जेएनयू में हितेन्द्र पटेल के चर्चित उपन्यास चिरकुट पर हुई उर्वर चर्चा पर एक रिपोर्ट
जेएनयू में हितेन्द्र पटेल के चर्चित उपन्यास चिरकुट पर हुई
उर्वर चर्चा पर एक रिपोर्ट, जो मैंने 2013 में लिखी थी। आज यूँ ही कम्प्यूटर में
दुबकी हुई, गुमसुम-सी मिली, तो सोचा आपसे साझा करूँ।
साहित्य को कुछ मानदंडों से होकर गुज़रना होता है, जिनसे
उपन्यास चिरकुट में हमारा साक्षात्कार होता है। बहुत बड़े फलक को छूने की
कोशिश है, चिरकुट । “यह समय ही इतना बदहाल, फटेहाल, त्रस्त और तंग हो
चुका है कि वह बार-बार आदमी से टकराता है, उसके साथ चल नहीं पाता। आदमी का मानस
संवेदनाशून्य हो गया है। वायवीय क़िस्म की भौतिकता है। अंतर्जगत की बाह्य जगत से
टकराहट अंत तक चलती है, स्थिरता नहीं आती। भीतर के स्वप्न व आकांक्षाएँ बाहरी
दुनिया में आकर चूर हो जाते हैं। लोग मस्त, व्यस्त और त्रस्त हैं। समाज से जुड़ाव
खत्म हो रहा है। महानगर ख़ुद में ही एक त्रासदी है। नायक दिलीप समय से टकरा रहा
है। सावधान और सुधी पाठक उपन्यास के राजनीतिक संदर्भों को निश्चय ही पकड़ लेंगे।
एनजीओ की पूरी व्यवस्था को अनावृत्त करने की कोशिश की गयी है। स्त्री पात्र निजता
के लिहाज़ से थोड़े व्यक्तित्वहीन लगते हैं”। ये बातें 31 अगस्त, 2013 को जेएनयू, नयी
दिल्ली में प्रखर समाजशास्त्री मणीन्द्रनाथ ठाकुर की अध्यक्षता में आयोजित नयी
किताब प्रकाशन से छपे हितेन्द्र पटेल के प्रासंगिक उपन्यास चिरकुट की
उर्वर समीक्षा के दौरान लब्धप्रतिष्ठ लेखिका व दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की
प्राध्यापिका डॉ. अल्पना मिश्रा ने कहीं।
व्यंजनात्मक शीर्षक, अंत तक जिज्ञासा बनाये रखने की खूबी एवं पाठकीय
दृष्टि से सहज, सामान्य व स्वाभाविक भाषा – ये खासियत पाठकों को आकृष्ट करती हैं
और बाँधे रखने में कामयाब होती हैं। उपन्यास बिखरी हुई घटनाओं का समावेश है। बाबा
और पुनः जेपी की खोज से आरम्भ हुआ उपन्यास सम्पूर्ण क्रान्ति की चर्चा के साथ आगे
बढ़ता है। इसमें कई चीज़ें छिपी हुई हैं, जो पाठकों को उकसाकर छोड़ती हैं। अनुभव
की संरचना गढ़ने में पॉप्युलर कल्चर की भूमिका है। सिनेमा का बखूबी इस्तेमाल इसमें
दिखता है।
विमर्श को आगे बढ़ाते हुए श्री विभाष ने कहा, “50-60 के दशक में लघु मानव की बात होती
थी। श्रेष्ठता, उपादेयता और महत्ता को सामने लाया जाता था। अब चिरकुटपन या
क्षुद्रता आ गयी है। यह यूटोपिआ के नष्ट होने का समय है। यहाँ दिलीप हर चीज़ से
जुड़े रहने पर भी ख़ुद को असंबद्ध पाता है। अलग तरह की अजनबीयत से वह जूझता है। यह
संबंधहीनता और विश्रृंखलता स्मृतिहीनता को जन्म देती है। यहाँ जीवन में विचारधारा
की तलाश है। मनोविश्लेषणात्मक कसौटी पर देखें, तो पात्रों के बारे में पूरी
जानकारी इसलिए नहीं मिल पाती कि वे आनन्द से विभोर नहीं हो पाये, दर्द से तड़प
नहीं पाये। वे किसी के साथ ख़ुद को संबद्ध नहीं कर पाते, आगे बढ़ते जाते हैं। उस
स्त्री के मनोलोक में उतरने से पुरुष पात्र बचना चाहता था, जिसके साथ उसका बस
शारीरिक संबंध था। जीवन में अनुभव की क्षमता घटती चली जाती है।”
इस उपन्यास में उठाये गये मुद्दे हमारी पीढ़ी के
मुद्दे हैं। जामिआ मिल्लिआ इस्लामिया के शोधार्थी व युवा विश्लेषक अकबर रिज़वी ने कहा
कि इसे कुछ पाठक मिलेंगे, जो राजनीति को कथा से जोड़ने से नहीं हिचकते। डॉ.
विधानचंद्र रॉय और श्रीकृष्ण सिंह के द्वारा बंगाल और बिहार के विलय के प्रयास की
चर्चा से इसे बल मिलता है। आध्यात्मिकता बनाम सामाजिकता की बहस है और ये द्वन्द्व
कई ज़गह स्पष्टता से, तो कहीं-कहीं सूक्ष्मता से दृष्टिगोचर होता है।
ज्ञान-मीमांसा को प्रभावित करने वाले कारक मौजूद हैं। कथा-विन्यास उतना ही
उच्छृंखल है, जितना मानव जीवन।
इतिहास की सीमाओं का अतिक्रमण करने में उपन्यास की ज़्यादा भूमिका
होती है। यह बड़े सवालों को संबोधित करता मानीखेज़ उपन्यास है। “वो आदमी, जो सरकारी
नौकरी नहीं करना चाहता, बाबा की खोज में रहता है, वह सरकारी नौकरी करनेवालों की
नज़र में चिरकुट ही तो है”। ऐसा कहते हुए श्री संजीव ने विमर्श को एक नयी
दिशा दी। उनकी राय में अगर उपन्यास सूचनात्मक न होकर, नाटकीय शैली में लिखा जाता,
तो बेहतर होता। सवाल भले ही उपन्यास में ज़्यादा आगे बढ़ते हुए न दिखें, पर इन
संवेदनशील प्रश्नों को उठाये जाने का अंदाज़ बड़ा ज़बरदस्त है।
श्री देवेन्द्र ने कहा, “क्या कोई चिरकुट दर्शन हो सकता है ? समय के परिवर्तन के
आयाम को फ्रॉयडिअन मनोविश्लेषण से समझा जा सकता है”। उन्होंने यहाँ ‘बाबाडम’ के प्रसार के दुष्प्रभाव की ओर संकेत
किया। पुनः, तॉल्सतॉय को उद्धृत करते हुए कहा, “शहर में स्वयं को मृत समझकर कोई बहुत
दिनों तक जीवित रह सकता है”। वाकई, इस चिरकुट समय में रहकर कोई व्यक्ति
कितना नॉन-चिरकुट रह सकता है, ये महत्वपूर्ण है।
इंडिया टूडे के कार्यकारी सम्पादक श्री दिलीप मंडल ने कहा – ‘चिरकुट’ शब्द मुझे चिंतित
कर रहा है। भारतीय समाज के हिसाब से देखें, तो इससे अच्छा समय और क्या हो सकता है
जबकि समाज का बड़ा तबका शिक्षा से जुड़ रहा है, लैंगिक भेदभाव शनैः-शनैः कम हो रहा
है, उपेक्षित व शोषित वर्ग के लोग हर क्षेत्र में बराबर के साझीदार हो रहे हैं ?
इस समय को चिरकुट
कहना इस समाज की मौजूदा उपलब्धि को खारिज़ करना है। उपन्यासकार ने निश्चय ही अलग
निहितार्थ को ध्यान में रखकर यह नाम चुना है।
मैं भी यहाँ दिलीप मंडल से इस मायने में सहमत हूँ कि वस्तुतः समय तो
शाश्वत है, उसमें वक्रता या व्यतिक्रम कैसे आ सकता है ? बेशक कोई दौर बुरा हो सकता है, पर समय को
कोई कैसे चिरकुट ठहराये ?
कार्यक्रम में संवेद फाउंडेशन के न्यासी अखलाक़ आहन, सबलोग के सहायक संपादक राजन अग्रवाल व संवेद
के सहायक संपादक पुखराज जाँगिड़ मौजूद थे। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में
मणीन्द्रनाथ ठाकुर ने चिरकुट को समग्रता व सम्यकता के साथ संपूर्ण
परिप्रेक्ष्य में देखने की बात कही। धन्यवाद-ज्ञापन करते हुए नयी किताब प्रकाशन
के प्रमुख एवं संवेद व सबलोग के संपादक किशन कालजयी ने प्रचंड
बाज़ारवाद व उत्तर-आधुनिकतावाद तथा इनके ख़तरे की ओर इशारा किया।
इस तरह, चिरकुट समसामयिक सामाजिक सन्दर्भ में कई वाजिब और
गम्भीर सवालों को सशक्तता के साथ हमारे सामने रखता है एवं चिन्तन, मानसमंथन व
आत्म-विमर्श हेतु बाध्य कर देता है।
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