पत्रकारिता कुर्बानी माँगती है । कुर्बानी ऐशो-आराम की, नींद-चैन की, सुविधापरस्ती की । पत्रकारिता बेहद मुश्किल आज़माइश है । इसके पसरे संसार में मुकम्मल कुछ नहीं होता । बस, यात्रा है- अंतहीन यात्रा । यहाँ सुरक्षा-भाव तलाशने वाले पथिकों को निराशा हाथ लगेगी । यह तो कुरुक्षेत्र है, जीत गये तो इतिहास में नाम सुरक्षित हो जायेगा, गर हारे भी तो वीरगति को प्राप्त होगे । इसलिए इस धर्मयुद्ध में जुनूनी व समर्पित योद्धाओं की ज़रूरत है ।
बकौल श्री प्रकाशचंद्र भुवालपुरी, "एक पत्रकार साहित्यकार की तरह मधुव्रती बनकर जीवन के बिखरे हुए सत्य का मात्र संचयन ही नहीं करता, वरन् उसे देवर्षि नारद-सा घ्राणशील, संजय-सा दूरदृष्टिसंपन्न, अर्जुन-सा लक्ष्यनिष्ठ, एकलव्य-सा अध्यवसायी, अभिमन्यु-सा निर्भीक, परशुराम-सा साहसी, सुदामा-सा संतोषी, दधीचि-सा त्यागी, धर्मराज-सा सत्यव्रती, भीष्म-सा प्रतिबद्ध, गणेश-सा प्रतिभासमपन्न, कृष्ण-सा ज्ञानी एवं कर्मयोगी, राम-सा मर्यादावादी, कृष्ण द्वैपायन-सा प्रगतिशील और भगवान शिव-सा लोकमंगल के लिए विषपायी होना पड़ता है । ये सभा गुण किसी एक में समवेत् होकर उसे सम्मानित पत्रकार बनाते हैं और ऐसा पत्रकार अपनी पत्रकारिता को व अपने दायित्व-बोध को सामने ले आकर सामाजिक सम्मान और समादर का सच्चा अधिकारी बनता है ।"
मीडिया के मूल्यों पर विमर्श करते हुए कुछ अनछुए पहलुओं पर बात करना बेहद ज़रूरी है, जिनके ज़रिए पत्रकारिता से अपनी अपेक्षाओं को ईमानदारी से सामने रखा जा सके ।
पत्रकारिता को मैं एक पाक-साफ पेशा ही नहीं,
बल्कि एक समग्र जीवन-पद्धति मानता हूँ, जिसे जोड़, जुगत, जुगाड़ या तिकड़म से न तो
जिया जा सकता है, न किया जा सकता है । पत्रकारिता संपूर्ण समर्पण, निष्ठा एवं सतत
जिज्ञासा की जुनूनी अभिव्यक्ति है । यह वह तपस्या है, जिसके चरमोत्कर्ष पर हमें
सन्नाटे में से ध्वनि, शोर में से संगीत और अंधकार में से प्रकाश-किरण ढूँढ लेने
की प्रवीणता हासिल होती है ।
इसीलिए
पत्रकारिता से मेरी अपेक्षा है कि यह हमारे लिए सूचना, शिक्षा तथा मनोरंजन का साधन मात्र न हो, अपितु व्यक्ति, समाज
तथा सरकार के बीच बढ़ती संवादहीनता की खाई को पाटे । सामूहिक संवाद के स्तर को
ऊँचा करे, राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया को तेज़ करे, यथास्थिति को तोड़े, मज़बूत
लोगों का बयान होने की बजाय बेज़बानों की ज़बान बनी रहे एवं लोकतंत्र की जड़ें
मज़बूत करे ।
पत्रकारिता की विस्तृत,
व्यापक व अपरिमित दुनिया सरोकारों से बनती है । इसके बहुआयामी स्वरूप की अपनी
चुनौतियाँ हैं । आज पत्रकारिता का जिस्म तो बुलंद है, पर इसकी रूह नासाज़ हो चली
है । बेबाक, बेलाग, बेखौफ, बेलौस अंदाज़े-बयां, साफगोई व क़िस्सागोई की कला से कोई
ऐसी ख़बर नहीं है, जिसे रोचक न बनाया जा सके, समग्रता
में परोसा न जा सके । किंतु, समाचार को अनावश्यक दिलचस्प बनाने के चक्कर में जब हम
सूचनाओं के साथ छेड़छाड़ करने लगते हैं, ख़बरों के साथ खिलवाड़ करने लगते हैं, तो
यह अपना सार खो बैठता है । पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा धड़ा है- विधायिका,
कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के साथ निरंतर खड़ी ‘संवादपालिका’ – लोकतंत्र की प्रहरी, जो कभी सोती नहीं । अगर सोती
भी है, तो इसकी आँखें खुली होती हैं । संवादपालिका एक स्वायत्त संस्था है, जिसकी
ऊर्जा व क्षमता का सतत स्रोत जनता है । सबल जनता, तो सबल संवादपालिका । इसका उलट
भी उतना ही सही । सूचना खुद में ही शक्ति है और सही, सम्यक सूचना के प्रसार से
लोगों का सशक्तीकरण होता है । सुसूचित लोग परिपक्व फैसले ले पाते हैं । इसलिए इसकी
विश्वसनीयता व साख को बचाने और बढ़ाने हेतु हमें संजीदगी से एक नज़रिये के तहत पूरे परिप्रेक्ष्य में ख़बर
लाने की ज़िम्मेदारी निभानी होगी ।
इसलिए पत्रकारिता से मेरी यह भी
अपेक्षा है कि यह मीडिया-ग़रीबी व मीडिया अमीरी के बीच बढ़ती खाई को भी पाटे । आज
हमारे देश में जो लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं, लगभग वही लोग मीडिया रेखा के भी
नीचे हैं । दूसरे शब्दों में मीडिया की पहुँच से पड़े हैं । उनके लिए मीडिया किसी
नौटंकी से कम नहीं, और मीडिया के लिए वे लोग किसी दर्शक से ज़्यादा नहीं । जब तक
देश की राजनीति व मीडिया-नीति ठीक नहीं होगी, लोकतंत्र की लड़खड़ाहट नहीं जायेगी ।
ये सही दिशा में चलेंगी, तभी देश की दशा भी सकारात्मक रूप से बदलेगी । भारत के हर
हिस्से की समुचित समानुपातिक रिपोर्टिंग हो, यह ज़रूरी है । सामान्यीकरण की
प्रवृत्ति, जो गंभीर क़िस्म की बीमारी है, का निवारण कर मीडिया के शनै:-शनै: ‘इन्फोटेनमंट’ में परिवर्तित हो जाने की कचोटने वाली प्रवृत्ति
पर थोड़ा अंकुश लगाने की आवश्यकता है । जिस लापरवाही से या जान-बूझकर
संवेदनशून्यता के साथ चीज़ें सनसनीखेज़ बनाकर तोड़-मरोड़कर पेश की जाती हैं, उससे
समग्रता का नाश होता है ।
16वीं लोकसभा चुनाव में मुख्यधारा की मीडिया ने जिस तरह आपना किरदार निभाया तथा सोशल मीडिया की जो सामाजिक और राजनीतिक भूमिका रही, उसे देखकर तो स्पष्ट संकेत मिलता है कि मीडिया को निस्संदेह आपनी पारदर्शिता की मौजूदा मात्रा पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है । जब गाँव का एक अनपढ़ आम इंसान भी बोलने लगे कि मीडिया तो बिकी हुई है, तो नक्कारखाने में इस तूती की आवाज़ को भी सुनने का वक़्त आ गया है । पेड न्यूज़ की परिपाटी ने तो और भी बेड़ा गर्क कर रखा है । गाँव-देहात के लोग बहुधा भ्रमित हो जाते हैं, बल्कि ये कहना ज़्यादा श्रेयस्कर होगा कि वो ये सोच ही नहीं पाते कि कौन प्रामाणिक ख़बर है और कौन पेड । तो प्रिंट, इलेक्ट्रोनिक और सोशल- तीनों मीडिया को अपने दायित्व का पुनर्विश्लेषण करना होगा, नहीं तो इसकी गिरती साख की लपट में ख़बर-पिपासु लोग नाहक झुलसेंगे । हाँ, इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इस बार के आम चुनाव में रिकॉर्ड 66.38 प्रतिशत मतदान हुआ, जिसने 1984 के ऐतिहासिक आम चुनाव में इंदिरा-सहानुभूति के फलस्वरूप हुए 64.01 फीसदी मतदान की सांख्यिकी को पीछे छोड़ दिया है । और मतदाता-जागरूकता अभियान की इस पूरी प्रक्रिया में मीडिया की सक्रिय सहभागिता रही या यूँ कहें कि मीडिया ने उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) का काम किया । पर गाहे-बगाहे, प्रत्यक्षतः – परोक्षतः मतदाताओं के मानस को प्रभावित करने में, लहर बहाने में मीडिया भी अनैतिक साझीदार रही, जो घोर चिंता का विषय है और कहीं-न-कहीं अंदर से कचोटता है ।
जिस दिन से एक पत्रकार खुद से सवाल करना छोड़ देता है, उसके पतन की शुरूआत हो जाती है, लोक- कल्याण की गुंजाइश क्षीण होने लगती है । हमें पत्रकारिता के प्रति उत्तरदायित्व-बोध हो, यह आवश्यक है । “किसी से डरो नहीं, किसी को छोड़ो नहीं और किसी के पक्ष में लिखो-बोलो नहीं” – यही पत्रकारिता को अवमूल्यन के दौर से निकालकर उन्नयन व उत्कर्ष दिला सकता है । क्रोनेन के शब्दों में कहूँ तो “सत्ता-शक्ति के सामने सच बोलना, सच को ताक़तवर बनाना और शक्तिशाली को सच्चा व भरोसेमंद बनाना” ही पत्रकारिता का मूल व अहम ध्येय है । निरंतर संवाद व सवाल जीवन्त पत्रकारिता की उपलब्धि के सूचकांक हैं । वस्तुत: पत्रकारिता कुल मिलाकर सहने व बेहतर बोतों के लिए रहने हेतु है । काम की प्रकृति से उपजा दबाव रचनात्मक होने में मदद करता है । ख़बरों की पुनर्व्याख्या हेतु अपेक्षित कौशल वाले संपादक हों – यह भी मेरी अपेक्षा है ।
16वीं लोकसभा चुनाव में मुख्यधारा की मीडिया ने जिस तरह आपना किरदार निभाया तथा सोशल मीडिया की जो सामाजिक और राजनीतिक भूमिका रही, उसे देखकर तो स्पष्ट संकेत मिलता है कि मीडिया को निस्संदेह आपनी पारदर्शिता की मौजूदा मात्रा पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है । जब गाँव का एक अनपढ़ आम इंसान भी बोलने लगे कि मीडिया तो बिकी हुई है, तो नक्कारखाने में इस तूती की आवाज़ को भी सुनने का वक़्त आ गया है । पेड न्यूज़ की परिपाटी ने तो और भी बेड़ा गर्क कर रखा है । गाँव-देहात के लोग बहुधा भ्रमित हो जाते हैं, बल्कि ये कहना ज़्यादा श्रेयस्कर होगा कि वो ये सोच ही नहीं पाते कि कौन प्रामाणिक ख़बर है और कौन पेड । तो प्रिंट, इलेक्ट्रोनिक और सोशल- तीनों मीडिया को अपने दायित्व का पुनर्विश्लेषण करना होगा, नहीं तो इसकी गिरती साख की लपट में ख़बर-पिपासु लोग नाहक झुलसेंगे । हाँ, इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इस बार के आम चुनाव में रिकॉर्ड 66.38 प्रतिशत मतदान हुआ, जिसने 1984 के ऐतिहासिक आम चुनाव में इंदिरा-सहानुभूति के फलस्वरूप हुए 64.01 फीसदी मतदान की सांख्यिकी को पीछे छोड़ दिया है । और मतदाता-जागरूकता अभियान की इस पूरी प्रक्रिया में मीडिया की सक्रिय सहभागिता रही या यूँ कहें कि मीडिया ने उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) का काम किया । पर गाहे-बगाहे, प्रत्यक्षतः – परोक्षतः मतदाताओं के मानस को प्रभावित करने में, लहर बहाने में मीडिया भी अनैतिक साझीदार रही, जो घोर चिंता का विषय है और कहीं-न-कहीं अंदर से कचोटता है ।
जिस दिन से एक पत्रकार खुद से सवाल करना छोड़ देता है, उसके पतन की शुरूआत हो जाती है, लोक- कल्याण की गुंजाइश क्षीण होने लगती है । हमें पत्रकारिता के प्रति उत्तरदायित्व-बोध हो, यह आवश्यक है । “किसी से डरो नहीं, किसी को छोड़ो नहीं और किसी के पक्ष में लिखो-बोलो नहीं” – यही पत्रकारिता को अवमूल्यन के दौर से निकालकर उन्नयन व उत्कर्ष दिला सकता है । क्रोनेन के शब्दों में कहूँ तो “सत्ता-शक्ति के सामने सच बोलना, सच को ताक़तवर बनाना और शक्तिशाली को सच्चा व भरोसेमंद बनाना” ही पत्रकारिता का मूल व अहम ध्येय है । निरंतर संवाद व सवाल जीवन्त पत्रकारिता की उपलब्धि के सूचकांक हैं । वस्तुत: पत्रकारिता कुल मिलाकर सहने व बेहतर बोतों के लिए रहने हेतु है । काम की प्रकृति से उपजा दबाव रचनात्मक होने में मदद करता है । ख़बरों की पुनर्व्याख्या हेतु अपेक्षित कौशल वाले संपादक हों – यह भी मेरी अपेक्षा है ।
टी.वी. चैनलों
की यह दलील कि दर्शक देखना चाहते हैं, इसलिए हम अपेक्षित और अभीष्ट कार्यक्रम
दिखाते हैं- गंभीर मज़ाक है । यह अवधारणा दर्शकों की अभिरूचि के स्वातंत्र्य के
सम्मान के साथ आरंभ तो होती है, पर उनकी पसंदगी के न्यून-प्राक्कलन (कमतर अन्दाज़ा)
पर जाकर खत्म । दुर्भाग्यवश आज वो प्रभावी या दबदबे वाले क़िस्सागो नहीं हैं,
जिनके पास वाकई कुछ कहने के लिए है, बल्कि वैश्विक मीडिया-क्षितिज पर छोटा-सा
कॉरपोरेट समूह दिखाई पड़ता है, जिसके पास कुछ बेचने के लिए है । हमें इस स्थिति को
बदलना होगा । आज जनसत्ता जैसे कुछ गिने-चुने अख़बार को छोड़ दिया जाये, तो सुबह
उठते ही फोर्ड का प्रचार दीखता है । बहुत ज़रूरी है कि पहले पन्ने का आकर्षण
लौटाया जाये । जी.बी. शॉ ने ठीक ही कहा था कि “आज के
समाचार पत्र (भारत के संदर्भ में टी.वी. चैनल कहना ग़लत नहीं होगा)
साइकिल-दुर्घटना व सभ्यता के विघटन में पार्थक्य (फर्क़) करने में असक्षम हैं ।”
आज हमें वैकल्पिक मीडिया को भी यथोचित जगह देनी होगी ताकि स्वर की
विविधता व बहुलता बची व बनी रहे । छोटे पत्र-पत्रिकाओं का समूह, जो कॉरपोरेट घराने
के रहमो- करम पर ज़िन्दा रहने को विवश नहीं है, बल्कि खुद्दारी की खातिर ऐसा करने
से इंकार करता है ; उनकी पठनीयता व पाठक-वर्ग
की अपेक्षा पर खड़ा उतरने की प्रतिबद्धता ही उन्हें ऊर्जा देती है ।
मीडिया (प्रिंट व
इलेक्ट्रॉनिक दोनों) में साहित्य को भी समुचित स्थान मिलना चाहिए, जो वस्तुत: समाज की ज़मीनी हक़ीक़ी दुनिया का आईना है ।
आखिरकार जॉन गॉल्सवर्थी के नाटक जस्टिस का मंचन देखकर ब्रिटेन के तात्कालीन
प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल एकल कारावास
के कठोर व यातनापूर्ण कानून में बदलाव करने पर विवश हुए । साहित्य के इस असर को
मीडिया पर्याप्त और यथोचित जगह देकर और भी उभार व प्रभावशाली बना सकता है ।
टी.आर.पी. की चिंता कोई अनैतिक चिंता नहीं है । पर, पत्रकारिता का पूरी तरह
व्यवसायीकरण हो जाना तो इसके मक़सद पर ही तुषारापात कर देता है । आज तो लोकप्रसारक
(पब्लिक ब्रॉडकास्टर) भी जन सरोकार के मुद्दों व मसलों पर पर्याप्त बात नहीं कर
रहे हैं ।
मैंने अंग्रेजी (प्रतिष्ठा) अर्जित कर
संत स्टीफन्स महाविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य व जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भाषा-विज्ञान से परास्नातक के लिए चयनित होने के
बाद उस विकल्प को छोड़कर पत्रकारिता की पढ़ाई करने का निर्णय लिया । पत्रकारिता से मेरी यह भी अपेक्षा है कि यह
हमारी भाषा, संस्कार व संस्कृति को परिष्कृत, परिमार्जित एवं सम्पुष्ट कर सके । आज
पत्रकारिता की भाषा पतनोन्मुखी हो चली है । शब्द अर्थहीन हैं, भाव मरणासन्न । आज
हम अपनी भाषा पर से अपना मालिकाना हक़ खोते जा रहे हैं- जो दु:खद है । । भाषाई शुद्धता जो हमारी इयत्ता है, पहचान है, सबसे बड़ी
शक्ति है, उसकी ओर भी इस महत्वाकांक्षी पीढ़ी को ध्यान देना होगा । मैं तो
कहता हूँ, भाषाओं का कोई पारस्परिक अंतर्विरोध नहीं होता । बस, हिन्दी
बोलते हुए, लिखते हुए अंग्रेजी के अनावश्यक प्रयोग से मुझे चिढ़ होती है । और
तो और, वेतन-वृद्धि की घोषणा के बाद ख़बर आती है, 'गुरु जी
मालामाल' । कार्रवाई की ख़बर में 'अफसर नपेंगे', विरोध-प्रदर्शन में, 'छात्रों ने जमकर बवाल काटा', आदि का प्रयोग क्या दर्शाता है ? मतलब, पत्रकारिता
का शब्दकोश इतना निर्धन हो गया है ? पत्रकारिता में शब्द के अर्थ से ज़्यादा शब्द से जुड़ाव का
महत्व है । चूँकि, शब्द से हम विलग रहते हैं, उसे जीते नहीं हैं, इसीलिए ‘संभावना’ व ‘आशंका’ में हम फर्क़ करने की ज़हमत नहीं
उठाना चाहते । लिंग-बोध तो मानो गायब ही हो गया हो । भारतीय जनसंचार संस्थान
में दाखिले के पूर्व मैं
भागलपुर, बिहार से प्रकाशित हिन्दी दैनिक नयी बात के कार्यालय गया था । उसके संपादक बहुत
शुद्धतावादी हैं । एक दूसरे अख़बार प्रभात ख़बर के पहले पृष्ठ पर पहली ख़बर का शीर्षक था- “बाढ़ हुआ विकराल” । वो अपने
संवाददाताओं से ग़लती ढूंढने को बोल रहे थे । अंत में मैंने चिह्नित किया, तो बड़े
खुश हुए । अंग्रेजीदां यदि ‘प्राइड’ (जो बहुधा ‘वैनिटि’ में बदल गयी है) छोड़ दें और हिन्दी भाषी अपनी ‘प्रेज्युडिस’, तो संवेदना व चेतना से युक्त पत्रकारिता
की एक ख़ूबसूरत व प्यारी दुनिया हमारी होगी ।
तमाम विचलन और विसंगति के बावजूद यह सुकून का विषय है कि जहाँ
विधायिका व कार्यपालिका से जुड़े लोग सेवानिवृत्ति के पश्चात् भी अपने क्षेत्र में
पनपी अपसंस्कृति पर कोई सुचिंतित बहस करने से कतराते हैं, वहीं ख़बरपालिका के सजग
लोग ‘पत्रकारिता में मर्यादा पर’ चर्चा कर तो रहे हैं । पत्रकारिता मेरे लिए महाभारत का
संजय है- जो समग्रता में सच बोलने से डरता नहीं । जो स्थितप्रज्ञ है- राग-द्वेष,
भेद-भाव, हानि-लाभ से परे है । वह सत्यनिष्ठ है । उसकी आस्था संस्था से है, किसी
व्यक्ति- विशेष से नहीं । मैं यह नहीं कहता कि यह कोई आमूल चूल परिवर्तन ला देगी,
क्रांति हो जायेगी, पर यह परिवर्तन के पहिये को ज़मीन तो मुहैया करा ही सकती है । पत्रकारिता
को हम कितनी संजीदगी व पाकीज़गी से लेते हैं- यही हमारी अपेक्षा को पूरा करने में
मदद करती है । परिष्कृत सोच और सुलझी समझ से ख़बरों की चुनौतियों से जूझने में मदद
मिलती है और पत्रकारिता अपने मूल्यों के साथ निहितार्थ को छूने में कामयाब होती है
।
-जयन्त जिज्ञासु, प्रसार पत्रकारिता,
भारतीय जनसंचार
संस्थान, नयी दिल्ली
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