Wednesday, 18 February 2015


                                                बिहार की पल-पल बदलती सियासत


एक ऐसे दौर में जबकि सियासत शनैः-शनैः अपनी स्वाभाविक स्वायत्तता खोती जा रही है; बिहार का मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य और भी चिन्ता पैदा करता है। लोकतंत्र की जड़ों की मज़बूती हेतु दलीय पद्धति का सेहतमन्द रहना भी उतना ही आवश्यक है. ग्लेडस्टोन ने सच ही कहा था, "एक नेता अगले चुनाव के बारे में सोचता है, जबकि एक राजनेता अगली पीढ़ी के बारे में". ये वक़्त विश्वासों के टूटने का नहीं, वरन विश्वासों को जानने का है. बेंजामिन डीजरैली अपनी कृति "सिविल" में कहते हैं, "ये दुनिया राजनेताओं के लिए परेशान है, जिन्हें लोकतंत्र ने राजनितिज्ञों में अवनत कर दिया है."

 बिहार की राजनीति के क्रीड़ांगन में हर किसी ने नियमों का, मान्यताओं का व सियासी पाकीज़गी का मज़ाक उड़ाया है। ये ऐसा उपन्यास है, जिसमें हर एक किरदार ने हर दूसरे पात्र को किसी-न-किसी मोड़ पर धोखा दिया है। देश को हर मुसीबत में परिवर्तन के पहिए के लिए ज़मीन मुहैया कराने वाला बिहार आज राजनीतिक संकट से गुज़र रहा है। कोई इसे नीतीश कुमार की व्यक्ति की परख की विफलता के रूप में देख रहा है, तो कोई माँझी की अतिशय महत्वाकांक्षा व छिछली अवसरवादिता के रूप में, तो कोई इसे दलित राजनीति के नये उभार के रूप में, तो कोई दलित राजनीति की आड़ में भाजपा की अपनी स्वार्थसिद्धि के सहज साधन के रूप में। जिनकी याद्दाश्त थोड़ी ठीक-ठाक है, वो भाजपा के अकस्मात उमड़े परिस्थितिजन्य दलित-प्रेम के निहितार्थ को बखूबी समझ सकते हैं। वो शायद नहीं भूले होंगे कि यही भाजपा (संघ) है, जिसने जननायक कर्पूरी ठाकुर के साथ गालीगलौज करते हुए रामसुंदर दास को आगे कर अपना दाँव चला था। ये कोई पहला मौका नहीं है, जब भाजपा का दिल दलित के लिए धड़क रहा है। प्रतीकों को भुनाने के क्रम में पटेल, गाँधी के बाद भाजपा अब बिहार में पूरी बेशर्मी के साथ कर्पूरी की ओर लार टपकाते हुए देख रही है। पर, ये तो बिहार की उर्वर राजनीतिक ज़मीन है, जनाब। यहाँ इतनी आसानी से जोड़, जुगत, जुगाड़, तिकड़म, छल-प्रपंच या षड्यंत्र से किसी की दाल नहीं गलती।

बहरहाल,  माँझी दरअसल आज वही कर रहे हैं, जो कभी नीतीश ने किया था। आइए, आपको 90 के दशक के पूर्वार्द्ध में लिए चलता हूँ। पटना के गाँधी मैदान में जनता दल ने कुर्मी जाति एकता सम्मेलन आयोजित किया था और लालू प्रसाद को इसे संबोधित करना था। किन्तु, ऐन वक़्त पर उन्होंने नीतीश कुमार को अपना प्रतिनिधि बनाकर भेज दिया। उस सम्मेलन में लालू यादव के नहीं आने की ख़बर से अफरातफरी मच गयी। पर, जैसे ही नीतीश ने बोलना शुरू किया, लोग धीरे-धीरे शांत हुए और जब नीतीश कुमार का भाषण खत्म हुआ, कुर्मी समाज को उनका भरोसेमंद नेता मिल चुका था। कुछ विश्लेषक इसे लालू प्रसाद की पहली सियासी चूक मानते हैं। बिहार की राजनीति में जातीय गोलबंदी का एक नया खेल यहीं शुरू हो गया। नीतीश को लगने लगा कि लव-कुश (कोयरी-कुर्मी) समाज को संगठित कर वो जनता दल में ताकतवर चेहरा बन सकते हैं। ज़ाहिर है, 1977 से विधानसभा का कई चुनाव हारने के बाद जब 89 में पहली बार वे लोकसभा पहुँचे थे, तो वी.पी. सिंह सरकार में उन्हें बतौर राज्य मंत्री काम करने का तज़ुर्बा भी हासिल हुआ। इसके पहले युवा लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते उन्हें सांगठनिक दक्षता भी प्राप्त थी। जब तक नीतीश लालू प्रसाद के कनीय साथी की भूमिका में रहे, सब ठीक चलता रहा। पर, जैसे ही लालू प्रसाद को नीतीश की सियासी हसरत  की भनक लगी व जुदा राजनीतिक शैली का अहसास हुआ, उन्होंने पार्टी के अंदर नीतीश पर अंकुश लगाना शुरू किया।

एक बार बिहार भवन में ललन सिंह के साथ किसानों की कुछ माँग को लेकर पहुँचे नीतीश से मुलाकात के क्रम में ज्योंहि ललन सिंह ने लालू जी के मिज़ाज को भाँपे बगैर कुछ बोलना चाहा, लालू प्रसाद ने सीधे कमरे से बाहर कर दिया। फिर क्या था, यहीं से नीतीश और लालू के बीच कड़वाहटें बढ़ने लगीं, दरारें पनपने लगीं। और, जैसे ही जॉर्ज साहब का वरदहस्त प्राप्त हुआ, नीतीश ने बागी तेवर अपनाते हुए समता पार्टी का गठन कर डाला। पर सामाजिक न्याय के तानेबाने में लालू के किले को हिलाना उस वक़्त लगभग नामुमकिन-सा था। शुरूआती ज़बरदस्त चुनावी झटकों ने नीतीश को अहसास करा दिया कि बगैर किसी मज़बूत साथी के लालू प्रसाद की सत्ता को चुनौती देना इतना आसान नहीं। यहीं वो भाजपा का दामन थमते हैं और  शनैः शनैः बिहार की सियासत की नयी इबारत लिखने में  जुट जाते हैं। और, आज आलम ये है कि 17 साल की साथी रही भाजपा की शातिराना सक्रियता ने नीतीश की नींदें उड़ा दी हैं।

 जो लोग आज नीतीश कुमार के साथ माँझी की ज़्यादती को भावुकता के चश्मे से देखते हैं, वो शायद भूल रहे हैं कि अपने उन्नय व पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र को कुचलने के लिए, विरोध के हर संभव स्वर को तहस-नहस करने हेतु नीतीश ने हर अनैतिक काम किया। जिस जॉर्ज फर्णांडीस ने नीतीश को 'बाल गाँधी' की छवि अता की, उन्हीं का टिकट चाटुकारों के कहने पर 2009 के लोकसभा चुनाव में मुज़फ्फरपुर से काट दिया। कद्दावर और शिक्षाविद् नेता दिग्विजय सिंह का टिकट काटकर उन्हें अपमानित किया। हालाँकि उन्होंने बाँका से निर्दलीय चुनाव जीतकर नीतीश कुमार को करारा सियासी तमाचा जड़ा और साबित किया कि जनतंत्र में जनता किसी की जागीर नहीं हुआ करती। पार्टी अध्यक्ष शरद यादव, जो तीन-तीन राष्ट्रीय सरकार / गठबंधन के संयोजक रहे, तीन अलग-अलग राज्यों (मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार) से लोकसभा का चुनाव जीतने वाले इकलौते सांसद हैं और राजनीतिक संकट-प्रबंधन के कुशल योद्धा हैं; के परामर्श की भी नीतीश पूरी तरह अनदेखी करते रहे हैं।
बहुत वक़्त नहीं हुआ, जब यही नीतीश कुमार अपनी सरकार को बचाने हेतु लालू प्रसाद की पूरी पार्टी को तोड़ने में लगे हुए थे। उसके पूर्व रामविलास पासवान की लोजपा के विधायक दल का ही छलपूर्वक अपने दल में विलय करा लिया था। थोड़ा और अतीत में लौटें, तो 2005 में पासवान के 29 विधायकों में 17-18 विधायकों को तोड़कर अपने पक्ष में कर लिया और लोक जनशक्ति पार्टी टूटते-टूटते बची थी। उस वक़्त नरेंद्र सिंह लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे और पार्टी को पॉकिट में लेकर चलते थे। आज वही नरेंद्र सिंह माँझी को ताड़ पर चढ़ाकर नीतीश को मुँह चिढ़ा रहे हैं। बिहार के लोग कहते हैं कि ऐसा निर्लज्ज नेता बिहार में कम ही पैदा हुआ है।
अब बात करते हैं उस दौर की, जब बिहार में लालू प्रसाद की तूती बोलती थी और कांग्रेस को उन्होंने उखाड़कर बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया था। पर, सरकार भाजपा के समर्थन से बनायी थी। जब भाजपा ने समर्थन वापस लिया, तो सरकार पर संकट आ गया। एक वो भी समय आया, जब कटिहार से कांग्रेस के दिग्गज नेता सीताराम केसरी को हराकर देश की राजनीति में बहुचर्चित हुए ज्ञानेश्वर यादव को अपने पाले में करके लालू प्रसाद ने भाजपा के कई विधायकों को जनता दल में मिला लिया। बसपा, आदि छोटी पार्टियों का अपने 'प्रताप' से (ये लालू जी का ही शब्द है) अपने दल में सीधे विलय ही करा लेते थे। ज़ाहिर है, इस राजनीतिक कुकर्म में उस वक़्त शरद यादव, रामविलास पासवान, आदि भी उनके साथ थे। पर, जब लोकसभा का चुनाव आया, तो लालू जी ने ज्ञानेश्वर यादव को ये कहते हुए बेटिकट कर दिया कि जो आदमी भाजपा का नहीं हुआ, वो मेरा क्या होगा। ज़ाहिर है, ये आह आगे चलकर लालू प्रसाद को ऐसी लगी कि आज उन्हें राजनीतिक वनवास झेलना पड़ रहा है। जिस कांग्रेस के खिलाफ़ उनकी राजनीति शुरू हुई थी, उसी  कांग्रेस के साथ वो केंद्र सहित राज्य में सत्ता के साझीदार रहे. एक बार फिर जनता परिवार का एकीकरण परिस्थितिजन्य राजनीति की ओर संकेत कर रहा है. इस प्रयोग का प्राप्य व प्रतिफल फिलवक्त भविष्य के गर्भ में है, किन्तु निरंतर नयी किस्म की सियासत की प्रयोगशाला रही बिहार की उर्वर ज़मीन अपने सियासी हलधर के निष्ठाहीन व प्रतिबद्धताविहीन कर्म से खुश्क नज़र आ रही है.
आज वही शकुनी चौधरी नीतीश के लिए वाकई शकुनी साबित हो रहे हैं, जिनके बेटे सम्राट चौधरी को उन्होंने लालू की पार्टी से तोड़कर अपनी तरफ किया था और माँझी के मंत्रीमंडल में नगर विकास मंत्री बनवाया। वो तो समय रहते लालू का तगड़ा सूचना तंत्र नीतीश के कुत्सित मंशे पर पानी फेर गया, वरना लालू की पार्टी को टूटने से कोई बचा नहीं सकता था। नीतीश कुमार को जो निकट से जानते हैं, वे ये मानते हैं कि नीतीश अपने विरोधियों को नेस्तनाबूद करने में पूरी निष्ठुरता व निर्ममता से प्रहार करते हैं। हर स्तर पर गिरकर अपनी सारी ऊर्जा झोंककर, तमाम सियासी शस्त्रास्त्रों का प्रयोग कर मैदान में उतरते हैं और कई बार न्यूनतम राजनीतिक शालीनता व राजधर्म भी भूल जाते हैं।
जिसने तहज़ीबे-मोहब्बत कभी देखी ही नहीं
उसके मेयारे-अदावत में मराआत नहीं।
- डॉ. मसऊद अहमद
2009 में रामविलास पासवान को हाजीपुर में हराने के लिए अपनी तरफ से कई पासवान उम्मीदवारों को आर्थिक साधन से लैस कर निर्दलीय लड़वाया। सभी निर्दलीय प्रत्याशियों को कुल मिलाकर 52 हज़ार के आसपास वोट मिले और पासवान मात्र 38 हज़ार वोटों से पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास से हारे। फिर, समस्तीपुर से पासवान के छोटे भाई रामचंद्र पासवान के खिलाफ नीतीश ने पासवान के ही ममेरे भाई महेश्वर हज़ारी को घर में ही आग लगवाकर उतारा और लगातार दो बार से जीत रहे रामचंद्र बुरी तरह हारे। पाटलिपुत्र से लालू प्रसाद के विरुद्ध उनके कभी अति निकटस्थ रहे व बाद में धुर विरोधी हो चुके रंजन यादव को लोजपा से तोड़कर अपने दल में लाकर चुनाव लड़ा दिया और लालू के खिलाफ हर दाँव चलकर उन्हें शिकस्त दिलायी।
फिर, 2010 के बिहार विधानसभा के चुनाव में बिहार के 20 से अधिक ज़िले में कुर्मी जाति के जिलाधिकारी व आरक्षी अधीक्षक को तैनात किया। कथित तौर पर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर, ईवीएम मशीन में छेड़छाड़ कराकर परिणाम को अपने पक्ष में कराने में अप्रत्याशित ढंग से कामयाब रहे और इस षड्यंत्र में भाजपा भी बराबर की साझीदार रही (ध्यातव्य : ईवीएम प्रकरण पर पहले एक पोस्ट लिख चुका हूँ)। रामविलास पासवान के गृह विधानसभा अलौली, जहाँ से वो 1969 में कद्दावर कांग्रेसी नेता मिश्री सदा (जो बाद में शिक्षा राज्य मंत्री भी बने थे) को हराकर विधानसभा पहुँचे थे, में पासवान के मँझले भाई पशुपति कुमार पारस, जो 1977 से लगातार (एक बार छोड़कर) जीत रहे थे (द्रष्टव्य : 2000 में जबकि नीतीश चंद दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे, तो उनके साथ  श्री पारस का उपमुख्यमंत्री बनना लगभग तय था) ; के विरुद्ध रामचन्द्र सदा को उतारा। यहाँ से श्री पारस को हराने के लिए नीतीश ने पूरे बिहार से हर जाति व धर्म के नेताओं को लाकर अलौली में कैम्प करा दिया और अपना स्तर गिराकर इस मकसद में कामयाब रहे। इतना ही नहीं, पासवान के पटना के ह्वीलर रोड स्थित पार्टी कार्यालय को वहाँ से हवाई अड्डे की निकटता व कुछ नियमों का हवाला देकर विस्थापित कराने के लिए नीतीश ने एड़ी चोटी एक कर दिया। मगर इसमें उन्हें मुँह की खानी पड़ी।
इतना कुछ कहने का मेरा सिर्फ और सिर्फ यही अभिप्राय है कि नीतीश अपनी तमाम अच्छाइयों व विकासोन्मुख समाजवाद के स्पष्ट दर्शन के बावजूद आरम्भ से ही 'अगली ईगो' और 'अटेंशन सीकिंग सिंड्रोम' के शिकार रहे हैं। यही वजह है कि बिहार मे पूर्व से मौजूद प्रभावी सामाजिक ताने-बाने को क्षणिक वोटबैंक की राजनीति की नयी परिभाषा के दायरे में बाँधने के चक्कर में वे लगातार अपना प्रभाव खोते रहे। उन्हें पता भी नहीं चला और उनकी छवि दरकती चली गयी। रामविलास पासवान के पर कतरने के लिए जिस दलित समाज में दो फाड़ करने का अदूरदर्शी क़दम उन्होंने उठाया, लालू प्रसाद की सियासी ताक़त व उनके राजनीतिक समीकरण को निष्प्रभावी कर उन्हें किनारे लगाने के लिए जिस पिछड़े वर्ग को दो भाग में विभाजित करने का दुस्साहस किया; आज वही दाँव उनके लिए उल्टा पड़ रहा है। पासवान ने शुरु में कहा था कि 'महादलित' शब्द ठीक वैसे ही अपमानजनक है, जैसे 'महाचंडाल'। पहले बिहार में अगड़े व पिछड़े की लड़ाई, संसाधन पर हक़ व प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष की वर्षों पुरानी दासतां लिखी-सुनाई जाती थी, चौक-चौराहे, स्कूल-कॉलिजों में ये आवाज़ गूँजती थी। पर, आज बिहार में दलित और महादलित के बीच अघोषित टकराव है, पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग में अंतर्संघर्ष व विद्वेष है।  आदिवासी अपने वज़ूद की रक्षा हेतु निरंतर संघर्षरत रहकर जल, जंगल व ज़मीन की जंग में सत्ता के गलियारों के इन कोलाहलों से लगातार दूर हो रहे हैं। आखिर, सामाजिक समरसता की लड़ाई को कमज़ोर करने के लिए कौन ज़िम्मेदार ? आज ये सवाल बिहार की भावुक व मासूम जनता रहनुमाई व रहबरी का दावा करने वाले अपने 'मसीहाओं' से पूछना चाहती है।
शुक्रिया ए क़ातिल, ए मसीहा मेरे
ज़हर जो तूने दिया, वो दवा हो बैठा।
एक तू ही नहीं जो मुझसे खफा हो बैठा
मैंने जो संग तराशा, वो ख़ुदा हो बैठा।
- अज्ञात

पर, तमाम व्यवस्थागत विचलन, अनियमितताओं व विसंगतियों के बावजूद रजनी कोठारी के ये शब्द आश्वस्त करते हैं कि जमहूरियत अपनी हिफाज़त ख़ुद कर लेगी.

Monday, 16 February 2015




           जेएनयू में हितेन्द्र पटेल के चर्चित उपन्यास चिरकुट पर हुई उर्वर चर्चा पर एक रिपोर्ट     




जेएनयू में हितेन्द्र पटेल के चर्चित उपन्यास चिरकुट  पर हुई उर्वर चर्चा पर एक रिपोर्ट, जो मैंने 2013 में लिखी थी। आज यूँ ही कम्प्यूटर में दुबकी हुई, गुमसुम-सी मिली, तो सोचा आपसे साझा करूँ।


साहित्य को कुछ मानदंडों से होकर गुज़रना होता है, जिनसे उपन्यास चिरकुट  में हमारा साक्षात्कार होता है। बहुत बड़े फलक को छूने की कोशिश है, चिरकुट यह समय ही इतना बदहाल, फटेहाल, त्रस्त और तंग हो चुका है कि वह बार-बार आदमी से टकराता है, उसके साथ चल नहीं पाता। आदमी का मानस संवेदनाशून्य हो गया है। वायवीय क़िस्म की भौतिकता है। अंतर्जगत की बाह्य जगत से टकराहट अंत तक चलती है, स्थिरता नहीं आती। भीतर के स्वप्न व आकांक्षाएँ बाहरी दुनिया में आकर चूर हो जाते हैं। लोग मस्त, व्यस्त और त्रस्त हैं। समाज से जुड़ाव खत्म हो रहा है। महानगर ख़ुद में ही एक त्रासदी है। नायक दिलीप समय से टकरा रहा है। सावधान और सुधी पाठक उपन्यास के राजनीतिक संदर्भों को निश्चय ही पकड़ लेंगे। एनजीओ की पूरी व्यवस्था को अनावृत्त करने की कोशिश की गयी है। स्त्री पात्र निजता के लिहाज़ से थोड़े व्यक्तित्वहीन लगते हैं। ये बातें 31 अगस्त, 2013 को जेएनयू, नयी दिल्ली में प्रखर समाजशास्त्री मणीन्द्रनाथ ठाकुर की अध्यक्षता में आयोजित नयी किताब  प्रकाशन से छपे हितेन्द्र पटेल के प्रासंगिक उपन्यास चिरकुट  की उर्वर समीक्षा के दौरान लब्धप्रतिष्ठ लेखिका व दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्राध्यापिका डॉ. अल्पना मिश्रा ने कहीं।

व्यंजनात्मक शीर्षक, अंत तक जिज्ञासा बनाये रखने की खूबी एवं पाठकीय दृष्टि से सहज, सामान्य व स्वाभाविक भाषा – ये खासियत पाठकों को आकृष्ट करती हैं और बाँधे रखने में कामयाब होती हैं। उपन्यास बिखरी हुई घटनाओं का समावेश है। बाबा और पुनः जेपी की खोज से आरम्भ हुआ उपन्यास सम्पूर्ण क्रान्ति की चर्चा के साथ आगे बढ़ता है। इसमें कई चीज़ें छिपी हुई हैं, जो पाठकों को उकसाकर छोड़ती हैं। अनुभव की संरचना गढ़ने में पॉप्युलर कल्चर की भूमिका है। सिनेमा का बखूबी इस्तेमाल इसमें दिखता है।

विमर्श को आगे बढ़ाते हुए श्री विभाष ने कहा,50-60 के दशक में लघु मानव की बात होती थी। श्रेष्ठता, उपादेयता और महत्ता को सामने लाया जाता था। अब चिरकुटपन या क्षुद्रता आ गयी है। यह यूटोपिआ के नष्ट होने का समय है। यहाँ दिलीप हर चीज़ से जुड़े रहने पर भी ख़ुद को असंबद्ध पाता है। अलग तरह की अजनबीयत से वह जूझता है। यह संबंधहीनता और विश्रृंखलता स्मृतिहीनता को जन्म देती है। यहाँ जीवन में विचारधारा की तलाश है। मनोविश्लेषणात्मक कसौटी पर देखें, तो पात्रों के बारे में पूरी जानकारी इसलिए नहीं मिल पाती कि वे आनन्द से विभोर नहीं हो पाये, दर्द से तड़प नहीं पाये। वे किसी के साथ ख़ुद को संबद्ध नहीं कर पाते, आगे बढ़ते जाते हैं। उस स्त्री के मनोलोक में उतरने से पुरुष पात्र बचना चाहता था, जिसके साथ उसका बस शारीरिक संबंध था। जीवन में अनुभव की क्षमता घटती चली जाती है।

इस उपन्यास में उठाये गये मुद्दे हमारी पीढ़ी के मुद्दे हैं। जामिआ मिल्लिआ इस्लामिया के शोधार्थी व युवा विश्लेषक अकबर रिज़वी ने कहा कि इसे कुछ पाठक मिलेंगे, जो राजनीति को कथा से जोड़ने से नहीं हिचकते। डॉ. विधानचंद्र रॉय और श्रीकृष्ण सिंह के द्वारा बंगाल और बिहार के विलय के प्रयास की चर्चा से इसे बल मिलता है। आध्यात्मिकता बनाम सामाजिकता की बहस है और ये द्वन्द्व कई ज़गह स्पष्टता से, तो कहीं-कहीं सूक्ष्मता से दृष्टिगोचर होता है। ज्ञान-मीमांसा को प्रभावित करने वाले कारक मौजूद हैं। कथा-विन्यास उतना ही उच्छृंखल है, जितना मानव जीवन।

इतिहास की सीमाओं का अतिक्रमण करने में उपन्यास की ज़्यादा भूमिका होती है। यह बड़े सवालों को संबोधित करता मानीखेज़ उपन्यास है। वो आदमी, जो सरकारी नौकरी नहीं करना चाहता, बाबा की खोज में रहता है, वह सरकारी नौकरी करनेवालों की नज़र में चिरकुट ही तो है। ऐसा कहते हुए श्री संजीव ने विमर्श को एक नयी दिशा दी। उनकी राय में अगर उपन्यास सूचनात्मक न होकर, नाटकीय शैली में लिखा जाता, तो बेहतर होता। सवाल भले ही उपन्यास में ज़्यादा आगे बढ़ते हुए न दिखें, पर इन संवेदनशील प्रश्नों को उठाये जाने का अंदाज़ बड़ा ज़बरदस्त है।

श्री देवेन्द्र ने कहा, क्या कोई चिरकुट दर्शन हो सकता है ? समय के परिवर्तन के आयाम को फ्रॉयडिअन मनोविश्लेषण से समझा जा सकता है। उन्होंने यहाँ बाबाडमके प्रसार के दुष्प्रभाव की ओर संकेत किया। पुनः, तॉल्सतॉय को उद्धृत करते हुए कहा, शहर में स्वयं को मृत समझकर कोई बहुत दिनों तक जीवित रह सकता है। वाकई, इस चिरकुट समय में रहकर कोई व्यक्ति कितना नॉन-चिरकुट रह सकता है, ये महत्वपूर्ण है।

इंडिया टूडे के कार्यकारी सम्पादक श्री दिलीप मंडल ने कहा – चिरकुट शब्द मुझे चिंतित कर रहा है। भारतीय समाज के हिसाब से देखें, तो इससे अच्छा समय और क्या हो सकता है जबकि समाज का बड़ा तबका शिक्षा से जुड़ रहा है, लैंगिक भेदभाव शनैः-शनैः कम हो रहा है, उपेक्षित व शोषित वर्ग के लोग हर क्षेत्र में बराबर के साझीदार हो रहे हैं ? इस समय को चिरकुट कहना इस समाज की मौजूदा उपलब्धि को खारिज़ करना है। उपन्यासकार ने निश्चय ही अलग निहितार्थ को ध्यान में रखकर यह नाम चुना है।

मैं भी यहाँ दिलीप मंडल से इस मायने में सहमत हूँ कि वस्तुतः समय तो शाश्वत है, उसमें वक्रता या व्यतिक्रम कैसे आ सकता है ? बेशक कोई दौर बुरा हो सकता है, पर समय को कोई कैसे चिरकुट ठहराये ?

कार्यक्रम में संवेद फाउंडेशन  के न्यासी अखलाक़ आहन,  सबलोग  के सहायक संपादक राजन अग्रवाल व संवेद के सहायक संपादक पुखराज जाँगिड़ मौजूद थे। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में मणीन्द्रनाथ ठाकुर ने चिरकुट को समग्रता व सम्यकता के साथ संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में देखने की बात कही। धन्यवाद-ज्ञापन करते हुए नयी किताब प्रकाशन के प्रमुख एवं संवेद  व सबलोग  के संपादक किशन कालजयी ने प्रचंड बाज़ारवाद व उत्तर-आधुनिकतावाद तथा इनके ख़तरे की ओर इशारा किया।

इस तरह, चिरकुट  समसामयिक सामाजिक सन्दर्भ में कई वाजिब और गम्भीर सवालों को सशक्तता के साथ हमारे सामने रखता है एवं चिन्तन, मानसमंथन व आत्म-विमर्श हेतु बाध्य कर देता है।