Monday, 29 September 2014





                                         हैं और भी देशभक्त ज़माने में मोदीभक्तों के सिवा



लतांत प्रसून जी के पोस्ट पर कल की मेरी कुछ टिप्पणियों के आलोक में एक भद्र अप्रवासी भारतीय महिला ने मुझे अपनी टाइमलाइन पर मोदी जी की अवमानना नहीं करने की नसीहत दी है। मेरी राष्ट्रीय निष्ठा पर सवाल खड़ा किया है, मानो मोदी जी की विशिष्ट राजनीतिक धारा से इत्तफाक नहीं रखने वाले लोग कोई देशद्रोह कर रहे हों। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के सपरिवार अमेरिका-यात्रा को कोसते हुए मोदी जी के त्याग को ऐतिहासिक सिद्ध करने की कोशिश की है। केजरीवाल व दिग्विजय के कुछ आपत्तिजनक सियासी चलन का मुझसे हिसाब माँगा, गोया मैं इन पार्टियों का प्रवक्ता हूँ। पूरी पत्रकार- बिरादरी को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। मैं न तो किसी की असंसदीय भाषा का हिमायती हूँ, न किसी की गुंडागर्दी का पैरोकार। मैंने उनके कुछ प्रश्नों के जवाब कुछ इस तरह देने का प्रयास किया :
बहुत से भले लोग सभ्य भाषा में औरों को लगभग गाली ही देते है, तो क्या ऐसे तमाम लेखक व पत्रकार पिटने की पूरी पात्रता रखते हैं ? लोकतंत्र की पहली शर्त है, असहमति। तो क्या किसी पत्रकार के सवाल, विचार या उसकी प्रस्तुति से असहमति के प्रकटीकरण का ये तरीका है ?
किसी भी सूरत में इस घटना को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। और तब तो और नहीं, जब जादूगर साहब "मोहनलाल करमचंद गाँधी" के आदर्शों की बात करते हों। व्यक्ति-उपासकों के इस उग्र रवैये की मैं घोर निंदा करता हूँ, जो अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य पर चोट करता हो। मौन रहकर इस तरह के व्यवहार को प्रोत्साहन देने पर जनता भी प्रत्युपहार दिया करती है। मोदी जी तैयार रहें। जिसके अंदर विरोध के स्वर को सहने का भाव नहीं है, वो तानाशाह हो सकता है, राजनेता नहीं। कभी अपने सामने मुख्यमंत्री की हूटिंग होते देखना, तो कभी राज्यपाल के शपथ-ग्रहण समारोह में मोदी-मोदी के नारे लगवा देना, ये लक्षण ठीक नहीं लग रहे।

सतही तौर पर देखा जाये, तो भारतीय प्रधानमंत्री मोदी और राजदीप सरदेसाई के साथ हुए दुर्व्यवहार का सीधा-सीधा कोई संबंध नहीं है। पर क्यों न "मौनं सम्मति लक्षणं" माना जाये ? लगातार मोदी के उग्र और कतिपय उद्दंड व बदतमीज़ समर्थकों की हिमाकत क्या इशारा करती है? संप्रेषण की आज़ादी पर हमले की पुनरावृत्ति न हो, इस संदर्भ में मोदी की क्या कोई जवाबदेही नहीं बनती ?  मैं इस घटना की न केवल घोर भर्त्सना करता हूँ, बल्कि पत्रकार बंधुओं से इस मामले को गंभीरता से लेने का अनुनय भी करता हूँ।


महोदया ! क्षमा कीजिएगा, गाँधी-दर्शन की मीमांसा तो मोदी जी कर रहे हैं, मैं इस लायक नहीं हूँ। बाकी मोदी की राजनीति से असहमत होने वाले लोग बौद्धिक दिवालियापन का शिकार स्वाभाविक रूप से हो जाते हैं। इसमें कोई अचरज की बात नहीं। शुक्रिया !
जी नहीं, बिल्कुल नहीं। मैंने राज्यपाल के शपथग्रहण समारोह में भी मोदी-मोदी के नारे लगाने की चर्चा की है। प्रवासी भारतीयों के उदात्त भाव पर कोई टिप्पणी नहीं की है। मेरी आपत्ति उस अपसंस्कृति के पसरने को लेकर है, जो ज़रा-सा भी प्रतिकूल राय को ज़गह देने की स्थिति में नहीं है। ये असुरक्षा-भाव क्यों होनी चाहिए ? संवाद का स्तर हम क्यों नहीं ऊँचा उठा सकते ?
न तो किसी को गाली देने को हम युक्तिसंगत कह सकते हैं और न किसी की पिटाई-धुनाई की वकालत करने को यथोचित कह सकते हैं। जी, ये कोई नयी बात नहीं है। इसलिए चिंता होती है। जब मोदी जी का चुनाव प्रचार चल रहा था, उस समय भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के एक कार्यकर्ता, जो उस वक्त दिल्ली वि.वि. छात्रसंघ के संयुक्त सचिव भी थे, ने दिल्ली वि.वि. के एक प्राध्यापक को बात-बात में थप्पड़ जड़ दिया। ये हिंसक प्रवृत्ति हमें कहाँ लेकर जा रही है ?
मैं वोल्तेयर के इस कथन को जीने का प्रयास करता हूँ, "हो सकता है कि मैं आपकी हर बात से असहमत होऊँ, फिर भी आपके असहमत होने के अधिकार की रक्षा मैं ख़ून के आखिरी क़तरे तक करूँगा "।

संवादपालिका के क्षेत्र में विचलन को लेकर आपकी चिंता वाजिब है। ये अकारण नहीं है कि अंगुली हमारी तरफ उठ रही है। जी, मैं बहुत स्पष्ट हूँ कि न गाली देना ठीक है, न किसी को उकसाना और न ही मारपीट पर उतर जाना। पूरे परिप्रेक्ष्य में देखा जाये, तो ये व्यक्तिवादी संस्कृति का ही नतीज़ा है कि सवाल कोई भी पूछा जा रहा हो, जवाब एक ही है- मोदी, मोदी... अब बताइए, कोई पत्रकार ऐसे कोलाहल में किस तरह सवाल पूछ पायेगा ?


आपके कुछ सवालों का अनुत्तरित रह जाना ही ठीक रहेगा। आपने मनमोहन सिंह के सपरिवार विदेश जाने की बात कही। ऐसा शास्त्री जी भी किया करते थे और इसमें कोई बुराई नहीं है। बाकी जिस निष्काम कर्मयोगी मोदी जी के अकेले अमेरिका-भ्रमण की आप भूरि-भूरि प्रशंसा कर रही हैं, उसकी पृष्ठभूमि में मैं न जाऊँ, तो ही अच्छा रहेगा। आपकी अदालत में 2009 का उनका साक्षात्कार यू ट्यूब पर आपको मिल जायेगा, जिसमें मोदी जी ने ख़ुद को बड़े शान से अविवाहित बताया है। कभी समय मिले तो देख लिया जाय। बहुत-बहुत आभार !
हैं और भी देशभक्त ज़माने में मोदीभक्तों के सिवा। इसलिए, कृपया आप मेरी राष्ट्रभक्ति पर संदेह व संशय न करें। और मैं कांग्रेस पार्टी या आम आदमी पार्टी का प्रवक्ता नहीं हूँ, जो उनके कुकृत्यों या अनैतिक आचरण का बचाव करूँ। जब केजरीवाल का पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ विवादित साक्षात्कार सामने आया, तो ख़बरपालिका से जुड़े बहुत-से प्रतिबद्ध साथियों के साथ-साथ मैंने भी इसकी गहरी निंदा की व इसकी पत्रकारीय व्याख्या के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की भी बात कही। और केजरीवाल को तो चुनाव में इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। मोदी जी को शुभकामनाएँ ! उनके एजेंडे से यदि किसी का एजेंडा मेल न खाये, तो इसका मतलब ये कतई नहीं कि कोई राष्ट्रनिर्माण में नहीं लगा हुआ है। बाकी हर पेशे की तरह पत्रकारिता में भी न तो सारे लोगों की आस्था लोकतांत्रिक संस्था के प्रति है और न सारे लोगों की आस्था किसी दल या व्यक्ति-विशेष के प्रति। और आपके प्रति पूरे सम्मान के साथ बड़ी स्पष्टता से कहना चाहता हूँ fक भारत जैसे बहुलतावादी, विविधतावादी लोकतांत्रिक देश में अच्छे नागरिक होने के लिए मोदी के प्रति अंधभक्ति व वफादारी न्यूनतम अपेक्षित योग्यता नहीं है। धन्यवाद !

Saturday, 27 September 2014





शरतचंद्र का टीएनबी कॉलेज : उपलब्धियों के आईने में



12 फरवरी, 1883  को कलकत्ता विश्वविद्यालय के अंतर्गत स्थापित 132 साल पुराना महाविद्यालय तेज नारायण बनैली महाविद्यालय अनगिनत उतार-चढ़ाव देखते हुए आज उन्नयन व उत्कर्ष का अहसास लिए प्रज्ञात्मक परम्परा व बौद्धिक विरासत के साथ ज्ञान की उत्तरोत्तर समृद्धि के पथ पर निरंतर अग्रसर है।

मैं कहाँ रूकता हूँ अर्शो-फर्श की आवाज़ से
मुझको जाना है बहुत ऊँचा हदे-परवाज़ से।
- इक़बाल

 विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्वायत्त संस्था नैक (राष्ट्रीय मूल्यांकन व प्रत्यायन परिषद्) ने बिहार में विज्ञान की पढ़ाई सबसे पहले शुरु करने वाले तथा पटना कॉलेज, पटना के बाद राज्य के दूसरे सबसे पुराने महाविद्यालय टी.एन.बी. कॉलिज, भागलपर को 'ए' स्तर  का प्रमाणपत्र देकर अव्वल दर्ज़े के कॉलिजों की फेहरिस्त में शुमार किया है। किसी-न-किसी रूप में महाविद्यालय का अंग रहे व इसके जीवन को संवारने-निखारने-सहेजने में अपना योगदान देने वाले सभी भले मानुष को दिली बधाई !

आज देश में बमुश्किल 50-60 ऐसे संस्थान होंगे, जो इतने पुराने हों। सेंट स्टीवन'स कॉलिज, दिल्ली (स्थापना : 1881) भी टी.एन.बी. कॉलेज, भागलपुर से महज दो साल पुराना है। जब हम इस कॉलिज के गौरवशाली इतिहास पर एक नज़र डालते हैं, तो हम नैसर्गिक रूप से गौरवान्वित, रोमांचित व हर्षान्वित महसूस करते हैं। बांग्ला साहित्य के कालजयी शिल्पी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, प्रथम प्राचार्य हरिप्रसन्न मुखर्जी, सैमुअल जॉनाथन शॉ (इन्होंने थोड़े दिनों के लिए बतौर प्राचार्य सेंट स्टीवन'स कॉलिज, दिल्ली को भी संभाला था), राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त भौतिकीविद् श्री एस.के. मित्रा, प्रख्यात बीजगणितज्ञ के.पी.बसु, अल्ट्रा रीयल नम्बर की संकल्पना देने वाले दुनिया भर में चर्चित, लब्धप्रतिष्ठ गणितज्ञ डॉ. एस.एन.प्रसाद, कुशल नेतृत्व-क्षमता-संपन्न प्राचार्य डॉ. सुदर्शन, अंग्रेजी साहित्य के धुरंधर , कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, लंदन के ट्राइपॉस गोल्ड मेडलिस्ट एवं मशहूर साहित्यालोचक एफ.आर.लीविस (जिनसे वे अपने कैम्ब्रिज के दिनों में भी ख़ासे असहमत रहते थे)  के नज़दीकी दोस्त  डॉ. डी. ठाकुर, हिन्दी साहित्य के अमर प्राध्यापक श्री हरि दामोदर, दिनकर पर पहला आलोचनात्मक ग्रंथ लिखने वाले आचार्य शिवबालक राय, बिहार विभूति डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह, आदि ऐसे व्यक्तित्व के नाम हैं, जिन्होंने टीएनबी कॉलेज को टीएनबी कॉलेज बनाया।

 रोड्स कम्पीटिशन में सफलता प्राप्त कर कम उम्र में देश-दुनिया की ऐकडीमिअ में चर्चा में आने वाली काकुली घोष, एल.के.झा,  यहाँ एक साल पढाने वाले अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त भौतिकविज्ञानी मेघनाद साहा, प्रख्यात इतिहासविद् प्रो. आर.एस. शर्मा, सादगी व शालीनता की प्रतिमूर्ति, अंग्रेजी के प्राध्यापक डॉ. यू.एन. मल्लिक, यहाँ जीव विज्ञान धारा की स्थापना करने वाले प्रो. रामानंद सिंह, अविस्मरणीय विभागाध्यक्ष प्रो. विश्नाथ सिन्हा, सेवानिवृत्ति व कैंसर जैसी असाध्य बीमारी के बावजूद अद्भुत जीवटता, जीवन्तता व अदम्य जिजीविषा के प्रतीक के रूप में अभी भी अक्सर कक्षा लेने कॉलेज आने वाले  एक ऐसे इंसान, जो अध्यापन का पर्याय बन चुके हैं, जो पढ़ाये बिना ज़िन्दा नहीं रह सकते, यानि जन्तु विज्ञान के शानदार शिक्षक प्रो. ए.के.श्रीवास्तव , उर्दू के लोकप्रिय प्राध्यापक, शायर व बिहार सरकार के पूर्व मंत्री लुत्फ़ुर्रहमान साहब, वर्ल्ड ज़ूओलजिकल कॉन्फ्रंस की दो बार अध्यक्षता कर चुके प्रो. दत्ता मुंशी (हालाँकि तब तक टी.एन.बी. कॉलिज से इतर स्नातकोत्तर जंतु विज्ञान विभाग बन चुका था, फिर भी मातृ-संस्थान तो टी.एन.बी. कॉलिज ही था। अत: मैं उनका उल्लेख भी सश्रद्धा यहाँ करना चाहता हूँ), सम्प्रति कई देशों में फैले साधना औषधालय के संस्थापक सह विख्यात रसायन विज्ञानवेत्ता  प्रो. योगेश दत्त, आदि ऐसी शख्सियतें हैं, जिन्होंने टीएनबी कॉलेज को एक तरह से मौजूदा शक्ल में ढाला है, इसे राष्ट्रीय पहचान दी है।

अंग्रेजी साहित्य में अपनी सहज अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध व मेरे श्रद्धेय गुरुदेव, धर्मपिता सह "भागलपुर के डेनियल जॉन्स" डॉ. धीरज तपन कुमार दत्ता के गाइड डॉ. अजीत मिश्रा , अंग्रेजी के प्रकांड विद्वान, जिन पर भागलपुर वि.वि. का अंग्रेजी विभाग आने वाली कई पीढ़ियों तक गर्व कर सकता है- डॉ. वी.एन. मिश्रा,  ज्ञान बाँटने की सहज प्रवृत्ति से युक्त अंग्रेजी के मूर्धन्य विद्वान डॉ. डी. गांगुली, डी. ठाकुर के प्रिय शिष्य,  मेरे  उस्तादे-मोहतरम,  मैन आफ मेमरी, दत्ता साहब के शब्दों में "भागलपुर के अफलातून"  डॉ. मसऊद अहमद  (क्या नहीं याद है आपको ? आपने अलीगढ़ मुस्लिम वि.वि. पर श्याम बेनेगल द्वारा बनायी जा रही डॉक्यमेंट्री का थीम सॉंन्ग लिखा है, झारखंड- गान लिखा है तथा अंग्रेजी का प्राध्यापक होने के बावजूद उर्दू, फारसी, हिन्दी, अरबी व अंगिका में भी आप काव्य-धारा बहाते हैं), पूर्व प्राचार्य, बी.आर.ए.वि.वि., मुज़फ्फरपुर के पूर्व प्रतिकुलपति व , जर्मनी में शोध-कार्य करने वाले जाने-माने रसायनशास्त्री डॉ. एन.के.यादव 'इंदु', जे.एन.यू., नयी दिल्ली में स्कूल आफ इंटरनेशनल स्टडीज़ के अफ्रीकी अध्ययन केंद्र में प्राध्यापक व जेएनयू शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष, सहज सुलभ शख्सियत डॉ. एस. एन. मालाकार, दिल्ली वि.वि. के किसी कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक डॉ. सोमेश्वर सती , जेएनयू में उर्वर अध्ययन के पश्चात् एक अमेरिकी वि.वि. में टी.एस. एलियट पर शोध करने वाले डॉ. मुकेश रंजन, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार परिषद् के सदस्य डॉ. एस.सी.झा, बिहार सरकार के पूर्व मुख्य सचिव श्री ए.के.चौधरी, आदि न केवल यहाँ की उपज और राष्ट्र-निर्माण व मानवता के संपोषण-संवर्धन में अपना अप्रतिम योगदान देनेवाले भद्रजन हैं, अपितु हमारे अमूल्य धरोहर भी हैं।

महाविद्यालय में शांतिपूर्ण कक्षा-संचालन का आलम ये था कि जब एक बार एक अमेरिकी प्रफेसर टी.एन.बी. कॉलेज भ्रमण करने आये, तो सहसा बोल पड़े, " इज़ देअ होलिडे इन दिस कॉलिज" ? कोरिडॉ में यत्र-तत्र छात्र-छात्राएँ मंडराते हुए नहीं दिखते थे। और आज भी मुख्य भवन की सीढ़ी के सामने आपको लिखा हुआ दिख जायेगा, "अनुशासन ज्ञान की पहली सीढ़ी है"।

मौजूदा पीढ़ी के प्राध्यापकों की चर्चा करूँ, तो डॉ. कौशल किशोर झा (आपको सुनना चरम आनंद जैसा होता था), अंग्रेजी अध्यापन के बेताज बादशाह, एक ऐसे देदीप्यमान सितारे, जो बुझ कर भी नहीं बुझा करते; हमारे बीच से असमय चले जाने वाले शिक्षण की दुनिया के कीट्स डॉ. अखिलेश्वर ठाकुर ( आपकी विशिष्ट शिक्षण-विधि का मैं विशेष रूप से कायल रहा हूँ। सर, आप मेरे लिए क्या नहीं रहे हैं, फ्रेण्ड, फिलोसअ्फअ्, गाइड, सबकुछ !), डॉ. रामचंद्र घोष (मैं ख़ुशनसीब हूँ कि आपने मुझे इतने प्यार से पढ़ाया, जीवन-शक्ति का संचार किया। आज भी शुक्ल के "उत्साह" व द्विवेदी के "कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता" पर आपके मर्मस्पर्शी, मनोहारी व ओजस्वी व्याख्यान मेरे मानस पर ताज़ा हैं), "सादा जीवन, उच्च विचार" को अपना जीवन-दर्शन बना लेने वाले प्रखर सामाजिक व राजनीतिक चिंतक डॉ. योगेन्द्र, बड़ी सहजता से छात्रों को बहुत कुछ दे जाने वाले, अंग्रेजी साहित्य में स्नातक व स्नातकोत्तर दोनों में अपने बैच के टॉपर रहे  डॉ. विजयकान्त दास ( अपनी सेहत संबंधी परेशानी के बावजूद आपने हमें शेली की "ओड टू द वेस्ट विंड" नामक कविता पढ़ाई, जिसका नोट्स आज भी बहुत सहेज-संभाल कर रखे हुए हूँ ), अपने विद्यार्थियों के साथ सचमुच अपने बेटे जैसा व्यवहार कर सहज स्नेह देने वाले प्रो. आलोक चौबे , रोचक अंदाज़ में पढ़ाने वाले शिक्षक, जिनकी कक्षा में कमज़ोर-से-कमज़ोर छात्र भी ऊबता नहीं है -प्रो. मिथिलेश कुमार सिन्हा, बेहतरीन वक्ता व राजनीति विज्ञान की सूक्ष्म समझ रखने वाले कमाल के प्रज्ञावान प्राध्यापक डॉ. मनोज,  अभिभावक सरीखे डॉ. अंजनी राय,वनस्पतिविज्ञान के संवेदनशील शिक्षक जेएनयूआइट डॉ. एन. साह, डॉ. अरविन्द, दिलचस्प अंदाज़ में पढ़ाने वाले रसायन विज्ञान के बेहतरीन शिक्षक प्रो. आनंद शंकर सहाय, विशुद्ध विज्ञान- भौतिकी के संज़ीदा शिक्षक डॉ. गौतम चंद्रा,  अपने बैच के स्वर्ण-पदक प्राप्त छात्र रहे भौतिक रसायन विज्ञान के जानदार शिक्षक डॉ. ज्योतीन्द्र चौधरी, ऊर्जा से लबरेज युवा प्राध्यापक डॉ. राजीव, आदि ने गुरु-शिष्य परम्परा की जड़ को अपने स्नेह-जल से सींचा है।

 माँ-सा प्यार देने वाली, मेरे अंदर आत्मविश्वास जगाने वाली, मुझे कॉलेज में सुनने पर हमेशा प्यार से थपकी देकर अभिसिंचित करने वाली प्रातःस्मरणीया डॉ. नीलिमा (आप मेरे लिए एक प्राध्यापिका से कहीं ज़्यादा हैं, जो आप बख़ूबी जानती हैं। हर ख़ुशी, हर मायूसी साझा कर आपसे  मुट्ठी भर ऊर्जा लेता हूँ) , अत्यंत सहृदय व स्नेहमयी डॉ. रोमा सिन्हा (2010 में बिहार दिवस पर मुझे सुनने के बाद पहली बार आपने ही मुझे दिल्ली आकर पत्रकारिता की विधिवत् पढ़ाई करने की सलाह दी थी),  मेरी हर छोटी-बड़ी सफलता पर अख़बार में छपी ख़बर मुझसे भी पहले पढ़ कर फ़ोन पर मुबारकबाद देने वाली, बच्चों का ख़याल रखने वाली, वात्सल्यमयी डॉ. एस. ज़ेड ख़ानम , जीवन्त शिक्षण-शैली के लिए मशहूर डॉ. नरसिंह यादव, गतिशील शिक्षक प्रो. पी.एस. मिश्रा, सेवानिवृत्त प्राध्यापकों में सबसे स्मार्ट व अध्यापन को जीवन-धर्म मानने वाले प्रो. यू.के. सिन्हा, जेएनयू की जीवनशैली में रमे, सही मायने में सामाजिक प्राणी, प्राणी विज्ञान के प्राध्यापक डॉ. फारूख़ अली , पारिस्थितिकीय असंतुलन को लेकर बेहद सजग, ख़ुद साइकिल से चलकर छात्रों व अन्य शिक्षकों के सामने मिसाल पेश करने वाले तथा वृक्षारोपण के प्रति बच्चों में अभिरुचि जगाने वाले डॉ. के.सी.मिश्रा,  कर्मयोगी डॉ. कामाख्या प्रसाद, अमेरिका में वनस्पति विज्ञान में शोध करने वाले, बच्चों के बीच ख़ासे लोकप्रिय डॉ. एच.के.चौरसिया, छात्रों का उत्साहवर्धन करने वाले अपने बैच के गोल्ड मेडलिस्ट डॉ. प्रमोद कुमार वर्मा, बेजोड़ प्रयोगशाला-प्रदर्शक कुमार आशुतोष राजेश, आदि ने इस महाविद्यालय की कुशाग्र बौद्धिक विरासत को बख़ूबी संजोया है।

 उदार-सरल व्यक्तित्व व सौम्य-शालीन-सदाशयी नेतृत्व हेतु जगजाहिर, प्राचार्य के लिए अपेक्षित कड़ेपन के लिहाज़ से थोड़े कम सख्त, पर सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेकर ज़गह-ज़गह महाविद्यालय का परचम लहराने वाले छात्रों का विशेष ख़याल रखने वाले, छात्रों को अपने आवास पर बुलाकर डिबेटिंग ससायटी को और धारदार बनाने हेतु विमर्श करने वाले  डॉ. गोपाल प्रसाद यादव, टीएनबी कॉलेज के स्टैण्डर्ड को कायम रखने वाले जेएनयूआइट डॉ. मुस्फिक आलम, क्रीड़ा के प्रति आकर्षण पैदा करने वाले  जेएनयूआइट डॉ. हलीम अख्तर आदि ऐसी शख़्सियत हैं, जिन पर टी.एन.बी. कॉलिज नाज़ कर सकता है। नवलेखन का ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले अरुणाभ सौरभ जी जैसे अध्यवसायी साधक ने महाविद्यालय की उर्वर साहित्यिक परम्परा को नया आयाम दिया है, जिससे यहाँ साहित्य-सफर के नव पथिकों को नयी रोशनी मिलेगी।

हाँ, बदलते वैश्विक परिवेश में ये समय गर्वोन्मत्तता में डूब जाने का भी नहीं है। हमारी जवाबदेही व ज़िम्मेदारी बढ़ी है, कर्त्तव्य-बोध बढ़ा है। मानव संसाधन के सतत विकास तथा ज्ञानार्जन व इसके प्रसार की पूरी प्रक्रिया में यदि सुधी शिक्षक समुदाय, जिज्ञासु विद्यार्थी और संवेदनशील अभिभाभकगण परस्पर समन्वय व सहयोग से नूतन ऊर्जा व उमंग के साथ लगें, तो इस महाविद्यालय की चिरस्थापित गरिमा की आभा से पूरी मानवता जगमग हो सकती है। 2020 तक स्वप्नद्रष्टा डॉ. कलाम के विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने की दिशा में हम क़दम बढ़ायें व नागार्जुन के शब्दों में "मेरी भी आभा है इसमें" जैसा भाव जी सकें, इसके लिए कृतसंकल्प हों ! आइए, बदलते समय की अपेक्षाओं व युग-बोध के अनुरूप तरुण-मानस एवं युवा-मस्तिष्क की बेचैनी व छटपटाहट को समझते हुए हम अपनी भूमिका सुनिश्चित करें !
झाँकी उस नयी परिधि की जो दिख रही कुछ थोड़ी-सी,
क्षितिजों के पास पड़ी पतली चमचम सोने की डोरी-सी।
छिलके हटते जा रहे, नया अंकुर मुख दिखलाने को है,
यह जीर्ण तनोवा सिमट रहा, आकाश नया आने को है।
- दिनकर (नीलकुसुम)

Sunday, 7 September 2014



                                             FROM  IIMC TO ST. STEPHEN’S COLLEGE

Dear Friends,

I am happy to tell you that I have been selected for admission to the Key Concepts and Critical Thought Certificate Course in St. Stephen’s College.

On the basis of my CV and short abstract on “Caste”, I was called for an interview. I am thankful to the interviewer  who was cordially interested in knowing what I know. His motto was to test my knowledge, not my ignorance. I am grateful to my esteemed  teacher Dr. Karen Gabriel, who has been guiding and encouraging me lovingly.

Here is the abstract :



                                                                CASTE



                       In the absence of an organised state as the  institution to maintain law and order in Indian society, the caste system worked as a final arbiter. It had religious sanction. The Bhagvad-gita says :
                     श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
             स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।35।। Chapt. 3

[ It is far better to discharge one’s prescribed duties, even though faultily, than another’s duties perfectly. Destruction in the course of performing one’s assigned duty is better than engaging in another’s specialised profession, for to follow another’s path is dangerous.]

In other words, the caste system was seen as synonymous with the division of labour.

                       Over a period of time, the caste system lost its sanctity as a system of division of labour and specialisation of functions and increasingly, people were categorised as ‘pure’ and ‘impure’ on the basis of the manual or mental work, they were engaged in. Thus, the four broad categories of division of labour and specialisation of functions were identified as four caste categories : Brahmin, kshatriya, Vaishya and Shudras.  Dalits who were oppressed at many levels, did not feel associated with any of the four categories. Caste became a form of social capital.

                        In the absence of possibilities for upward mobility in the social ladder, the urge to excel in one’s chosen field of specialisation was hampered. Rigidity in the caste system was further strengthened as opportunities shrunk.

                       In independent India, the constitution sanctioned modern institutions like Parliament and democracy with a pledge that “likes will be treated alike”. Interestingly, however, to enter the modern institution like Parliament, people started mobilising votes using traditional institution like caste system.


                       The situation is bleak, but not hopeless. Rapid industrialisation and urbanisation along with universalisation of quality education and rational allocation of opportunities are the only ways to liberate Indian society from the clutches of the caste system and set the pace of modernisation and progress. And yet many of these modern institutions are themselves steeped into caste politics.

Saturday, 6 September 2014






                        मेरे लिए शिक्षक दिवस के मायने 


जो गुरु शिष्य को देत एक भी आखर बताय

धरती पर सो द्रव्य नहीं देकर ऋण चुकाय।


कल का पूरा दिन अपने श्रद्धेय गुरुजन को कृतज्ञ-भाव से याद करते हुआ बीता। फेसबुक से लगभग दूर रहा। जिन-जिन से संपर्क हो पाया, उन्हें पुलकित मन से बधाई-संदेश भेजा। इस दिन बचपन से ही मेरे अंदर असीम ऊर्जा का संचार होते रहा है। दिन भर ख़ुशी-ख़ुशी अपने सम्मान्य अध्यापक-अध्यापिकाओं से मिलना, उनसे आशीर्वाद लेना- मुझे उमंग से भर देताहै।

"Between the Gurus and the Lord,
Whose feet shall I touch first ?
But, of course the Gurus’
For having shown me the way to the Lord."

- kabir

सचमुच, जो व्यक्ति अपनी आत्मा से दूसरे व्यक्ति की आत्मा में शक्ति का संचार कराता है, वो गुरु और जिसमें यह शक्ति संचारित होती है, वो शिष्य। स्तुत्य शिक्षक डॉ. राधाकृष्णन का एक वाक्य मैं कभी नहीं भूलता हूँ-

"A University is essentially a community of students and teachers. The two have to work together for the one single purpose of advancing knowledge and disseminating it. If they are at any time distracted from this straight path of pursuing truth for its own sake and get led away, there will be a jeopardy to the community of the university."

(In 1955 in the Convocation at AMU)

जीवन के हर क़दम पर जहाँ भी जिनसे कुछ सीखा, उन सबके प्रति श्रद्धावनत हूँ। अपने प्राथमिक गुरु माँ-पिता जी, जिन्होंने इस वसुंधरा पर आने व इस सुंदर-सुरम्य प्रकृति की गोद में दुनिया-जहान के अनुभव से सीखने का सुनहरा अवसर दिया एवं मुझे तलाशने-तराशने-निखारने वाले गुरुजन, जिन्होंने मुझे मौजूदा शक्ल में ढाला है; को ख़ुशी के पल भले न दे पाऊँ, पर मेरी वजह से उन्हें कोई शिकन न हो, इसी कोशिश में लगा हुआ हूँ।

"I'm indebted to my parents for living and to my teacher for living well."

- Alexander, the Great

Today, where I'm and tomorrow, where I want 2 be, is all because of the continuous inspiration, affection and encouragement of my Teachers :

Medini Uncle (my motivator and guide), G. P. Dubey (my Spiritual Father), Pramod Bhartiya (Bade Papa), Smt. kushal (Maa), Smt. Poonam & Dr. Neelima (who always give me their motherly affection & I call them MAA ), Thakur Ji, Anandi Pd, Wishnudeo Pd, Suresh Pd, Mahesh Mishra, Atwari Pandit, Wisheshwar Pd, U N Sinha, Panchanan Yadav, Nageshwar Saha, Rawindra Singh, R. P. Sinha, Manoj kr, krishndeo Pd, Indradeo Singh, Ram Uday Singh, Dr. G. P. Yadav, Manoj kr, Rajiv Ranjan, Mahendra Pd, Dr.Narsingh Yadav, P. S. Mishra, k. P. Yadav, Abhinandan kr, Dr. S. C. Roy, Dr.H. K. Chaurasia, Dr. Roma Sinha, Ram Chandra Ghosh (I'm fortunate that he has taught me so lovingly and I've been one of his favourite students), Yogendra Tnb (He practices the philosophy of Simple living & High thinking and I'm a great admirer of his), Alok Choubey (The teacher who loved and promoted me a lot in the true sense of the term) , Dr. k. k. Jha, Anjani Roy, Mithilesh Kumar Sinha (He made me realise that learning English is really a fun. Sir I remember you a lot.), Dr. K. C. Mishra, Dr. Farukh Ali, Dr. Pushpa Dubey, Dr. D. T. K. Dutta ( My Ideal), Dr. Masood Ahmad, Dr. U. N. Mallik, Dr. V. P. Mallik, Vijoy Das (He has been the University topper of his batch both in UG & PG. Despite his health problem, He taught me Shelly's poem "Ode to the West Wind" and I've kept his notes with great care.), Dr. Akhileshwar Thakur (Not merely a teacher, but also my guardian. He has been involved in almost every decision-making of my life), Dr. Rajeev, Dr. Manoj, Dr. R K Mandal, kishan kaljayi, Dr.k. N. Yadav, Dr.Gurudeo Poddar, Dr.S. P. Yadav, Dr. G. C. Seth, Dr. Mitali, Dr kavita, Kumar Ashutosh Rajesh (Evergreen personality) and Dr. S. Z. Khanam

गाँधी जी कितना सही कहते थे -

"A student acquires quarter of his knowledge from his own intelligence, second quarter from his teachers, third quarter from his co-students and the fourth quarter, in course of time, by his experience."

दिल्ली आने के बाद जिन्होंने मुझे दिल्ली की कुछ खास किस्म की हवा नहीं लगने दी व निरंतर अपने स्नेहाशीष से अभिसिंचित किया, जिनके प्रति मेरे मन में अगाध प्रेम व श्रद्धा है; उनका विशेष रूप से ज़िक्र करना चाहता हूँ :

Pankaj Mohan Uncle ( "The Ship of Knowledge"),Prof. Karen Gabriel (My Esteemed Teacher & Guide), Priya Darshan (To read and listen to him is ecstasy for me), Prof. KM Shrivastava (Erudite Scholar & Stalwart), Prof.Hemant Joshi (Loving), Prof. Raghav Chari (Co-operative and cordial), Prof.Shashwati Goswami (Caring & Generous-hearted), Prof Amit Sengupta (After listening to his first lecture, I automatically started to clap & gave him standing ovation), Prof. Vijay Parmar parmar (Smiling personality), Prof. J. Jethwani (Aweful Personality), Prof. Geeta Bamjei (I really revere her), Sunetra Sen Narayan (Very soft-spoken), Ashok Vajpayee (The 2way he speaks and writes, I love) Rahul Dev (Brilliant Orator & Columnist), Tri Bhuvan (The Journalist whose work inspires a lot) Dr. Anand Pradhan (Just Adorable, He knows how to teach well even a below average student. He has very impressive pedagogy), Kishan Kaljayee Uncle (The person who taught me the ABC of Journalism), Tapan Ghosh (The person who always encourages and appreciates me), Satya Prakash (The person whom I not only admire, but also love) , Divyanshu Kumar (Voracious Reader, Conversation with him gives me thrill), Anubhuti Yadav (Jovial & Student-friendly), Bhupen Singh, (Very genuine & knowledgeable person), Sebastian Roberts (Experienced & very plain-hearted), Rajendra Chug (Perfectionist), Krishna Singh (True Guide), Naren Singh (Gentleman) and krishna Ma'am (Studious & Honest in her work)

तेरे ज़िक्र ने, तेरी फ़िक्र ने, तेरी याद ने वो मज़ा दिया
कि जहाँ मिला तेरा नक़्शे-पा, मैंने सर को वहीं पे झुका दिया।

Thursday, 4 September 2014







                             हलधर प्रसाद श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में सम्मानित


बहुत-बहुत बधाई पिताजी !

कल पिता जी से बात हुई। बहुत ही सुखद समाचार सुनाया उन्होंने। स्वतंत्रता-दिवस समारोह में उन्हें खगड़िया के जिलाधिकारी ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया। बिहार के खगड़िया ज़िले के पाँच सर्वश्रेष्ठ शिक्षक की श्रेणी में उन्हें शुमार किया गया।

हमेशा अध्ययन-अध्यापन से जुड़े मेरे पिताजी अपने शिक्षक की कही एक बात हमेशा दुहराते रहते हैं, “ एक शिक्षक में कम-से-कम तीन गुण होने चाहिए – निरंतर अध्ययनशीलता, ज्ञान बाँटने की सहज प्रवृत्ति और निष्पक्षता की प्रकृति। यदि ये तीन गुण आपमें नहीं हैं, तो आप ब्रह्मा हो सकते हैं, विष्णु हो सकते हैं, महेश हो सकते हैं; गुरु नहीं हो सकते”। वस्तुतः जो व्यक्ति अपनी आत्मा से दूसरे व्यक्ति की आत्मा में शक्ति का संचार कराता है, वो गुरु और जिसमें यह शक्ति संचारित होती है, वो शिष्य है।

भागलपुर विश्वविद्यालय से गणित में स्नातकोत्तर (पी.जी.) करने के बाद पिताजी अल्ट्रा रीयल नंबर की संकल्पना देने वाले प्रख्यात गणितज्ञ डॉ. एस.एन.प्रसाद के निर्देशन में शोध कर रहे थे। पर, इसी बीच उनका चयन एम.एस. कॉलिज, अलौली (रौन) में , जिसका शिलान्यास बिहार के तत्कालीन राज्यपाल ए. आर. किदवई ने किया था, व्याख्याता के रूप में हो गया और रिसर्च वर्क प्रभावित होने लगा और कतिपय पारिवारिक कारणों से बीच में ही छोड़ना पड़ा। पर, दुर्भाग्य ये हुआ कि यह कॉलिज तत्कालीन शिक्षा राज्य मंत्री मिश्री सदा व कॉलिज के सचिव के अहं के टकराव की भेंट चढ़ गया व आज तक इसका सरकारीकरण नहीं हो पाया। पारिवारिक अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए 1994 में माँ की जिद के आगे पिताजी को मिड्ल स्कूल के शिक्षक की नौकरी करने पर बाध्य होना पड़ा। और जब एक बार इधर आ गये, तो फिर पूरे मनोयोग से अपना शिक्षक-धर्म निभाया। हालाँकि कॉलिज के छात्रों को भी पढ़ाना जारी रखा। आज वे मिड्ल स्कूल के प्रधानाचार्य हैं व विद्यालय को सँवारने-निखारने में लगे हुए हैं। हाँ, शिक्षकों को चुनाव कार्य, जनगणना, गृहगणना, पशुगणना सहित तमाम तरह की सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में शामिल करने के सरकार के रवैये से स्कूली बच्चों के सतत शैक्षणिक विकास के मूल्यांकन में उत्पन्न होने वाली बाधा से कभी-कभी बहुत चिढ़ते हैं।

पिताजी के शिक्षक श्री उमेश प्रसाद, जो मेरे छोटे नाना जी डॉ. दामोदर 'हरि' (इन्होंने 60 के दशक में एडवांस्ड मैथ्स में 100/100 लाया) के भी अध्यापक रहे हैं, अपने जीते जी अपने शिष्य को एक शिक्षक के रूप में सम्मानित होते देख काफी ख़ुश थे व उन्होंने ढेर सारी दुआयें दीं। उनके शिक्षक मित्र, छात्र समुदाय, एम.एस.कॉलिज, अलौली के प्राचार्य श्री कृष्णदेव प्रसाद, प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी मेयार आलम, जिला शिक्षा पदाधिकारी श्री श्यामबाबू राम, अनुमंडल पदाधिकारी श्री कपिल, जिला पदाधिकारी श्री राजीव रौशन समेत बिहार सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री पशुपति कुमार ‘पारस’, आदि ने उन्हें बधाई दी। पारस जी कई बार बातचीत में कहते हैं, "हलधर जी, आप तो साधु आदमी हैं। जब सक्रिय राजनीतिक जीवन में भी थे, तब भी अपने दामन पर कोई धब्बा नहीं लगने दिया"।  सचमुच, एक पिता के रूप में कतिपय व्यस्तता, विवशता व बाध्यता के चलते उन्होंने अपनी भूमिका का चाहे जैसा भी निर्वहन किया हो (उनकी कुछ ज़्यादतियों का मैं बचपन में बड़ा शिकार रहा हूँ, हाहाहा...), पर एक छात्र के रूप में मेरी उनसे कोई नाराज़गी या किसी किस्म की शिकायत नहीं हो सकती। 100 में उन्हें मैं 75 अंक दूँगा। उनके कुछ छात्र लोक सेवा में हैं, अधिकांश अभियंत्रण में व ढेर सारे अध्यापन के क्षेत्र में। कभी-कभी सोचता हूँ कि काश, पिताजी की अंग्रेजी बेहतर होती, तो शायद मैं भी कैम्पस में यू नो, आइ मीन, जस्ट चिल, कूल ड्यूड, आदि कर रहा होता ! फिर भी, उनके पास जो कुछ था, अपने छात्रों के साथ-साथ मुझे भी दिया।

पिता जी कबीर को अपना आदर्श मानते हैं व उन्हें ये कुछ पंक्तियाँ बेहद पसन्द हैं :

भूखे को भोजन, नंगे को चीर
चेतना बाँटे सत्य कबीर।

दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया।

पिताजी ! आपके आरोग्यमय जीवन की सद्कामना के साथ, एक बार पुनः आपको बहुत-बहुत मुबारकबाद !

लाखों में इंतख़ाब के क़ाबिल बना दिया
जिस दिल को तुमने देख लिया, दिल बना दिया।

- जिगर मुरादाबादी

तेरे ज़िक्र ने, तेरी फिक्र ने. तेरी याद ने वो मज़ा दिया
कि जहाँ मिला तेरा नक़्शे-पा, मैंने सर को वहीं पे झुका दिया।