Wednesday, 19 November 2014


                                                             दिवंगत पत्रकार आलोक तोमर : मेरी नज़र में



नाराज़गी  आलोक से :

ऐसे भी खरे तुम तो न थे दादो-सतद के,
करता मुलकुल- मौत तक़ाज़ा कोई दिन और ।
-ग़ालिब

    पत्रकारिता कुर्बानी माँगती है । कुर्बानी ऐशो-आराम की, नींद-चैन की, सुविधापरस्ती की । पत्रकारिता बेहद मुश्किल आज़माइश है । इसके फैले संसार में मुकम्मल कुछ नहीं होता । बस, यात्रा है- अंतहीन यात्रा । यहाँ सुरक्षा-भाव तलाशने वाले पथिकों को निराशा हाथ लगेगी । यह तो कुरुक्षेत्र है, जीत गये तो इतिहास में नाम सुरक्षित हो जायेगा, गर हारे भी तो वीरगति को प्राप्त होगे । इसलिए इस धर्मयुद्ध में जुनूनी व समर्पित योद्धाओं की ज़रूरत है ।

आज जबकि मीडिया बेज़बानों की ज़बान बने रहने के बजाय मज़बूत व ताकतवर लोगों का बयान बनकर रह गया है, वैसे में हमारे ज़ेहन में आलोक की यादें ताज़ा होना लाज़िमी है। ज़मीनी हक़ीक़ी दुनिया की पत्रकारिता के अमिट, अतुलनीय व अप्रतिम हस्ताक्षर,  हमारे बीच से असमय चले जाने वाले, सच्चे अर्थों में जनसंचार के संसार के जॉन कीट्स आलोक तोमर एक ऐसे देदीप्यमान सितारे का नाम है, जो बुझ कर भी नहीं बुझता। "सूरज हूँ, ज़िन्दगी की रमक छोड़ जाऊँगा / गर डूब भी गया, तो अपनी शफक़ छोड़ जाऊँगा।" यूँ तो आलोक जी से मेरा कभी मिलना न हुआ, पर न मिलते हुए भी उनके प्रति एक जुड़ाव-सा, एक खिंचाव-सा महसूस होता है। जिस तरह क़रीने व सलीक़े से वो लिखा करते थे, ऐसा लगता था कि इस ख़बर या आलेख को उन्होंने बख़ूबी जिया है। उनकी जीवन्त लेखन शैली का मैं हमेशा क़ायल रहा, उन्हें बड़े चाव से पढना एक तरह की अतिरिक्त ऊर्जा देता था। अपने लुभावने अंदाज़े-बयां और साफगोई के लिए याद किये जाने वाले ख़बरपालिका के सच्चे दूत और पक्षधर पत्रकारिता के प्रतीक आलोक तोमर की इस वर्ष तृतीय पुण्यतिथि पर  कॉन्सटीट्यूशन क्लब में उनकी स्मृति में आयोजित विचार गोष्ठी में "पत्रकारिता में मर्यादा" पर विशद चर्चा हुई । कार्यक्रम में अशोक वाजपेयी, राहुल देव, केे. सी. त्यागी, ओम थानवी, प्रियदर्शन, शंभुनाथ शुक्ल, राजेश बादल, संतोष भारतीय, शैलेश, राजीव मिश्र, दीपक चौरसिया, आनंद प्रधान आदि की गरिमामयी मौजूदगी थी ।

            बकौल श्री प्रकाशचंद्र भुवालपुरी, "एक पत्रकार साहित्यकार की तरह मधुव्रती बनकर जीवन के बिखरे हुए सत्य का मात्र संचयन ही नहीं करता, वरन् उसे देवर्षि नारद-सा घ्राणशील, संजय-सा दूरदृष्टिसंपन्न, अर्जुन-सा लक्ष्यनिष्ठ, एकलव्य-सा अध्यवसायी, अभिमन्यु-सा निर्भीक, परशुराम-सा साहसी, सुदामा-सा संतोषी, दधीचि-सा त्यागी, धर्मराज-सा सत्यव्रती, भीष्म-सा प्रतिबद्ध, गणेश-सा प्रतिभासमपन्न, कृष्ण-सा ज्ञानी एवं कर्मयोगी, राम-सा मर्यादावादी, कृष्ण द्वैपायन-सा प्रगतिशील और भगवान शिव-सा लोकमंगल के लिए विषपायी होना पड़ता है । ये सभा गुण किसी एक में समवेत् होकर उसे सम्मानित पत्रकार बनाते हैं और ऐसा पत्रकार अपनी पत्रकारिता को व अपने दायित्व-बोध को सामने ले आकर सामाजिक सम्मान और समादर का सच्चा अधिकारी बनता है ।" ठीक ऐसा ही जीवन आलोक ने जिया। पर अफसोस कि



न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन
बड़े क़रीब से उठकर चला गया कोई ।
-मीना कुमारी

पर जाते-जाते आने वाली नस्लों को अपनी जीवन-शैली व कार्य-पद्धति से यह संदेश देते गये :

कबीरा तुम पैदा हुए, जग हसा तुम रोये
ऐसी करनी कर चलो, तुम हसो जग रोये ।

वाकई, पत्रकारिता को जिस शख्स ने महज आजीविका के लिए नहीं, अपितु समग्र जीवन-पद्धति के रूप में अपनाया हो, उनका इस तरह हमारे बीच से इतनी जल्दी जाना इस नवोदित पीढ़ी का नुकसान है । अपनी बेबाक, बेलाग, बेख़ौफ, बेलौस रिपोर्टिंग के लिए मशहूर आलोक जी ने जनसत्ता के आकर्षण व रोचकता का पर्याय बनकर यह दिखाया कि क़िस्सागोई की कला हो, तो बगैर ख़बरों के साथ खिलवाड़ किये, सूचनाओं के साथ छेड़छाड़ किये किसी भी समाचार को रोचक बनाया जा सकता है, समग्रता में परोसा जा सकता है । आज की तारीख़ में, जबकि पत्रकारिता की पसरी दुनिया में ज़बर्दस्त प्रतिस्पर्धा है, एक-दूसरे को पीछे धकेलने की होड़ लगी हुई है, परछिद्रान्वेषण की पनप रही अपसंस्कृति से भलेमानुष आजिज़ हो कर रह जाते हैं, वैसे में आलोक की अमिट पत्रकारीय विरासत हम जैसे नयी पीढ़ी के पत्रकारों; जिनकी लेखनी अभी शैशवावस्था में है, को अपनी आभा से अभिसिंचित करती मालूम पड़ती है। उनकी सृजनधर्मिता व सूक्ष्म साहित्यिक समझ हमारे अंदर की संवेदना को झिंझोरती है, चेतना को झकझोरती है।


आलोक जी की मुकम्मल शख़्सियत व उनका सम्यक् जीवन-दर्शन उनकी इन पंक्तियों में झलकता है :

मैं डरता हूँ कि मुझे डर क्यों नहीं लगता,
जैसे कोई बीमारी है अभय होना,
जैसे कोई कमज़ोरी है निरापद होना
जो निरापद होते हैं, भय व्यापता है उन्हें भी
पर भय किसी को निरापद नहीं होने देता ।


             मीडिया (प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक दोनों) में साहित्य को भी समुचित स्थान मिलना चाहिए, जो वस्तुत: वास्तविक समाज का आईना है । आखिरकार जॉन गॉल्सवर्थी के नाटक जस्टिस का मंचन देखकर ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल  एकल कारावास के कठोर व यातनापूर्ण कानून में बदलाव करने पर विवश हुए । साहित्य के इस असर को मीडिया पर्याप्त और यथोचित जगह देकर और भी उभार व प्रभावशाली बना सकता है, जिसके लिए आलोक जी ताउम्र अपने स्तर पर लगे रहे और कई बार अड़कर साहित्यिक समाचार के लिए ज़गह सुनिश्चित करा, उसके प्रकाशन की अविरल धारा बहाते रहे । टी.आर.पी. की चिंता कोई अनैतिक चिंता नहीं है । पर, पत्रकारिता का पूरी तरह व्यवसायीकरण हो जाना तो इसके मक़सद पर ही तुषारापात कर देता है । आज तो जनप्रसारक (पब्लिक ब्रॉडकास्टर) भी जन सरोकार के मुद्दों व मसलों पर पर्याप्त बात नहीं कर रहे हैं ।  जी.बी. शॉ ने ठीक ही कहा था कि आज के समाचार पत्र (भारत के संदर्भ में टी.वी. चैनल कहना ग़लत नहीं होगा) साइकिल-दुर्घटना व सभ्यता के विघटन में पार्थक्य (फर्क़) करने में असक्षम हैं  

बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस व्यवहारकुशल व्यक्तित्व की निजी ज़िन्दगी के कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में दयानंद पाण्डेय जी के ज़रिये पता चला। पत्रकार-मानस पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का सहज आत्मिक स्नेह इन्हें मिलता रहा। 
पत्रकारिता इनके लिए महाभारत का संजय था- जो समग्रता में सच बोलने से डरता नहीं । जो स्थितप्रज्ञ है- राग-द्वेष, भेद-भाव, हानि-लाभ से परे है । वह सत्यनिष्ठ है । उसकी आस्था लोकतांत्रिक संस्था के प्रति है, किसी व्यक्ति- विशेष के प्रति नहीं। आज आपकी दुनियावी उपस्थिति  भले न हो, पर रूहानी मौजूदगी हमें आलोकित करती रहेगी। ये रोशनी हमेशा रहेगी। राज्यसभा सांसद के.सी. त्यागी की यह टिप्पणी कि पत्रकारिता में मूल्यों के ह्रास को लेकर आज आलोक जी के बहाने हम सार्थक-सारगर्भित चर्चा कर तो रहे हैं, अवमूल्यन के इस दौर में "राजनीति में मर्यादा" पर तो अब शायद ही कोई गोष्ठी हो; सोचने को बाध्य करती है । साथ ही, संवादपालिका से संवेदनशीलता की अपेक्षा भी करती है । पत्रकारिता में पक्षधरता के पैरोकार रहे, बड़ी ख़ूबसूरती से मसि-क्रीड़ा करने वाले सादर स्मरणीय आलोक जी के व्यक्तित्व के विविध आयामों पर उनसे गहरे जुड़े मित्रों व सुधीजनों ने अपनी यादें साझा कीं । शत-शत नमन मातृसमा आदरणीया सुप्रिया राय जी को व आत्मिक स्नेह आद्याशा जी को, जो बड़ी जिजीविषा, जीवटता व जीवन्तता के साथ आलोक जी की प्रखर प्रज्ञात्मक परम्परा व कुशाग्र बौद्धिक विरासत को आगे ले जाने हेतु कृतसंकल्प हैं । भारतीय जनसंचार संस्थान, नयी दिल्ली के दो संभावनाशील व उदीयमान साथी - विवेकानंद भारत व मीना कोतवाल को आलोक तोमर छात्रवृत्ति दी गयी । उन्हें बहुत-बहुत बधाई !

श्रद्धेय अशोक वाजपेयी, राहुल देव और प्रियदर्शन जी को धैर्यपूर्वक तन्मयता से प्रमुदित होकर सुनना मेरे लिए हमेशा संजोने वाला सुखद अनुभव रहा है । कल वाजपेयी जी व राहुल जी ने अपनी बातों से अनुप्राणित कर दिया । बाद में, जनसत्ता के पूर्व सम्पादक राहुल जी ने मुझसे व्यक्तिगत बातचीत में कहा, "तुमने पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए सेंट स्टीवन'स कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में  
, दिल्ली वि.वि. से हिन्दी में एवं जवाहरलाल नेहरू वि.वि.  से भाषाविज्ञान  में स्नातकोत्तर  का विकल्प छोड़ दिया, साहसी हो, हाथ मिलाओ"।

बहरहाल, भाषाई शुद्धता जो हमारी इयत्ता है, पहचान है, सबसे बड़ी शक्ति है, उसकी ओर भी इस महत्वाकांक्षी पीढ़ी को ध्यान देना होगा । मैं तो कहता हूँ भाषाओं का कोई पारस्परिक अंतर्विरोध नहीं होता । बस, हिन्दी बोलते हुए, लिखते हुए अंग्रेजी के 
अनावश्यक प्रयोग से मुझे चिढ़ होती है ।और तो और, वेतन-वृद्धि की घोषणा के बाद ख़बर आती है, 'गुरु जी मालामाल' । कार्रवाई की ख़बर में 'अफसर नपेंगे', विरोध प्रदर्शन के लिए 'छात्रों ने जमकर बवाल काटा' आदि का प्रयोग क्या दर्शाता है ? मतलब, पत्रकारिता का शब्दकोश इतना निर्धन हो गया है ? लिंग-बोध तो मानो गायब ही हो गया हो । आज पत्रकारिता की भाषा पतनोन्मुखी हो चली है । शब्द अर्थहीन हैं, भाव मरणासन्न । आज हम अपनी भाषा पर से अपना मालिकाना हक़ खोते जा रहे हैं- जो दु:खद है ।  पत्रकारिता में शब्द के अर्थ से ज़्यादा शब्द से जुड़ाव का महत्व है । चूँकि, शब्द से हम विलग रहते हैं, उसे जीते नहीं हैं, इसीलिए संभावना व आशंका में हम फर्क़ करने की ज़हमत नहीं उठाना चाहते । अंग्रेजीदां यदि मिथ्याभिमान {'प्राइड' (जो बहुधा 'वैनिटि' में बदल गयी है)} छोड़ दें और हिन्दी भाषी कतिपय संकीर्णता ( 'प्रेज्युडिस') त्याग कर थोड़ी और उदारता बरतें, तो संवेदना व चेतना से युक्त पत्रकारिता की एक खूबसूरत व प्यारी दुनिया हमारी होगी । आलोक तोमर को याद करते हुए हमें भाषा, संस्कार व संस्कृति को संपुष्ट, परिष्कृत व परिमार्जित करने की भी सुध लेनी होगी । यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी । उनका जीवन इस बात की गवाही है कि पत्रकारिता जीवन-क्षेत्र में हारे हुए लोगों की आखिरी पनाहगाह नहीं है।

Saturday, 8 November 2014







                                          भारतीय जनसंचार संस्थान की स्वर्णिम यात्रा

जिस संस्थान की आधारशिला तात्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री इंदिरा गाँधी ने आज से 50 साल पहले रखी थी, वो आज जनसंचार का विशाल वटवृक्ष बन चुका है। कभी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे साधकों के अध्ययन-अध्यापन-प्रशिक्षण का मक्का कहा जाने वाला भारतीय जनसंचार संस्थान पूरे एशिया में न सिर्फ़ सुविख्यात था, अपितु शीर्षस्थ भी। आज भी विकास पत्रकारिता की पढ़ाई करने दुनिया के कोने-कोने से विद्यार्थी यहाँ पहुँचते हैं। इस लब्धप्रतिष्ठ संस्थान ने देश को कई यशस्वी व ओजस्वी पत्रकार दिये हैं। इस वृहत् परिवार का अंग बनना एक गौरवशाली व सुखद अहसास है।

नज़रों में ताबे-दीद भी बाकी नहीं रही,
किससे नज़र मिलाऊँ तुझे देखने के बाद।
काबे का एहतराम भी मेरी नज़र में है,
सर किस तरफ झुकाऊँ तुझे देखने के बाद।

- सईद शाहिदी

कैबिनेट मिशन (1945) के प्रस्ताव पर गठित अंतरिम मंत्रीमंडल में सरदार वल्लभ भाई पटेल गृह के साथ-साथ सूचना व प्रसारण मंत्रालय भी संभाल रहे थे। इस देश में दो सूचना व प्रसारण मंत्री ऐसे हुए, जो बाद में चलकर प्रधानमंत्री भी बने- श्रीमती इंदिरा गाँधी एवं श्री इंद्र कुमार गुजराल। और, दो सूचना एवं प्रसारण मंत्री ऐसे हुए, जिन्होंने आगे चलकर लोकसभा में नेता, प्रतिपक्ष की सशक्त भूमिका निभाई- श्री लाल कृष्ण आडवाणी और श्रीमती सुषमा स्वराज। बावजूद इसके मीडिया-अमीरी व मीडिया-ग़रीबी के बीच बढ़ती खाई के बीच न सिर्फ़ ग़रीबी- रेखा के नीचे, बल्कि मीडिया-रेखा के नीचे भी जीने को विवश जनसामान्य के साथ न्याय करते हुए आज देश में जन प्रसारक की जो भूमिका दिखनी चाहिए थी, उसका सर्वथा अभाव नज़र आता है।


आइ.आइ.एमं.सी. सूचना प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त निकाय है। कई वर्षों से इसे सेंटर अॉफ एक्सलंस (उत्कृष्ट केंद्र) घोषित करने की बात चल रही है। पर, पिछली कुछ सरकारों के रवैये का पता इसी बात से चलता है कि सीधे संवाद व संचार से जुड़े इस अति महत्वपूर्ण मंत्रालय को कैबिनेट स्तर का मंत्री तक नसीब नहीं हुआ है। जिस तरह स्वास्थ्य मंत्रालय की देखरेख में एम्स चलता है, विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्रालय आइ.आइ.टी. को पुष्पित-पल्लवित करता है, वैसी ही ज़िम्मेदारी की स्वाभाविक अपेक्षा आइ.आइ.एम.सी., एफ.टी.आइ.आइ.,पुणे,एस.आर.एफ.टी.आइ., कोलकाता, आदि संस्थान के उन्नयन के लिए सूचना व प्रसारण मंत्रालय से की जाती है। इधर कुछ दिन पहले सरकार की तरफ से सकारात्मक संकेत मिले हैं कि अब यहाँ भी एम.ए., एम.फिल, पी.एच.डी. की पढ़ाई शुरु की जायेगी ।

 ये इसलिए भी ज़रूरी है कि आज पत्रकारिता के अकादमिक क्षेत्र में उम्दा शिक्षकों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। आइ.आइ.एम.सी. जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में बच्चे महज नौकरी पाने के लिए नहीं आते, कुछ बच्चे एकेडमिक्स में भी जाना चाहते हैं। उन बच्चों को बेसब्री से यहाँ एम.ए., एम.फिल, पी.एच.डी. का पाठ्यक्रम शुरु होने का इंतज़ार है। वस्तुतः रैंकिंग शोध कार्य की गुणवत्ता व प्रासंगिकता पर निर्भर करती है। छात्र यदि नोट्स बनाने में तल्लीन रहें, चीज़ों को समग्रता के साथ विश्लेषणात्मक दृष्टि से समझने-सीखने की ज़हमत न उठायें, पुस्तकालय में समय बिताने व पढ़ने की संस्कृति से विमुख हो जायें, तो नतीजा अनुकूल नहीं रहेगा। आज देश के चोटी के संस्थानों में आये गुणात्मक ह्रास और गिरावट को लेकर प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. यशपाल का मानना है, "जिन शिक्षा-संस्थानों में अनुसंधान और उसकी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता, वो न तो शिक्षा का भला कर पाते हैं और न समाज का। अच्छा शोध हमेशा विषय के दायरे के बाहर होता है। अगर ऐसा करने की इजाज़त न दी जाये और शिक्षक परंपरागत तरीके से काम करते रहें, तो शोध का कभी भला नहीं हो सकता। महज विशेषज्ञ बनने से काम चलने वाला नहीं"।  और ध्यातव्य है कि पत्रकारिता जीवन-क्षेत्र में हारे हुए व्यक्तियों की अंतिम शरणस्थली नहीं है। सुकून का विषय है कि देश भर के अंदर कुकुरमुत्ते की तरह पाँव पसार रहे पत्रकारिता के निजी संस्थानों की मौजूदगी, तमाम विचलन व फीस के नाम पर लगभग लूट के बीच  बच्चे  पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता के साथ आइ.आइ.एम.सी.  पहँचते हैं।


पिछले कई साल से छात्रों के लिए छात्रावास की अनुपलब्धता के पीछे ये दलीलें दी जाती रहीं कि पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से हरी झंडी (क्लिअरंस) नहीं मिल पा रही है, इसलिए छात्रावास-निर्माण की बात आगे नहीं बढ़ पा रही है। अब तो सौभाग्यवश वन व पर्यावरण मंत्रालय तथा सूचना व प्रसारण मंत्रालय एक ही शख्स के ज़िम्मे है। फिर क्या वजह हुई इंतज़ार की ? मज़ाक में कल साथी निकेश मयूर  कह रहे थे, दरअस्ल, मामला परिसर के महज दो पेड़ों के चलते लटका हुआ है। उन्हीं दो पेड़ों के नीचे देश के दो ख्याति- प्राप्त पत्रकार को संचार-ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसलिए ऐतिहासिक महत्व के ये दो प्रेरणास्पद पेड़ न कटेंगे, न छात्रावास का निर्माण होगा। अब कोई रात में सुरक्षा-प्रहरियों को चकमा देकर उन्हें धराशायी कर दे, तो बात दीगर है। पर बुरी-डरावनी रातों में लगता नहीं कि कोई ख़ुद पर वन अधिनियम लगवाने का दुस्साहस दिखा पायेगा। वैसे, इधर कुछ छात्रों को छात्रावास की सुविधा उपलब्ध कराने का निर्णय आइ.आइ.एम.सी. प्रशासन ने लिया है, जो नाकाफ़ी है। प्रभो जावड़ेकर महाराज एफ.टी.आइ.आइ. हो आये आप, हमारे संस्थान के दिन कब बहुरेंगे ?

खैर, अपने इस प्रिय आँगन में आकर बेहद सुकून मिलता है। इरादे मज़बूत होते हैं, हौसलों को बल मिलता है और शुरु हो जाती है सपनों में नित नये-नये रंग भरने की पुनर्यात्रा।

दिल तुम्हारा है या हमारा है
हमसे ये फैसला नहीं होता।
-जिगर


आइ.आइ.एम.सी. के पास अगर सबसे ख़ूबसूरत कोई चीज़ है, तो वो है मीडिया-अध्ययन के लिहाज़ से देश भर में समृद्धतम इसका पुस्तकालय। यदि संयमित होकर यहाँ समय गुज़ारा जाये, तो इससे बेहतर कोई अनुभूति नहीं हो सकती। पत्रकारिता के इस मक्का के सृजनशील अध्याय   सिने मंच  ने अपनी सात महीने की यात्रा बड़ी खूबसूरती से पूरी की । मौजूदा सत्र की अपनी आखिरी प्रस्तुति के रूप में पिछले दिनों इस मंच ने "गाँधी माय फादर" बनाने वाले फिरोज़ अब्बास ख़ान निर्देशित सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य के ज़रिये कई सवालों व सरोकारों को कई बार स्पष्टता से तो कई बार सूक्ष्मता से उकेरती फिल्म  "देख तमाशा देख" की स्क्रीनिंग की । 


                               इस सिने मंच को बुनियादी तौर पर खड़ा करने में निष्काम कर्मयोगी, व्यवहारकुशल, प्रिय साथी अभिषेक चंचल जी, अपनी रचनात्मकता व सौम्यता के लिए चर्चित सेज़ल ललवानी, सृजनशील मोही नारायण, जौक़े-दीदार रखने वाले भाई अली अनवर, बहुमुखी प्रतिभा की धनी सौम्या शंकर, दीपक पटेल, ओमप्रकाश धीरज, मलयानिल, ज्योति राय आदि का अप्रतिम योगदान रहा है । एक आत्मीय संरक्षक की भाँति बच्चों के बीच लोकप्रिय, फीचर कम्यूनिकेशन के हमारे श्रद्धेय प्राध्यापक डॉ. आनन्द प्रधान निरंतर सिने मंच की क्रमिक प्रगति का न सिर्फ़ जायजा लेते रहे, अपितु प. बंगाल में पिछले दिनों संपन्न हुए एक फिल्म फेस्टिवल में सिने मंच की मौजूदगी दर्ज़ कराकर इसे राष्ट्रीय पहचान भी दिलाई ।
                                इस मंच ने जहाँ स्पिक मैके का कार्यक्रम आयोजित कराया, जिसमें पश्चिमी संगीत का आनंद हमने लिया, वहीं विशुद्ध भारतीय संगीत -सागर में निमज्जित होने का मौका भी दिया । कार्लाइल के शब्दों में, "संगीत आत्मा पर लगी हुई काई को साफ कर देता है"। शेक्सपीयर अपने चर्चित नाटक ट्वेल्फ्थ नाइट में लिखते हैं : 

संगीत यदि है प्रेमाहार, तो बजने दो, बस बजने दो
इतना निमज्जित करो मुझे कि तृप्त हो जाये ये मन।
संगीत-क्षुधा हो रुग्ण औ' फिर शान्त।                             

 निर्भया पर सी.एन.एन. आइ.बी.एन. द्वारा बनाई गई डॉक्यमेंट्री का प्रदर्शन भी हमने देखा । साथ ही,  कई अहम मुद्दों पर हमने सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में एक दृष्टि के साथ ईमानदार, प्रखर व सुचिंतित चर्चा भी की ।

                              इस मंच ने मेरे जैसे सिनेमा के महज उभरते हुए दर्शक को कई बारीकियाँ सिखाईं, समग्र समझ विकसित करने में मदद की । मैंने बड़े चाव से हर डॉक्यमेंट्री देखी  । एकाध मौके को छोड़कर सिने मंच द्वारा प्रदर्शित शायद ही कोई ऐसी फिल्म हो, जिसे देखने का लोभ संवरण मुझसे हुआ हो । संवाद-सत्र को साथियों ने अपने अनछुए प्रश्नों व गंभीर, मारक तथा अर्थपूर्ण टिप्पणियों से काफी दिलचस्प और निहितार्थ पूरा करने वाला बनाया ।

                               आने वाले दिनों में यह सिने मंच प्रज्ञावान प्राध्यापक डॉ. आनंद प्रधान के कुशल नेतृत्व में आगामी सत्र के विद्यार्थियों के सांस्कृतिक बोध, कला-बोध, रंग-बोध, युग-बोध एवं उनकी सृजनशीलता, रचनाधर्मिता तथा अध्यवसाय के सहारे नित नयी बुलंदियों को छुए, प्रशिक्षुओं-अध्येताओं की अभिरूचि को निखारे और अपनी विशिष्ट पहचान व प्रासंगिकता बचाये व बनाये रखे - यही मेरी आत्मिक अभिलाषा है ।
 इस स्वर्णिम अवसर पर द सन्डे अब्जर्वर इंडिअन पोस्ट, दी इंडिपेंडंट, द पाइअनिअर(दिल्ली संस्करण) और आउटलुक  जैसे पत्र-पत्रिकाओं को संवार-निखार कर धारदार बनाने वाले जाने-माने पत्रकार विनोद मेहता ने "क्या प्रिंट मीडिया मृतप्राय है ?" विषयक ओजपूर्ण व्याख्यान दिया। बहुमुखी व बहुआयामी प्रतिभा के धनी मौजूदा सत्र के साधकों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम में एक-से-बढ़कर एक प्रस्तुति दी। मन खु़श हो गया। निस्संदेह ये उत्साहित बच्चे हमारे बैच के साथियों से कहीं ज़्यादा जीवन्त दिखे, बस थोड़ा-सा संयम व सलीका सीख ले, जो मुझे विश्वास है, यह कैम्पस उन्हें ख़ुद-ब-ख़ुद सिखा देगा।

एक बार पुनः आइआइ.एम.सी. को 50 वर्ष की अपनी शानदार व गरिमामयी यात्रा पूरी करने पर स्वर्णजयन्ती की अशेष आत्मिक बधाई व शुभकामनाएँ !

मेरा तसव्वुर, मेरे इरादे करेंगे फितरत पे हुक्मरानी
जहाँ फरिश्तों के पर हों लग़्ज़ां, मैं उस बुलंदी पे जा रहा हूँ।
-इक़बाल