम को नहीं मिलना चाहिए, आदिवासियों को दो बार आउट होने पर ही आउट करार दिया जाना चाहिए, वगैरह-वगैरह।  हमारे सामान्य वर्ग के कुछ साथियों की ये असामान्य कल्पनाशक्ति व अद्भुत सृजनशीलता, मुझे नहीं पता कि उन्हें कहाँ ले जायेगी। पर, उनके ये  छिछले व उथले मज़ाक सिर्फ़ और सिर्फ़ उनकी असीमित कुंठा के द्योतक हैं।  दो बार एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने वाली संतोष यादव, विनोद काम्बली, जयंत यादव, दिलीप टिर्की, कुलदीप यादव, पिछले विश्व कप क्रिकेट में शानदार गेंदबाजी करने वाले उमेश यादव समेत न जाने कितने पिछड़े, दलित, आदिवासी खिलाड़ियों ने ऐसे कुतर्कों को अपने प्रदर्शन से धराशायी कर दिया। अव्वल तो ये कि इन खिलाड़ियों को टीम की जीत से मतलब रहता है, कभी इन अनावश्यक सवालों में उलझते भी नहीं।

प्रो. तुलसीराम अपनी आत्मकथा मणिकर्णिका में कम्युनिस्ट पार्टी के साथ अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, "धीरे-धीरे क्लास (वर्ग) तथा कास्ट (जाति) की अवधारणा समस्याजनक होकर मेरे सामने आने लगी। व्यावहारिक रूप में मुझे यह अनुभव होने लगा कि मार्क्स जिस मजदूर वर्ग की बात करते थे, उसका अधिसंख्य हिस्सा भारत में सामाजिक भेदभाव का शिकार दलित समाज से आता था। शायद कम्युनिस्ट पार्टी का ध्यान इस प्रश्न पर नहीं जाता था। मुझे आज भी आश्चर्य होता है कि भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के लगभग 90 साल पूरे होने जा रहे हैं, किंतु कम्युनिस्ट पार्टी ने कभी भी कोई राष्ट्रीय स्तर पर जाति व्यवस्था विरोधी आंदोलन नहीं चलाया। इसका परिणाम यह हुआ कि समय बीतने के साथ ही दलितों के बीच कम्युनिस्ट पार्टी का आधार लगभग समाप्त हो गया। इन तमाम नकारात्मक परिस्थितियों का प्रभाव यह पड़ा कि दलित भी सवर्णों की तरह जातिवादी राजनीति में व्यस्त हो गए। परिणामस्वरूप जातिवाद जितना शक्तिशाली इस समय है, उतना वह पहले नहीं था। कम्युनिस्ट पार्टी का यह तर्क आज भी आश्वस्त नहीं कर पाता है कि समाजवादी व्यवस्था लागू होने के बाद सारे वर्ग जाति के भेदभाव समाप्त हो जाएंगे। कल्पना के तौर पर यह बात अच्छी लगती है। यह कल्पना मुझे किसी उपन्यास की परिकल्पना-सी लगती है।"
तुलसीराम जी की उपर्युक्त बातों पर खुले मन से विचार किया जाना चाहिए। भारतीय समाज द्वारा यह मार्क्स के प्रति सच्ची भावांजलि होगी।

जहाँ कुछ साथी मुझसे निरर्थक ही मेरी जाति जानने में दिलचस्पी रखते हैं, वहीं मेरे ज़िले के ही एक दोस्त ने पिछले दिनों कहा कि एक महासभा का गठन हुआ है और हम चाहते हैं कि आप उसमें अपने स्तर से योगदान दें। मैंने कहा कि आपको कैसे पता कि जिस जातीय महासभा में आप मुझे रखना चाहते हैं, मैं उससे संबद्ध हूँ ?  माफ कीजिएगा, मैं ऐसी किसी भी महासभा का पक्षधर नहीं हूँ। हाँ, जब कहीं उपेक्षितों, वंचितों, शोषितों, पीड़ितों के साथ गैरबराबरी व किसी तरह के भेदभाव की बात होगी; चाहे वो किसी जाति, धर्म का क्यों न हो, मैं अपने विवेक व सामर्थ्य से उनके साथ खड़ा रहूँगा। मैं समझता हूँ कि इस देश के आधुनिक इतिहास में आज़ादी से भी हसीन, ख़ूबसूरत व अहम कोई घटना दर्ज़ हुई है, तो वो है संविधान का निर्माण व उसका अंगीकृत व प्रतिष्ठित होना। दुनिया के सबसे बड़े, कमोबेश क़ामयाब व चिरटिकाऊ लोकतंत्र के उस पवित्र संविधान की परिधि को सिकोड़ने के बजाय सुलझी व परिष्कृत सोच के साथ  हम अंदर से उसे कितना फैलाव देते हैं व निहितार्थ को स्पर्श करने में कामयाब होते हैं; इसी में उसके चिरायुत्व का राज़ है।


जयन्त जिज्ञासु,
शोधार्थी,
मीडिया अध्ययन केंद्र,
जेएनयू, दिल्ली

Friday, 10 April 2015



                             A Letter From Abraham Lincoln To His Son’s Teacher


My son starts school today. It is all going to be strange and new to him for a while and I wish you would treat him gently. It is an adventure that might take him across continents. All adventures that probably include wars, tragedy and sorrow. To live this life will require faith, love and courage.

So dear Teacher, will you please take him by his hand and teach him things he will have to know, teaching him – but gently, if you can. Teach him that for every enemy, there is a friend. He will have to know that all men are not just, that all men are not true. But teach him also that for every scoundrel there is a hero, that for every crooked politician, there is a dedicated leader.

Teach him if you can that 10 cents earned is of far more value than a dollar found. In school, teacher, it is far more honorable to fail than to cheat. Teach him to learn how to gracefully lose, and enjoy winning when he does win.

Teach him to be gentle with people, tough with tough people. Steer him away from envy if you can and teach him the secret of quiet laughter. Teach him if you can – how to laugh when he is sad, teach him there is no shame in tears. Teach him there can be glory in failure and despair in success. Teach him to scoff at cynics.

Teach him if you can the wonders of books, but also give time to ponder the extreme mystery of birds in the sky, bees in the sun and flowers on a green hill. Teach him to have faith in his own ideas, even if every one tell him they are wrong.

Try to give my son the strength not to follow the crowd when everyone else is doing it. Teach him to listen to every one, but teach him also to filters all that he hears on a screen of truth and take only the good that comes through.

Teach him to sell his talents and brains to the highest bidder but never to put a price tag on his heart and soul. Let him have the courage to be impatient, let him have the patient to be brave. Teach him to have sublime faith in himself, because then he will always have sublime faith in mankind, in God.

This is the order, teacher but see what best you can do. He is such a nice little boy and he is my son.

Thursday, 9 April 2015




पूर्वांचल (जेएनयू) में लिट्टी-चोखा की कहानी, जयन्त की ज़बानी :
संगत से गुण आत है...
शुक्रिया, अभिषेक भाई लिट्टी-चोखा के साथ इस सुरमयी शाम के लिए !
आप ख़ुद में एक कारवाँ हैं। आपके जैसे गुणी, सहज गुणग्राही व निष्काम कर्मयोगी मैंने कम ही देखे हैं। सबके भाई ओम भाई, आप अस्वस्थ हालत में भी आये और लिट्टी पार्टी में चार चाँद लगा गये। आभार जैसे शब्द छोटे पड़ जायेंगे। आपदोनों का मणिकांचन योग बना रहे ! अभिषेक भाई ! मैं रहूँ न रहूँ, पर आज पूरे दिल से कह रहा हूँ कि जिस मानवीय संवेदना, चेतना, सदाशयता, भलमनसाहत व शाइस्तगी के साथ आप उत्तरोत्तर आत्मोन्नति के पथ पर आगे बढ़ते हुए समाज और देश के हित में मानव संसाधन के मौलिक विकास में लीन हैं; आने वाले दिनों में ये दुनिया आपको याद करेगी, आपके नेक इंसानी कार्यों को बख़ूबी सराहेगी।
लियो तोल्सतोय ने कभी कहा था, "शहर में कोई ख़ुद को मृत समझकर बहुत दिनों तक जीवित रह सकता है"। पर, जिस शहर व समाज में आप जैसे सांगठनिक क्षमता से लैस ईगोविहीन व्यक्ति बसते हों, वहाँ रौनक नित बाहें फैलाये भलेमानुष का अभिनंदन करती है। उदास मौसम के ख़िलाफ लड़ने की कवायद नहीं करनी पड़ती, बल्कि वो आबो-हवा ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ुशगवार होने लगती है। ओम भाई ! आपके सान्निध्य में जितनी देर भी रहने का मौका मिले, ग़म का घेरा नहीं रहता। आपदोनों की संगत दुश्वार राहें भी हमवार कर देती हैं। विवेक भाई के लिए कुछ कहना औपचारिक-सा लगेगा। सच तो ये है कि यही वो शख़्स हैं, जिन्होंने आपदोनों से मिलाने में व मैत्री को बनाये व अब तक निभाये रखने में योजक कड़ी का काम किया है। इन अर्थों में इनकी भूमिका शुरू से ही महती रही है और आगे भी अहम रहेगी।
अजरा जी व ईशा जी ! आपदोनों से महीनों बाद मिलकर सुखद अनुभूति हुई। आप विज्ञापन व जनसम्पर्क विभाग की उन गिनी-चुनी साथियों में से हैं, जिन्हें अगली ईगो व अहसासे-बढ़तरी छू तक न पायीं। आशा है, आप आगे भी हम ग्राम्य परिवेश से आये बच्चों की किंचित अनभिज्ञताओं को दरकिनार करते हुए हमसे जुड़ी रहेंगी।
सोनू सुमन जी, अपनी मासूमियत यूँ ही बनाये रखें ! पीयूष भाई, आप अजातशत्रु हैं। आपकी निश्छलता भाती है। रोहित जी, रीतिका जी व लिप्सा जी ! आपका आना इस बात की गवाही रही कि आइआइएमसी के सच्चे लोग कभी हिन्दी-अंग्रेजी की जुदा दुनिया की बेमानी बहस में नहीं उलझते, बल्कि भाषाई संकीर्णता का गाहे-बगाहे शिकार हुए बगैर देसी लिट्टी का लुत्फ़ लेने एक बुलावे पर चले आते हैं।
हिन्दू कॉलिज से संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर अमित जी ने इस शाम को संगीत मेंं सराबोर कर डाला। उनकी सहज अभिव्यक्ति याद रहेगी कि पढ़ाई-लिखाई के चक्कर में हम तो बर्बाद हो गये। हमारी दुआएँ हैं कि जिस नाज़ से आपने संगीत के शौक़ को पाला है, वो ताउम्र आपको संतोष देता रहे !
अक्षय व्यास जी, आपके ज़ौके-दीदार के हम क़ायल हैं। साथ ही, आपकी सौम्यता के मुरीद भी कि आपने अपने कैमरे में इन ख़ूबसूरत पलों को क़ैद करने के बाद इतनी शराफत से हमें ये अनमोल तस्वीरें दे दीं। आप होते हैं, तो लगता है कि हमारे इतिहास-बोध व सौन्दर्य-बोध में समृद्धि आ गयी है। गुलज़ार के शब्दों में कहूँ, तो यूँ महसूस होता है, मानो दिन जाड़ों के हैं, खिड़की खुली है, धूप अंदर आ रही है।
विशाल शुक्ला जी, आपकी शालीन मौजूदगी अच्छी लगी।
लाजिम है कि दिल के पास रहे पासबाने-अक्ल
लेकिन कभी-कभी इसे तन्हा भी छोड़िए।
इसी तरह आप घूमा भी कीजिए, पत्रकारीय दृष्टि और भी पैनी होगी व अवैधानिक लाल बत्ती वाले आपसे खार खायेंगे।
सौम्या जी, नील भाई, गोविन्द भाई व विक्रम भाई ! आपकी सक्रियता व लिट्टी पाक-कला में आपकी निपुणता हमें आगामी आयोजनों में आपकी उपस्थिति के प्रति आश्वस्त करती है, हम आभारी हैं आपके।
कॉमरेड अंशु, राहुल दा व नीलेश मिश्रा जी ! आपका विशेष शुक्रिया कि आपने चंचल जी के आयोजन में शिरकत कर हमें हर्षान्वित होने का अवसर दिया। ऋचा बंका, स्नेहा विद्रोहिनी, सेज़ल व उनकी दोस्तों ने समां बांध दिया। स्नेहा जी के तेवर लिट्टी पकाते हुए भी जनवादी रहे और खाते हुए भी। अनुपात का ध्यान रखते हुए बांटचीट कर इन्होंने सबको खिलाया।
सेज़ल, आप याद आओगी। जब भी किसी बालसुलभ मुस्कराहट की तलब इन आँखों को होगी, आप बहुत याद आओगी। आपको विदा करते हुए एक किताब भेंट करना चाहता था,पर हमारी भेंट न हो सकी। जब कभी दिल्ली आना हो, मुझे बताइएगा।
वेदा-ओ-वस्ल जुदा गाना लज़्ज़ते दारद
हज़ार बार बरो सद हज़ार बार बयां।
(मिलने व बिछड़ने का अपना-अपना आनंद है। इसलिए हज़ार बार जाओ और सौ हज़ार बार आओ।)
समृद्धि जी, आप यूँ ही हमारे कार्यक्रमों की शान में इज़ाफा करती रहें व डाउन टू अर्थ बनी रहें !
हार्दिक भाई, आपका हार्दिक आभार कि आप हमारे साथ आरम्भ से अब तक जुड़े रहे हैं।
कन्हैया पाराशर, आप हमसब की शान हो। अपनी आहिस्ता से सूक्ष्म मज़ाक करने की कला से हमें यूँ ही आनंदित करते रहें !
दिल्ली वि.वि. के दर्शनशास्त्र विभाग के प्राध्यापक साहब (अंदाज़न) सप्रेयसीक पधारे व संकोच भरी मुस्कान बिखेरते रहे। उनका दिली शुक्रिया !
कॉमरेड अरुण पटेल ! आपकी जितनी भी तारीफ की जाये, कम है। आप हम खुराफातियों की कलाकारी की दुनिया के कोहिनूर हैं। हमारी शुभेच्छा है कि दुनिया के रंगमंच पर आपकी नैसर्गिक प्रतिभा का परचम लहरे !
गोविन्द भाई, आप लिट्टी खायें, चोखा खायें, जो मन में आये, खायें। मगर, "गोविन्दः इदानीमपि धावति" वाली टिप्पणी को ग़लत साबित कर दें। इंशाअल्लाह, आप ज़रूर करेंगे, बस थोड़ा-सा सियारी लक्षण पर स्व-अंकुश...
अंत में, अपने सभी आत्मीय मित्रों की शान में चलते-चलते बतौरे-ख़ास :
दिल में रहिए, नज़रों में भी आते रहिए
दोनों घर है आपका, दोनों को बसाते रहिए।
आपका ही सदा,
जयन्त
(द्रष्टव्य : जिन दोस्तों का ज़िक्र करना भूल गया हूँ, उनकी मौजूदगी व हसीन हरकत याद आते ही पोस्ट स्वतः एडिट हो जायेगा। यूँ ही प्यार बनाये रखिए।)



On the third day of the international conference on Interrogating Masculinities at St. Stephen’s College, along with other sessions, the third session was very interesting. It was focused on “Through the Looking Glass”. Dr. Karen Gabriel delivered a special lecture on ‘Intersecting Gender-Sex(uality) : Notes on the Sexual Economy’. The way she presented all the aspects of relationship between knowledge and eye, Indian Income Pyramid, India : Chronic Conflict and many more things, it was almost meditation for me to listen to her. I thoroughly enjoyed it.
When she was speaking, some random thoughts were coming to my mind. Though some of its part doesn't find direct connection with the lecture, yet I'm trying to correlate them. In the age of audio-visual medium,when we start playing with information and tampering with facts to make news unnecessarily interesting and sensational, the whole purpose of medium gets badly affected and it loses its autonomy. Marshall McLuhan says, “Medium is message”. Seeing has been considered as believing. But the distortion of image and lack of totality in its presentation are the great threat to the credibility of media. In the country like India, people live not only below poverty line (BPL), but also below media line (BML). Information is power in itself. But due to lack of right and useful information, they don’t take well-informed and wise decision.
The social reformer and revolutionary Hindi poet Kabir said, “तू कहता कागद की लेखी / मैं कहता आँखन देखी”। But what to see and what to believe is the question in the present era of information overload or information garbage. The limitation of our seeing due to lack of availability of true and integrated information with an eye to the uses and gratification of audience is the challenge of the day. Once G. B. Shaw commented on British media, “Today newspapers miserably fail to distinguish between a bicycle accident and the collapse of civilization.” Today, it won’t be wrong to say in the context of Indian visual media.
So, through which glass should we watch the world ? Yes, the best, efficient and trustworthy camera available to us is human eye, made by God. Our insight and foresight can help us to observe and understand the activities and happenings of the world right way. It is also unfortunate to believe that the images in the books of NCERT which play an important role in shaping the sense of history in children, are also changed. When the government of a particular party comes to power, it adds two pages in the book of history of Rajsthan and contrary to this when the govt. of other party comes to power, those two pages are torn and removed from the book. This is the unfortunate present reality of the presentation of our historical facts.
“Five Broken Cameras” is a worth watching documentary on a Palestinian farmer's chronicle of his nonviolent resistance to the actions of the Israeli army, directed by Emad Burnat and Guy Davidi. It deals with how the things are happening and being shown. Finally I remember and want to believe a philosophical couplet :
है देखने का जौक़ तो आँखों को बंद कर
है देखना वही कि न देखा करे कोई.


मित्रो ! ज़रूर पढ़ें।
मोबाइल और बूढ़े की झल्लाहट
बल्लहौं कय बेटा मोबाइल कीनाय दीहिस
झूट्ठो कय हमरा इ फेरा लगाय दीहिस।
तीस बेर टीपो ते एक बेर लगता है
दू बात बोलै में चार बेर कटता है।
एत्ता न झंझट है टीप-टाप दाबै के
इन्ने उगाबै कय उन्ने मेटाबै के।
हरदम भुलाते हैं नम्बर लगाबै में
बौख-बौख जाते हैं मैसेज बनाबै में।
का बोलें पोता जे दू दिन कय छौरा है
सेटिंग लगाबै में बुरबक बनाय दीहिस
बल्लहौं कय बेटा...
हफ्ता में चायर (4) दिन टाबरे नै रहता है
जब भी लगाओ त स्विच ऑफ कहता है।
उनको बताना था बात बड़ा निजी है
उन्ने से बोल दीहिस रूट इज बिजी है।
का बोलें टॉपअप से ऑफर कय चक्कर का
मिश्री रंग बोली में हमको फसाय लीहिस
बल्लहौं कय बेटा...
अलगे कहानी है घर कय जनानी के
खिस्सा सुनाबै कय, नौता-पिहानी के।
फोने पर दायल-भात-सागो बतियाबै के
घंटा भैर समधिन सय झूट्ठो फरियाबै के।
दाँती लग जाता है कूपन भराबै में
सच्चे सनिच्चर कय फेरा लगाय दीहिस
बल्लहौं कय बेटा...
को-को दिन कमबख्त इ बड्डी सताता है
इन्ने लगाते हैं, उन्ने लग जाता है।
हम तो लगाये थे लालमणि देबी को
जाकर के लग गया बॉबकट बेबी को।
गाली से धो दिया बोल्ड हिट गाली में
सोचो तो फील हुआ कैसा बुढ़ारी में।
लुच्चा-लफंगा-कमीना तक बोल दिया
लुच्चा-लफंगा-छुछुंदर तक बोल दिया
ऊप्पर से गुंडा कय तोहमत लगाय दीहिस
बल्लहौं कय बेटा मोबाइल कीनाय दीहिस
झूट्ठो कय हमरा इ फेरा लगाय दीहिस।
- सलिल (मुंगेर के लोकप्रिय कवि, जिनके साथ 2011 में पूरबसराय में मैंने एक मंच साझा किया था और कविता की भाषा पर अपनी राय रखी थी।)