दोस्तो, आपने नोस्टैल्जअ पर अलग-अलग भाषाओं की बहुत-सी कविताएँ पढ़ी होंगी। ज़रा इसे एक नज़र देखिए, आप यक़ीनन डूब जाएँगे, खो जाएँगे :
ये माज़ी जो मेरी तन्हाइयों के साथ रहता है
ये एक नादान बच्चे की तरह तन्हाई को मेरी
इशारा करता है ठोड़ी पकड़कर और कहता है-
वो देखो गाँव के सीने पे सर रखे हुए सरसों
तुम्हारी कमसीनी खेली है जिसकी गोद में बरसों
नुकूशे-पाशे अब तक हर गली की माँग रौशन है
अभी तक गोद फैलाये हुए डेरे का घर है
जामुन की कमज़ोर शाखों ने तुम्हारी
उंगलियों का हर निशां महफूज़ रखा है
लबों पे झील के बस है इक शिकवा
जबसे तुम गये हो कोई भी हम तक नहीं पहुँचा।
ये माज़ी जो मेरी तन्हाइयों के साथ रहता है...
वो देखो गाँव के खलिहानों में सोया हुआ झाड़ू
नशीली रात की रानी वो लौ देती हुई ख़ुशबू
दीयों का धीमी-धीमी रोशनी देना, धुआँ देना
शकस्ता झोपड़ों का ज़िन्दगी को लोड़ियाँ देना
खनकती है रसोईघर में अल्हड़ चूड़ियाँ अबतक
भरा के कुड़ियाँ लाती हैं सर पर बोरियाँ अबतक
तलैया के किनारे कच्ची ईंटों से बना मंदिर
सुलगते कंडों से उड़ती धूल की मलगुजी चादर
हरे खेतों की मेड़ों पर सुलगते जिस्म के साये
लरजते होंठ घबरायी हुई साँसों के अफसाने
लचकती आम की शाखों पे बल खाये हुए झूले
किसी का भागना ये कहके, कोई है हमें छू ले
ये माज़ी जो मेरी तन्हाइयों के साथ रहता है...
ये कहता है कि मैं गुज़री हुई बातों में खो जाऊँ
तुम्हारी ज़ुल्फ से महकी हुई रातों में खो जाऊँ
इसे मैं कैसे समझाऊँ कि ये माज़ी की तस्वीरें
अब एक ऐसी अमानत है जिसे मैं रख नहीं सकता
अगर रखूँ तो नाकारा, निकम्मा कहके ये दुनिया
मुझे ठोकर लगा दे और ख़ुद आगे को बढ़ जाये
मेरी पसमांदगी पर हर नज़र उठे, तरस खाये
मुझे मुर्दा अजायबघर की ऐसी मूर्ति समझे
जो सबको इसलिए प्यारी है कि काफी पुरानी है।
- डॉ. वसीम बरेलवी